(डाउनलोड) आर्थिक समीक्षा 2018 -19 सारांश "भाग - 2" (The Gist of Economic Survey 2018-2019 "Volume - 2")

(डाउनलोड) आर्थिक समीक्षा 2018 -19 सारांश "भाग - 2" (The Gist of Economic Survey 2018-2019 "Volume - 2")


(डाउनलोड) आर्थिक समीक्षा 2018 -19 सारांश "भाग - 2" (The Gist of Economic Survey 2018-2019 "Volume - 2")


1. 2018-19 में अर्थव्‍यवस्‍था की स्‍थिति: एक समष्‍टि परिदृश्‍य

  • सरकार ने वर्ष 2019-20 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया है। यह अनुमान निवेश तथा खपत में तेजी की संभावना के आधार पर व्यक्त किया गया है। केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में 2018-19 की आर्थिक समीक्षा प्रस्तुत की।
  • आर्थिक समीक्षा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 2019-20 ने सरकार को विशाल राजनीतिक जनादेश दिया है, जो उच्च आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं के लिए शुभ है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के विश्व आर्थिक परिदृश्य (डब्ल्यूईओ) की अप्रैल 2019 की रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि 2019 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 7.3 प्रतिशत की दर से वृद्धि करेगा। यह अनुमान वैश्विक उत्पादन तथा उभरते बाजार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (ईएमडीई) में क्रमशः 0.3 तथा 0.1 प्रतिशत अंक में गिरावट की रिपोर्ट के बावजूद व्यक्त किया गया है।
  • भारत 2018-19 में विश्व की तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। ऐसा 2017-18 के 7.2 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि से 2018-19 में 6.8 प्रतिशत के मामूली परिवर्तन के बावजूद हुआ है। दूसरी ओर विश्व उत्पादन में 2017 के 3.8 प्रतिशत की तुलना में 2018 में 3.6 प्रतिशत की कमी आई है। अमरीका-चीन व्यापार तनाव, चीन की कठोर रणनीतियों तथा बड़ी अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में मौद्रिक नीतियों के सामान्यीकरण के साथ-साथ वित्तीय कठोरता के बाद विश्व अर्थव्यवस्था तथा उभरते बाजार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (ईएमडीई) में 2018 में मंदी आई है।
  • पिछले पांच वर्षों के दौरान (2014—15 के बाद) भारत की वास्तविक जीडीपी विकास दर उच्च रही है। इस दौरान औसत विकास दर 7.5 प्रतिशत रही। 2018-19 में भारतीय अर्थव्यवस्था 6.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी। इस प्रकार पिछले वर्ष की तुलना में विकास दर में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई। गिरावट का कारण कृषि और संबंधित क्षेत्र, व्यापार, होटल, परिवहन, भंडारण, संचार, प्रसारण संबंधित सेवाएं तथा लोक प्रकाशक एवं रक्षा क्षेत्रों में निम्न विकास दर रही। 2018-19 के दौरान रबी फसलों के लिए जोत के कुल क्षेत्र में थोड़ी कमी आई जिसने कृषि उत्पादन को प्रभावित किया। खाद्यान्नों की कीमत में कमी ने भी किसानों को उत्पादन कम करने के लिए प्रेरित किया। 2018-19 के दौरान जीडीपी के निम्न विकास दर कारण सरकार द्वारा खपत में कमी, स्टॉक में बदलाव आदि हैं।
  • चालू खाता घाटा (सीएडी) 2017-18 के दौरान जीडीपी का 1.9 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल-दिसंबर, 2018 में 2.6 प्रतिशत हो गया। घाटे में बढ़ोत्तरी का कारण अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के कारण हुआ व्यापार घाटा है। व्यापार घाटा 2017-18 के 162.1 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2018-19 में 184 बिलियन डॉलर हो गया। सेवा क्षेत्र के निर्यात और आयात में गिरावट दर्ज की गई। सेवा क्षेत्र का निर्यात और आयात 2018-19 क्रमशः 5.5 प्रतिशत और 6.5 प्रतिशत रहा जबकि 2017-18 के दौरान यह क्रमशः 18.8 और 22.6 प्रतिशत था।
  • 2018-19 रुपये का अमेरिकी डॉलर की तुलना में 7.8 प्रतिशत, येन की तुलना में 7.7 प्रतिशत और यूरो और पौंड स्टर्लिंग की तुलना में 6.8 प्रतिशत अवमूल्यन हुआ। 2018-19 के दौरान भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर की तुलना में अवमूल्यन रुख के साथ व्यापार किया और मार्च 2019 के अंत में 69.2 रुपये के स्तर पर सुधरने से पहले अक्टूबर, 2018 में 74.4 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को भी छुआ था। सामान्य अर्थों में मूल्यांकन प्रभावों सहित विदेशी मुद्रा भंडार मार्च -2018 की तुलना में मार्च 2019 के अंत में 11.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर घटा। वर्ष के दौरान आरबीआई हस्तक्षेप के कारण अक्टूबर, 2018 तक गिरता रहा। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 14 जून, 2019 के अनुसार 422.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आरामदायक स्तर पर बना हुआ है।
  • वर्ष 2018-19 में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आवक 14.2 प्रतिशत बढ़ा। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने वाले शीर्ष क्षेत्रों में सेवा, ऑटोमोबिल तथा रसायन प्रमुख हैं। कमोबेश 2015-16 से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आवक ऊंची दर से बढ़ी है। यह वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेशकों के विश्वास में सुधार दर्शाती है।
