यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम: पेपर - II (सामान्य अध्ययन-1: भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल तथा समाज) - 11, जनवरी 2020


यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम (Answer Writing Practice for UPSC IAS & UPPSC/UPPCS Mains Exam)


मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम:

  • प्रश्नपत्र-2: सामान्य अध्ययन-1: (भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल तथा समाज)

प्रश्न - प्राकृतिक वन आवरण को और अधिक बेहतर बनाने के लिए ''मियावाकी वनीकरण विधि'' कितनी प्रभावशाली है? चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर:

  • चर्चा में क्यों हैं?
  • प्रस्तावना
  • मुख्य भाग -
  • मियावाकी सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु
  • मियावाकी सिद्धान्त के लाभ
  • मियावाकी सिद्धान्त की आलोचना
  • निष्कर्ष -

चर्चा में क्यों है?

हाल ही में केरल सरकार द्वारा वन रोपण के लिए ‘‘मियावाकी वनीकरण विधि’’ को अपनाया गया है। जिसके अन्तर्गत सरकारी कार्यालयों, आवासीय परिसरों, विद्यालयों तथा सरकारी भूमियों पर वनावरण का कार्य किया जायेगा।

प्रस्तावना -

साइंस जर्नल में छपी एक रिर्पोट के अनुसार, विश्व को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के लिए वना रोपण एक मात्र उपाय है। इस रिर्पोट के अनुसार, यदि जलवायु परिवर्तन की समस्या को दूर करना है तो वैश्विक रूप से कम से कम एक लाख करोड़ वृक्ष लगाने की आवश्यकता है। ‘‘मियावाकी वनारोपण तकनीक’’ इसी से सम्बन्धित है। इस तकनीक का विकास जापानी बॉटेनिस्ट अकीरा मियावाकी द्वारा किया गया है। इसकी मदद से बहुत कम समय में बंजर भूमि पर तीन तरह के पौधे (झांडीनुमा, मध्यम आकार के पेड़ तथा बड़े वृक्ष) लगा कर वनावरण में वृद्धि की जा सकती है।

मियावाकी सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु

  • पेड़ पौधों के बीच कोई निश्चित दूरी नहीं रखनी चाहिए।
  • वनीकरण से पहले जमीन को उपजाऊ बनाने के प्रयास करने चाहिए।
  • बंजर जमीन में पेड़ पौधों, वनस्पतियों, झांड़ियों और वृक्षों का सघन रोपण किया जाना चाहिए। एक हेक्टेयर में 10,000 पौधे लगाये जा सकते हैं।
  • स्थानीय प्रजातियों के बीज को रोपकर वनों को और घना बनाया जा सकता है।
  • पौधों को रोपने के बाद कम से कम अगला बरसाती मौसम आने तक उनकी सिंचाई की जानी चाहिए।
  • खरपतवार की रोकथाम और मिट्टी में वाष्पन से नमी की कमी को दूर करने के लिए पलवार बिछानी चाहिए।
  • नालियों में पानी बहाकर सिंचाई के स्थान पर स्प्रिंकलर विधि अपनाई जानी चाहिए।
  • बरगद जैसे पेड़ जिनका वितान बहुत बड़ा होता है उन्हें नहीं लगाना चाहिए।
  • 2 से 3 वर्ष तक इस वन की देखभाल करनी होगी इसके बाद यह आत्म निर्भर हो जायेगा।
  • इस तकनीक के माध्यम से मानव निर्मित वन लगाने के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

मियावाकी वनीकरण सिद्धान्त के लाभ

  • इस सिद्धान्त के द्वारा 2 फीट चौड़ी और 30 फीट पट्टी में 100 से भी अधिक पौधे लगाये जा सकते हैं।
  • इसमें कम खर्च में पौधे को 10 गुना तेजी से उगाया जा सकता है जिससे वृक्ष शीघ्र ही घने हो जाते हैं।
  • पौधों को पास-पास लगाने से इन पर खराब मौसम का असर नहीं होता, न ही गर्मी में नमी का अभाव होता है जिससे ये हरे-भरे रहते हैं।
  • इससे पौधों में दुगनी तेजी से वृद्धि होती है। और तीन वर्ष बाद उनकी देखभाल नहीं करनी पड़ती है।
  • कम क्षेत्र में घने वृक्ष ऑक्सीजन बैंक का काम करते हैं। इस तकनीक का प्रयोग न केवल वनों के लिए बल्कि आवासीय परिसर में भी किया जा सकता है।

मियावाकी वनीकरण सिद्धान्त की आलोचना

  • पर्यावरणविद् येलप्पा रेड्डी ने इस पद्धति की प्रभावशीलता पर सवाल उठाया है उनके अनुसार, पौधों को प्रकाश संश्लेषण के लिए मजबूर करना एक अच्छा विचार नहीं है, साथ ही वन सिर्फ पेड़ों से नहीं होते बल्कि वन एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र होता है।
  • यदि वनों को ठीक प्रकार से प्रबंधित नहीं किया जाता है तो वनीकरण में जैव-विविधता की कमी हो सकती है।
  • पर्यावरणविद् और इको वॉच के संस्थापक सुरेश हेबलिकर भी मियावाकी पद्धति के समर्थक नहीं हैं उनके अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के कारण जापान में यह तकनीक प्रारम्भ हुई थी परन्तु भारत जैसे उष्णकटिबन्धीय देश में इस विधि की आवश्यकता नहीं है।
  • हेबलिकर के अनुसार मियावाकी वनीकरण केवल छोटे स्थानों पर या शहरों के आस-पास ही उगाए जा सकता हैं।
  • इस प्रकार के वनों में प्राकृतिक वनों के गुणों का अभाव होता है। उदाहरण वनों की औषधीय प्रकृति तथा उनके वर्षा लाने की क्षमता आदि।

निष्कर्ष -

प्रति इकाई क्षेत्र में बागान के मुकाबले मानव निर्मित वनों में अधिक जैव-विविधता होती है। ऐसे वन केवल एक साल में तितली, गिलहरी चिड़ियों और सरीसृपों जैसे वन्य जीवों के निवास बन सकते हैं। इसके प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक मात्रा में कार्बन फिक्सिंग होती है।

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