  • भारतीय बैंक बैलेंस शीट की समस्या से जूझ रहे हैं जिसका असर कॉरपोर्ट्स और बैंकों पर देखा जा सकता है। गैर निष्पादित परिसंप्तियों(एनपीए) की वजह से बैंकों पर दबाव है और इसकी वजह से सरकारी बैंक अधिक दबाव में हैं।
  • आर्थिक विकास के उपभोग हमेशा ही मजबूत और प्रमुख कारक रहा है। जीडीपी में निजी उपभोग का स्तर उच्च बना हुआ है। आवश्य से लग्जरी, वस्तु से सेवा तक उपभोग के पैटर्न में बदलाव आया है।
  • 2011-12 से निवेश दर और फिक्सड निवेश दर में कमी के बाद 2017-18 में इसमें कुछ सुधार देखने को मिला है। फिक्सड निवेश 2016-17 के 8.3 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 9.3 प्रतिशत और 2018-19 में यह बढ़कर 10.0 प्रतिशत तक पहुंच गया. 2016-17 तक फिक्सड निवेश मुख्य तौर पर घरेलू क्षेत्र द्वारा घटा है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र और निजी कॉरपोरेट क्षेत्र का निवेश लगभग एक समान रहा।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि सेवा क्षेत्र के बाद उद्योग क्षेत्र में 2011-12 में सबसे अधिक निवेश किया गया था। वहीं कृषि क्षेत्र में सेवा क्षेत्र के आधा ही निवेश हो पाया था। 2017-18 में सेवा क्षेत्र में निवेश दर सबसे अधिक रहा था। इस साल भी कृषि क्षेत्र में सेवा क्षेत्र के आधा निवेश रहा था। इसी तरह घरेलू क्षेत्र में गिरावट के साथ बचत दर में भी कमी दर्ज की गई। वर्ष 2011-12 में बचत दर में गिरावट 23.6 प्रतिशत थी जबकि 2017-18 में यह कमी 17.2 प्रतिशत थी।
  • वर्ष 2018-19 में रुपये और अमेरिकी डॉलर के संदर्भ में आय़ात और निर्यात का ट्रेंड अलग देखा गया। जहां अमेरिकी डॉलर में आयात और निर्यात दोनों में कमी आई वहीं रुपये में वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2018-19 में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में कमी आने की वजह से यह गिरावट दर्ज की गई।
  • सकल संवर्धित मूल्य की आर्थिक गतिविधियों में कमी दर्ज की गई और 2018-19 में विकास दर 6.6 प्रतिशत दर्ज की गई जो कि 2017-18 के मुकाबले कम है। वर्ष 2018-19 में अप्रत्यक्ष कर में विकास 8.8 प्रतिशत रहा जोकि 2017-18 के मुकाबले आर्थिक गतिविधियों में कमी की वजह से कम है।
  • अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र सबसे गतिशील रहा और आर्थिक विकास दर में मुख्य भूमिका निभाई है और सकल संवर्धित मूल्य में उसकी बड़ी भागीदारी रही। सेवा क्षेत्र का निर्यात कुल योगदान 2000-01 के 0.746 लाख रुपये से बढ़कर 2018-19 में 14.389 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। यानी कुल निर्यात में इसकी भागीदारी 26.8 प्रतिशत से बढ़कर 38.4 प्रतिशत हो गया।
  • कृषि के क्षेत्र में दो वर्ष अच्‍छी विकास दर हासिल करने के बाद वर्ष 2018-19 में कृषि और सहायक क्षेत्र की वास्‍तविक विकास दर कम होकर 2.9 प्रतिशत हो गई। कृषि और किसान कल्‍याण मंत्रालय द्वारा जारी तीसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार वर्ष 2018-19 के दौरान खद्यान्‍नों का कुल उत्‍पादन 2017-18 (अंतिम अनुमान) 283.4 मिलियन टन होने का अनुमान लगाया गया था। 2018-19 में खाद्य वस्‍तुओं की कीमतों में महत्‍वपूर्ण गिरावट देखने को मिली, जैसा कि 2018-19 में शून्‍य प्रतिशत उपभोक्‍ता खाद्य मूल्‍य मुद्रास्‍फीति का संकेत दिया गया था, जिसमें वर्ष में पांच महीने के लिए मूल्‍य संकुचन देखने को मिला।
  • 2018-19 के दौरान उद्योग में वृद्धि की दर में विनिर्माण और निर्माण गतिविधि में सुधार के बल पर तेजी आई, जिनकी वजह से दो उप क्षेत्रों, ‘खनन और उत्खनन’ तथा ‘बिजली, गैस, जलापूर्ति और अन्य उपयोगिता सेवाओं’ में वृद्धि हुई। वर्ष 2018-19 में विनिर्माण कुल जीवीए 16.4 प्रतिशत के लिए उत्तरदायी रहा, जो ‘कृषि एवं सम्बद्ध’ क्षेत्र से मामूली अधिक है।
  • वर्ष 2018-19 में विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि दर में तेजी आई हालांकि वित्तीय वर्ष के अंत में इसकी गति में कुछ कमी आई और साल की चौथी तिमाही में इसकी वृद्धि दर 3.1 प्रतिशत रही, जोकि पहली, दूसरी और तीसरी तिमाही में क्रमशः 12.1 प्रतिशत 6.9 प्रतिशत और 6.4 प्रतिशत रही। वर्ष 2018-19 की चौथी तिमाही में एनबीएफसी की ओर से कम ऋण दिए जाने के कारण ऑटो सेक्टर में बिक्री में वृद्धि हुई।
  • निर्माण क्षेत्र में वृद्धि दर अनुमान सीमेंट के उत्पादन और तैयार इस्पात की खपत में वृद्धि का इस्तेमाल कर लगाया जाता है। सीमेंट के उत्पादन और तैयार इस्पात की खपत में 2018-19 में क्रमशः 13.3 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई, जो उनकी 2017-18 की वृद्धि दर से अधिक है और 2018-19 में निर्माण क्षेत्र में उच्च वृद्धि को प्रतिबिंबित करती है।
  • ‘वित्तीय, रियल स्टेट और व्यवसायिक सेवा’ क्षेत्र में 2018-19 में 7.4 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई, जो वर्ष 2017-18 में हुई 6.2 प्रतिशत की वृद्धि से अधिक है। यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था की समग्र जीवीए के 20 प्रतिशत से अधिक है।

2. राजकोषीय घटना क्रम

  • वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि सरकार (केन्द्र तथा राज्य) वित्तीय मजबूती और वित्तीय अनुशासन की राह पर है। समीक्षा में कहा गया है कि राजस्व को मजबूत बनाना और व्यय को नई प्राथमिकता देना तथा विवेक संगत बनाना वित्तीय सुधारों के लिए अभिन्न है। प्रत्यक्ष कर को आधार बनाना तथा वस्तु और सेवा कर को स्थिर बनाना अन्य प्राथमिकताएं हैं। व्यय गुणवत्ता में सुधार महत्वपूर्ण प्राथमिकता बनी हुई है। नव संशोधित वित्तीय मार्ग को बदले बिना आवंटन आवश्यकताओं को पूरा करना सबसे बड़ी चुनौती है। वृह्द आर्थिक स्थिरता को बनाए रखते हुए 2018-19 में भारतीय अर्थव्यवस्था 6.8 प्रतिशत (केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी अस्थायी अनुमानों के अनुसार) बढ़ने का अनुमान है। वृह्द स्थिरता के साथ विकास की प्रेरणा, ढांचागत सुधार, वित्तीय अनुशासन, सेवाओं की सक्षम डिलिवरी तथा वित्तीय समावेश से मिलती है। केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में 2018-19 की आर्थिक समीक्षा प्रस्तुत की।
  • संशोधित वित्तीय मार्ग में वित्त वर्ष 2020-21 तक वित्तीय घाटे को जीडीपी के 3 प्रतिशत तक लाना और 2024-25 तक केन्द्र सरकार के ऋण को जीडीपी के 40 प्रतिशत तक रखने के लक्ष्य को हासिल करने की बात कही गई है। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि केन्द्रीय बजट 2018-19 के बजट के साथ प्रस्तुत मध्यम अवधि के वित्तीय नीति वक्तव्य का उद्देश्य 2018-19 में वित्तीय घाटा लक्ष्य को जीडीपी के 3.3 प्रतिशत तक लाना है। वित्त वर्ष 2018-19 में वित्तीय घाटा जीडीपी के 3.4 प्रतिशत तक रहा और ऋण जीडीपी का अनुपात 44.5 प्रतिशत (अस्थाई) रहा। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में 2017-18 की तुलना में 2018-19 में कुल केन्द्रीय सरकारी व्यय 0.3 प्रतिशत कम हुआ। यह व्यय राजस्व में 0.4 प्रतिशत अंक की कमी और पूंजी व्यय में 0.1 प्रतिशत अंक वृद्धि के साथ हुआ। राज्यों के वित्त के संबंध में राज्यों के अपने कर तथा गैर-कर राजस्व में 2017-18 के संशोधित अनुमान में मजबूती दिखी, जो कि 2018-19 में बरकरार रही।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि केन्द्र तथा राज्यों की सम्मिलित देनदारियों में मार्च 2018 के अंत तक जीडीपी के 67 प्रतिशत तक की कमी आई, जो मार्च अंत 2016 के अंत में जीडीपी की 68.5 प्रतिशत थी। आशा है कि केन्द्र सरकार का वित्तीय घाटा 2017-18 के जीडीपी के 6.4 प्रतिशत से घटकर 2018-19 बजट अनुमान में जीडीपी के 5.8 प्रतिशत तक हो जाएगा।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि 2018-19 का बजट निवेश की आशावादी परिस्थितियों और व्यापार चक्र की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया। बजट में वित्तीय मजबूती के उद्देश्य को दोहराया गया और इसमें नये वित्तीय लक्ष्य को ऋण तथा वित्तीय घाटा कम करने पर फोकस के साथ प्रस्तुत किया गया। 2018-19 के बजट में 2017-18 के संशोधित अनुमानों की तुलना में सकल कर राजस्व (जीटीआर) में 16.7 प्रतिशत की वृद्धि दिखाई गई। यह अनुमान व्यक्त किया गया कि सकल कर राजस्व (जीटीआर) 22.7 लाख करोड़ रुपये का होगा, जो जीडीपी का 12.1 प्रतिशत है। लेकिन 2018-19 में अस्थाई वास्तविक के लिए सकल कर राजस्व यद्पि बजट अनुमान से कम रहा फिर भी इसमें 2017-18 की तुलना में 8.4 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। कॉरपोरेट टैक्स में सुधार के कारण 2018-19 अस्थाई वास्तविक में प्रत्यक्ष कर में 2017-18 की तुलना में 13.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  • केन्द्र सरकार के वित्त मामलों में जीडीपी अनुपात में करों में पिछले कई वर्षों में सुधार हुआ है, राजस्व व्यय में मजबूती आई है, पूंजी खर्च की तरफ झुकाव बढ़ा है तथा केन्द्र सरकार की कुल देनदारियों में निरंतर कमी दिखी है। इन सब कारणों से प्राथमिक और वित्तीय घाटों में कमी के परिणाम देखने को मिले हैं।
  • आर्थिक समीक्षा 2018-19 में कहा गया है कि वर्ष 2018-19 के लिए अस्थाई वास्तविक की तुलना बजट अनुमानों से करने से जाहिर होता है कि सरकार वित्तीय घाटे को जीडीपी के 3.4 प्रतिशत तक नियंत्रित रखने में सफल हुई है। समीक्षा में कहा गया है कि व्यय गुणवत्ता 2017-18 की तुलना में 2018-19 अस्थाई वास्तविक में कुल व्यय में पूंजी व्यय के हिस्से में प्रदर्शित हुई है।
  • समीक्षा में यह भी कहा गया है कि राज्यों को कुल अंतरण में 2014-15 तथा 2018-19 संशोधित अनुमान के बीच जीडीपी के 1.2 प्रतिशत अंकों की वृद्धि हुई है। केन्द्र सरकार की कुल देनदारियों (जीडीपी के अनुपात रूप में) में निरंतर कमी आई है, विशेषकर 2003 में वित्तीय उत्तरदायित्व तथा बजट प्रबंधन अधिनियम पारित होने से यह कमी आई है। समीक्षा में कहा गया है कि यह वित्तीय मजबूती के प्रयासों तथा अपेक्षाकृत अधिक जीडीपी वृद्धि के कारण हुआ है।
  • 2019 के मार्च अंत तक केन्द्र सरकार की कुल देनदारियां 84.7 लाख करोड़ रुपये की रही, जिसमें 90 प्रतिशत सार्वजनिक ऋण था। अधिकतर सार्वजनिक ऋण नियत ब्याज दर पर दिए गए जिससे भारत का ऋण स्टॉक ब्याज दर के उतार-चढ़ाव से मुक्त रहा। इससे ब्याज भुगतान की दृष्टि से बजट को निश्चितता और स्थायित्व मिला।
  • आर्थिक समीक्षा 2018-19 में कहा गया है कि 2016-17 की तुलना में 2017-18 के संशोधित अनुमान में राज्यों का बजट राजस्व व्यय में वृद्धि के कारण काफी बढ़ा। राजस्व मोर्चे पर राज्यों के अपने कर तथा गैर-कर राजस्व में 2017-18 संशोधित अनुमान में वृद्धि दिखी, जो कि 2018-19 के बजट अनुमान में बनी रही। समीक्षा मे कहा गया है कि 2016-17 की तुलना में 2017-18 के संशोधित अनुमान में जीडीपी के अनुपात में वित्तीय घाटा में सुधार हुआ है।
  • आर्थिक समीक्षा में चेतावनी दी गई है कि वित्तीय मोर्चे पर अनेक चुनौतियां सामने आएंगी। वृद्धि दर में नरमी की आशंका व्यक्त की जा रही है कि जिसका असर राजस्व संग्रह पर पड़ेगा। वित्त वर्ष 2018-19 में जीएसटी संग्रह में कमी आई है। इसलिए केन्द्र और राज्य दोनों की सरकारों के संसाधन में सुधार के लिए जीएसटी संग्रह में वृद्धि महत्वपूर्ण होगी। विस्तारित प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) तथा आयुष्मान भारत और नई सरकार के अन्य नई पहलों के लिए वित्तीय घाटे के लक्ष्य से समझौता किए बिना संसाधन जुटाने होंगे। ईरान से तेल आयात पर अमरीकी पाबंदी का प्रभाव तेल की कीमतों पर पड़ेगा और परिणाम स्वरूप इसका असर चालू खाता संतुलन के अतिरिक्त पेट्रोलियम सब्सिडी पर भी पड़ेगा। 15वां वित्त आयोग अप्रैल 2020 से शुरू होने वाले अगले पांच वर्षों के लिए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। केन्द्र से राज्यों को दिए जाने वाले कर हिस्से पर आयोग की सिफारिशों का प्रभाव केन्द्र सरकार के वित्त पर पड़ेगा।

3. मौद्रिक प्रबंधन और वित्‍तीय मध्‍यस्‍थता

  • वर्ष 2018-19 की वार्षिक समीक्षा में कहा गया है कि पिछले वर्ष मौद्रिक नीति में संपूर्ण बदलाव देखने को मिला। मानक नीति दर पहली बार 50 आधार अंक (बीपीएस) बढ़ाई गई और बाद में अपेक्षाकृत कमजोर मुद्रास्फीति, मंदी तथा नरम अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक स्थितियों के कारण 75 बीपीएस घटा दी गई। लेकिन तरलता की स्थिति सितंबर, 2018 से कठिन बनी हुई है। केन्द्रीय वित्त और कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में 2018-19 की आर्थिक समीक्षा प्रस्तुत की।
  • बैंकिंग प्रणाली के कार्य प्रदर्शन में सुधार हुआ है, क्योंकि गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) अनुपात में कमी आई है और बैंक कर्ज में वृद्धि हुई है। लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए वित्तीय प्रवाह बाधित रहा, क्योंकि पूंजी बाजार से उठाई गई इक्विटी वित्त राशि में कमी आई और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर दबाव बढ़ा। दिवाला और दिवालिएपन के लिए प्रणालीबद्ध तरीके से व्यवस्था बनाई जा रही है। इस व्यवस्था से बैंकों के फंसे हुए कर्ज की वसूली हुई है और व्यावसायिक संस्कृति में सुधार हुआ है।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि 2018-19 के दौरान मौद्रिक वृद्धि दर दीर्घकालिक प्रवृति की ओर बढ़ी। पिछले वित्त वर्ष में प्रचलन में रही मुद्रा में 22.6 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। कुल आरबीआई ऋण में वृद्धि मुख्य रुप से वर्ष के दौरान मुक्त बाजार संचालनों के कारण हुई। बैंकिंग प्रणाली में जमा, मांग और समय दोनों में, वृद्धि हुई। इसके परिणाम स्वरूप 2018-19 में कुल जमा 9.6 प्रतिशत बढ़ा।
  • आर्थिक समीक्षा में तरलता के विषय में कहा गया है कि 2018-19 के अंतिम दो तिमाहियों तथा 2019-20 की पहली तिमाही में औसत तरलता की स्थिति घाटे में रही। तरलता की कठिनाई ब्याज दरों में भी दिखी। तरलता के मामले में तीन कारणों से स्थिति कठिन हुई। पहला, 2018-19 के अंतिम दो तिमाहियों में बैंक कर्ज वृद्धि में सुधार हुआ, लेकिन बैंक जमाओं में गति धीमी रही। प्रचलित मुद्रा के विकास में भी तेजी आई। महत्वपूर्ण बात यह है कि आरबीआई को विनिमय दर के उतार-चढ़ाव को थामने के लिए 32 बिलियन डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा सुरक्षित धन से निकालनी पड़ी। आरबीआई ने विभिन्न साधनों के जरिए तरलता लाकर समस्या का समाधान निकाला। वर्ष के दौरान 10 वर्ष के सरकारी प्रतिभूति (जी-सेक) मानक उतार-चढ़ाव भरा रहा।
  • समीक्षा में कहा गया है कि 2018-19 में बैंकिंग क्षेत्र विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कार्य प्रदर्शन में सुधार हुआ। मार्च, 2018 और दिसंबर, 2018 के बीच अनुसूचित वाणिज्य बैंकों का सकल एनपीए अनुपात 11.5 प्रतिशत से घटकर 10.1 प्रतिशत हो गया। पिछले कुछ वर्षों में गैर खाद्य बैंक कर्ज (एनएफसी) के विकास की गति धीमी रही, लेकिन 2018-19 में इसमें सुधार आया। 2018-19 में बड़े उद्योगों तथा सेवा क्षेत्र को बैंकों द्वारा कर्ज देने से समग्र एनएफसी में विकास हुआ। लेकिन ऋण वृद्धि की गति पिछले कुछ महीनों में साधारण रही।
  • गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को रेटिंग में कमी आने के कारण तथा आईएल और एफएस समूह के दोष के कारण कठिन समय का सामना करना पड़ा। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की गंभीर तरलता स्थिति को देखते हुए सरकार ने तेजी से कार्रवाई की और समस्या के समाधान के लिए तत्काल कदम उठाया। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को संसाधनों के प्रवाह की कमी से हाल की तिमाहियों में इस क्षेत्र की ऋण देने की क्षमता पर प्रभाव पड़ा है।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि पिछले वर्ष की तुलना में 2018-19 के दौरान बांड (डेट) निर्गम के माध्यम से काफी संसाधन जुटाए गए। लेकिन सार्वजनिक निर्गम और राइट इश्यू के माध्यम से संसाधन जुटाने में कमी आई। 2018-19 के दौरान भारतीय कंपनियों ने पूंजी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए निजी प्लेसमेंट मार्ग को प्राथमिकता दी। सभी म्युचुअल फंडों के प्रबंध के अंतर्गत संचयी कुल संपत्ति 11.4 प्रतिशत बढ़कर 23,79,584 करोड़ रुपये हो गई। 2018-19 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा 5,499 करोड़ रुपये निकाले गए। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान सामान्य बीमा कर्ताओं (भारत के अंदर) का सकल प्रत्यक्ष प्रीमियम 17.6 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्ज करते हुए 1,50,660 करोड़ रुपये हो गया।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि दिवाला और दिवालिएपन की समस्या से निपटने के लिए प्रणालीबद्ध तरीके से व्यवस्था की जा रही है। इसके कारण फंसे हुए कर्जों की वसूली हुई है और कारोबारी संस्कृति में सुधार हुआ है। 31 मार्च, 2019 तक कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के अंतर्गत 94 मामलों का समाधान हुआ। इसके परिणाम स्वरूप 1,73,359 करोड़ रुपये के दावों का निपटान किया गया। 28 फरवरी, 2019 तक आईबीसी प्रावधानों के अंतर्गत 2.84 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 6079 मामले स्वीकृति से पहले वापस ले लिए गए। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार पहले के गैर-निष्पादक खातों से 50,000 करोड़ रुपये बैंकों को प्राप्त हुए। आरबीआई की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अतिरिक्त 50,000 करोड़ रुपये को गैर मानक से उन्नत बना करके मानक संपत्ति बनाया गया। यह सभी कदम आईबीसी प्रक्रिया में प्रवेश करने से पहले व्यापक ऋण व्यवस्था के लिए व्यवहार परिवर्तन दिखाते हैं।

दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी),2016 पारित होने से ऋण वसूली व्यवस्था मजबूत हुई

  • केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में 2018-19 की आर्थिक समीक्षा प्रस्तुत की। दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 के प्रभावी होने से ऋण वसूली में हाल की सफलता को देखते हुए आर्थिक समीक्षा में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) तथा अपीली न्यायाधिकरण को मजबूत बनाने का प्रस्ताव किया गया है।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि दिवाला और दिवालिएपन के लिए प्रणालीबद्ध तरीके से व्यवस्था मजबूत बनाई जा रही है और फंसे हुए कर्जों की वसूली हो रही है। 31 मार्च, 2019 तक कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) से 94 मामलों का समाधान हुआ है और परिणाम स्वरूप 1,73,359 करोड़ रुपये के दावों का निपटारा किया गया है। 28 फरवरी, 2019 तक 2.84 लाख रुपये की कुल राशि के 6,079 मामले दिवाला तथा दिवालियापन संहिता के प्रावधानों के अंतर्गत सुनवाई से पहले वापस लिए गए हैं। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार बैंकों को पहले के गैर-निष्पादित खातों से 50,000 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। आरबीआई की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अतिरिक्त 50,000 करोड़ रुपये की संपत्ति को गैर-मानक से उन्नत बनाकर मानक संपत्ति कर दिया गया है। ऋण वसूली में तेजी को देखते हुए आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि यह सभी कदम आईबीसी प्रक्रिया में प्रवेश से पहले व्यापक ऋण देने की प्रणाली के लिए व्यवहार परिवर्तन दिखाते हैं।
  • दिवाला तथा दिवालियापन संहिता को गैर-निष्पादक कॉरपोरेट कर्जदारों से कारगर ढंग से निपटने के लिए हाल के समय का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार मानते हुए आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि एनसीएलटी के आधारभूत ढांचे को बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि ऋण वसूली का समाधान समयबद्ध रुप से किया जा सके।
  • समीक्षा में कहा गया है कि सरकार विलंब की समस्या के समाधान के उपायों पर गंभीरता से विचार कर रही है और सरकार ने एनसीएलटी के लिए न्यायिक तथा तकनीकी सदस्यों के 6 अतिरिक्त पदों का सृजन किया है। समीक्षा में कहा गया है कि एनसीएलटी के सर्किट पीठों की स्थापना पर विचार किया जा रहा है।
  • वर्तमान में प्रमुख शहरों में स्थित 20 पीठों में एनसीएलटी के 32 न्यायिक सदस्य तथा 17 तकनीकी सदस्य हैं।
  • समीक्षा में कहा गया है कि आईबीसी से ऋणदाता, कर्जदार, प्रवर्तक तथा कर्जदाता के बीच सांस्कृतिक बदलाव की शुरूआत हुई है। आईबीसी पारित होने से पहले ऋणदाता लोक अदालत, ऋण वसूली न्यायाधिकरण तथा एसएआरएफएईएसआई अधिनियम का सहारा लेते थे। पहले की व्यवस्था से 23 प्रतिशत की कम औसत वसूली हुई जबकि आईबीसी व्यवस्था के अंतर्गत ऋण वसूली में 43 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि आईबीसी पारित किए जाने के बाद से भारत की दिवाला समाधान 2014 की रैंकिंग 134 से सुधर कर 2019 में रैंकिंग 108 हो गई। भारत की रैंकिंग 134 कई वर्षों तक बनी रही थी। पिछले वर्ष भारत को सर्वाधिक सुधार वाले क्षेत्राधिकार के लिए वैश्विक पुनर्संरचना समीक्षा पुरस्कार मिला। जनवरी, 2018 में आईएमएफ-विश्व बैंक द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया कि भारत नई अत्याधुनिक दिवालियापन व्यवस्था की दिशा में बढ़ रहा है।
  • युवा उद्यमियों, पेशेवर लोगों तथा विद्वानों के हाथ में आईबीसी के भविष्य को देखते हुए आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि सरकार एक उचित ढांचा बनाने की प्रक्रिया में है। इसमें कार्यक्रमों तथा संस्थानों को शामिल किया जाएगा। भारत के दिवाला तथा दिवालियापन बोर्ड (आईबीबीआई) ने ग्रेजुएट इंसॉलवेंसी प्रोग्राम (जीआईपी) लांच करने की घोषणा की है। यह अपने तरह का पहला कार्यक्रम उन लोगों के लिए है जो दिवाला कार्यक्रम को अपने कैरियर के विषय के रूप में तथा मूल्य श्रृंखला की भूमिका के रूप में लेते हैं।
  • अधिकतर सूक्ष्म अर्थव्यवस्थाओं ने सीमापार दिवाला कानून को विकसित किया है। इसे देखते हुए समीक्षा में कहा गया है कि भारत ने सीमापार दिवाला पर यूएनसीआईटीआरएएल मॉडल कानून अपनाने के लिए कदम उठाना शुरू कर दिया है। आईबीबीआई ने भी समूह तथा व्यक्तिगत दिवाला मामलों पर दो अलग-अलग कार्यसमूह बनाए हैं।

4. कीमतें और मुद्रास्‍फीति

  • केन्‍द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में 2018-19 की आर्थिक समीक्षा पेश की। आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान अर्थव्‍यवस्‍था अधिक एवं परिवर्तनीय महंगाई के बजाय अपेक्षाकृत ज्‍यादा स्थिर एवं कम महंगाई की ओर अग्रसर हो गई है।
  • आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि उपभोक्‍ता मूल्‍य सूचकांक – संयुक्‍त (सीपीआई-सी) पर आधारित प्रमुख महंगाई दर पिछले पांच वर्षों से निरंतर कम होती जा रही है। सीपीआई आधारित प्रमुख महंगाई दर वर्ष 2017-18 के 3.6 प्रतिशत, वर्ष 2016-17 के 4.5 प्रतिशत, वर्ष 2015-16 के 4.9 प्रतिशत और 2014-15 के 5.9 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2018-19 में 3.4 प्रतिशत के स्‍तर पर आ गई। आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया है कि प्रमुख महंगाई दर अप्रैल 2018 के 4.6 प्रतिशत की तुलना में अप्रैल 2019 में 2.9 प्रतिशत आंकी गई। आर्थिक समीक्षा के अनुसार, उपभोक्‍ता खाद्य मूल्‍य सूचकांक (सीएफपीआई) पर आधारित खाद्य महंगाई दर वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान घटकर 0.1 प्रतिशत के निम्‍न स्‍तर पर आ गई।
  • आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि थोक मूल्‍य सूचकांक (डब्‍ल्‍यूपीआई) पर आधारित महंगाई दर वर्ष 2016-17 के 1.7 प्रतिशत, वर्ष 2015-16 के (-) 3.7 प्रतिशत और वर्ष 2014-15 के 1.2 प्रतिशत की तुलना में वर्ष 2017-18 में 3.0 प्रतिशत के स्‍तर पर टिकी रही। वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान थोक मूल्‍य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर 4.3 प्रतिशत आंकी गई।

महंगाई का मौजूदा रुझान

आर्थिक समीक्षा में महंगाई के मौजूदा रुझान का उल्‍लेख करते हुए बताया गया है, ‘सीपीआई-सी आधारित महंगाई अप्रैल 2019 में 2.9 प्रतिशत दर्ज की गई जो इतने ही स्‍तर पर मार्च, 2019 में भी टि‍की हुई थी, जबकि अप्रैल 2018 में यह 4.6 प्रतिशत आंकी गई थी। आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि मुख्‍यत: अपेक्षाकृत कम खाद्य महंगाई की बदौलत ही वित्त वर्ष 2018-19 में महंगाई दर में कमी संभव हो पाई। इस दौरान खाद्य महंगाई दर (-) 2.6 और 3.1 प्रतिशत के बीच बरकरार रही।

आर्थिक समीक्षा के अनुसार देश में खाद्य महंगाई दर निम्‍न स्‍तर पर बरकरार रही है। खाद्य महंगाई दर अप्रैल, 2019 में 1.1 प्रतिशत आंकी गई, जबकि यह मार्च, 2019 में 0.3 प्रतिशत और अप्रैल, 2018 में 2.8 प्रतिशत दर्ज की गई थी। उपभोक्‍ता खाद्य मूल्‍य सूचकांक पर आधारित खाद्य महंगाई दर वर्ष 2016-17 के 4.2 प्रतिशत, वर्ष 2015-16 के 4.9 प्रतिशत और वर्ष 2014-15 के 6.4 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2017-18 में 1.8 प्रतिशत रह गई। वित्त वर्ष 2018-19 में औसत खाद्य महंगाई दर घटकर 0.1 प्रतिशत के निम्‍न स्‍तर पर आ गई। आर्थिक समीक्षा में यह बात रेखांकित की गई है कि वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही के दौरान खाद्य महंगाई में भारी कमी मुख्‍यत: सब्जियों, फलों, दालों एवं उत्‍पादों, चीनी और अंडे की कीमतों में भारी गिरावट के कारण ही संभव हो पाई जिनका सीपीआई-सी में 13.1 प्रतिशत का योगदान है।

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि पिछले दो वर्षों के दौरान थोक मूल्‍य सूचकांक पर आधारित खाद्य महंगाई दर में भी कमी देखने को मिली है। यह वर्ष 2018-19 में 0.6 प्रतिशत से कुछ ज्‍यादा आंकी गई थी। यह मार्च, 2019 के 3.9 प्रतिशत और अप्रैल, 2018 के 0.8 प्रतिशत के मुकाबले अप्रैल 2019 में 4.9 प्रतिशत दर्ज की गई।

ग्रामीण और शहरी महंगाई में कमी

आर्थिक समीक्षा के अनुसार कम महंगाई दर के मौजूदा दौर की एक खास बात यह है कि ग्रामीण महंगाई के साथ-साथ शहरी महंगाई में भी कमी देखने को मिली है। आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि जुलाई, 2018 से ही शहरी महंगाई की तुलना में ग्रामीण महंगाई में कमी की गति अपेक्षाकृत ज्‍यादा तेज रही है। इसकी बदौलत मुख्‍य महंगाई दर भी घट गई। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि ग्रामीण महंगाई में कमी खाद्य महंगाई के घटने की बदौलत संभव हो पाई है जो पिछले छह महीनों (अक्‍टूबर, 2018 – मार्च 2019) से ऋणात्‍मक स्‍तर पर टि‍की हुई है।

ज्‍यादातर राज्‍यों में सीपीआई आधारित महंगाई में कमी देखने को मिली

आर्थिक समीक्षा में यह बात रेखांकित की गई है कि वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान ज्‍यादातर राज्‍यों में सीपीआई आधारित महंगाई में कमी देखने को मिली। वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान 23 राज्‍यों/ केन्‍द्र शासित प्रदेशों में महंगाई दर 4 प्रतिशत से कम थी। आर्थिक समीक्षा में यह भी बताया गया है कि वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान 16 राज्‍यों/केन्‍द्र शासित प्रदेशों में महंगाई दर अखिल भारतीय औसत से कम आंकी गई। इस दौरान दमन एवं दीव में महंगाई दर न्‍यूनतम रही और इस लिहाज से इसके बाद हिमाचल प्रदेश एवं आंध्र प्रदेश का नंबर आता है।

महंगाई के वाहक

आर्थिक समीक्षा के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान अखिल भारतीय स्‍तर पर सीपीआई-सी आधारित महंगाई दर में परिवर्तन मुख्‍यत: विविध समूह के कारण देखने को मिला, जिसके बाद ईंधन और प्रकाश समूह का नंबर आता है। आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि मुख्‍य महंगाई दर को उपयुक्‍त स्‍वरूप प्रदान करने में सेवाओं का सापेक्ष महत्‍व बढ़ गया है क्‍योंकि इसने अपने भारांक (वेटेज) से कहीं ज्‍यादा योगदान दिया है। सेवाओं के 40 आइटमों को सीपीआई-सी में 23.37 प्रतिशत वेटेज दिया गया है।

महंगाई को अंकुश में रखने के उपाय

महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्‍न कदमों का उल्लेख करते हुए आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि महंगाई को नियंत्रण में रखना अब भी नीतिगत फोकस का एक महत्‍वपूर्ण क्षेत्र है। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि सरकार ने महंगाई, विशेषकर खाद्य महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि इसके तहत उठाए गए उपायों में अन्‍य बातों के अलावा सामान्‍य उपाय और विशिष्‍ट उपाय भी शामिल हैं।

आर्थिक समीक्षा के अनुसार, नियमित उपायों में कालाबाजारी के साथ महंगाई की नियमित निगरानी, जमाखोरी एवं कालाबाजारी के खिलाफ राज्‍यों को एडवाइजरी जारी करना, महत्‍वपूर्ण जिंसों की कीमतों एवं उपलब्‍धता पर नियमित रूप से समीक्षा बैठकें आयोजित करना, उत्‍पादन को बढ़ावा देने के लिए दालों एवं अन्‍य फसलों के ज्‍यादा न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य तय करना और कृषि- बागवानी जिंसों की खरीद के लिए कृषि स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ) बनाना शामिल हैं।

आर्थिक समीक्षा के अनुसार, सरकार द्वारा उठाये गए विशिष्‍ट कदमों में पीएसएफ के तहत खरीदे गए स्‍टॉक से उचित मूल्‍यों पर प्‍याज जारी करना, रणनीतिक बाजार उपायों के लिए बफर स्‍टॉक की दालों का उपयोग करना और सेना एवं केन्‍द्रीय अर्द्ध-सैन्‍य बलों की जरूरतों को पूरा करना शामिल हैं।

5. संधारणीय विकास और जलवायु परिवर्तन

केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2018-19 पेश की। जिसमें बताया गया है कि भारत अपनी सतत विकास, जलवायु परिवर्तन, संसाधन दक्षता और वायु प्रदूषण से संबंधित विभिन्न नीतियों और उपायों को शुरू और लागू करके अपने आर्थिक प्रगति के लक्ष्य और रख-रखाव लगातार बनाए रखता है।

समीक्षा में बताया गया कि 2030 का वैश्विक एजेंडा अपनाने में देश गरीबी, लैगिंक भेदभाव, आर्थिक असमानता से मुक्त विश्व के निर्माण के लिए आगे आ रहे हैं जिससे भावी पीड़ियों के लिए स्वस्थ ग्रह सुनिश्चित किया जा सके। यह लक्ष्य बहुआयामी और विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरण संबंधी आयामों को एकीकृत करते हैं। भारत अपने 2030 के सतत विकास लक्ष्यों के लिए विभिन्न योजनाओं की शुरूआत करके समग्र पहुंच का अनुशरण करता है। भारत का एसडीजी सूचकांक स्कोर राज्यों के लिये 42 और 69 के बीच केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए 57 और 68 के बीच है। केरल और हिमाचल प्रदेश सभी राज्यों में 69 -69 स्कोर के साथ सभी राज्यों में सबसे आगे हैं। चंडीगढ़ और पुदुचेरी सभी केन्द्र शासित प्रदेशों में क्रमशः68 और 65 स्कोर के साथ आगे हैं।

सतत विकास के लिये नीति पहल

समीक्षा में एसडीजी अर्जित करने की दिशा में भारत सरकार की नीतियों का उल्लेख किया गया है। इन नीतियों में स्वच्छ भारत मिशन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्मार्ट सिटीज, प्रधानमंत्री जनधन योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और प्रधानमंत्री उज्जवला योजना तथा अन्य योजनाएं शामिल हैं।

नमामि गंगे मिशन- एसडीजी 6 अर्जित करने के लिए एक प्रमुख नीतिगत प्राथमिकता की शुरूआत 2015-2020 अवधि के लिए बीस हजार करोड़ रुपये के बजट व्यय के साथ एक प्राथमिकता कार्यक्रम के रूप में की गई थी। इसके प्रमुख घटकों में सीवर परियोजना प्रबंधन, शहरी और ग्रामीण साफ सफाई, औद्योगिक प्रदूषण से निपटना, जल उपयोग निपुणता और गुणवत्ता सुधार, परास्थितिकी संरक्षण और स्वच्छ गंगा निधि शामिल हैं।

देश में वायु बढ़ते हुए वायु प्रदूषण से व्यापक रूप से निपटने के लिये भारत सरकार ने देश में वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क बढ़ाने के अलावा वायु प्रदूषण की रोकथाम नियंत्रण और फैलाव के लिये पैन इंडिया समयबद्ध राष्ट्रीय स्तर की रणनीति के रूप में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की शुरूआत की थी।

इस समीक्षा में बताया गया है कि विविध क्षेत्रों के समाधान के लिये मौजूदा नीतियों के बारे में बनाई गई राष्ट्रीय संसाधन निपुणता नीति को तालमेल के साथ एसडीजी को अर्जित करने के लिये संसाधान निपुणता पहुंच को मुख्य धारा में लाने के लिए तैयार किया जाना चाहिए।

समानता और सामान्‍य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्‍वों और संबंधित क्षमताओं का सिद्धांत

समीक्षा में बताया गया है कि भारत ने समानता और सामान्य सिद्धांतों के आधार पर जलवायु कार्रवाई लागू करने की अपनी जिम्‍मेदारियों को लगातार प्रदर्शित किया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी का हवाला दिया गया है कि जिसमें बताया गया है कि भारत विश्‍व समुदाय का छठा हिस्‍सा है। हमारी विकास जरूरतें व्‍यापक हैं भारत के लोगों ने आधुनिक सुविधाओं और विकास के साधनों तक पहुंच के लिए बहुत लंबा इंतजार किया है। हम अपेक्षा के मुकाबले जल्‍दी ही इस काम को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। हमने यह भी कहा था कि हम स्‍वच्‍छ और हरित तरीके से इस काम को करेंगे।

जलवायु वित्त और भारत की राष्‍ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान

इस समीक्षा में जलवायु परिवर्तन की वैश्विक प्रतिक्रि‍या को मजबूत बनाने में जलवायु वित्त की भूमिका पर पेरिस अनुबंध में जोर दिया गया है। समीक्षा में अंकटाड 2014 की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है और कहा गया है कि एसडीजी अर्जित करने के लिए विकासशील देशों के मौजूदा निवेश में प्रतिवर्ष 2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की कमी है। भारत जैसे विकासशील देश अपने सतत विकास लक्ष्‍यों को ध्‍यान में रखते हुए अपने घरेलू संसाधनों के तहत हरसंभव प्रयास करेंगे। यह विश्‍व समुदाय के लिए जलवायु कार्रवाई के लिए माहौल बनाने में अपनी जिम्‍मेदारी निभाने का उचित समय है।

6. वैदेशिक क्षेत्र

  • केन्द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण की ओर से आज संसद में पेश की गई 2018-19 की आर्थिक समीक्षा में भारत के बाह्य क्षेत्र के लगातार स्थिर रहने की बात कही गई है। समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार हालांकि 2017-18 के 1.8 प्रतिशत की तुलना में 2018-19 में चालू खाता घाटा जीडीपी की तुलना में 2.1 प्रतिशत अधिक रहा, फिर भी यह काबू में है। चालू खाता घाटे में बढ़ोतरी व्यापार घाटे की वजह से हुई है जो 2017-18 के 6.0 प्रतिशत से बढ़कर 2018-19 में 6.7 प्रतिशत पर पहुंच गया। व्यापार घाटे की सबसे बड़ी वजह 2018-19 में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी रही। हालांकि विदेशों से भारत में धन भेजे जाने के मामले में बढ़ोतरी होने से चालू खाता घाटा में और वृद्धि थम गई। कुल मिलाकर हालांकि 2018-19 में जीडीपी के अनुपात में चालू खाता घाटा बढ़ा, लेकिन विदेशी बकाया ऋण में लगातार कमी का रूझान रहा।
  • आर्थिक समीक्षा में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार बढ़ोतरी का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यह 400 अरब अमेरिकी डॉलर अधिक के स्तर पर बना हुआ है। 2017-18 के दौरान अंतर-बैंकिंग मुद्रा बाजार में रुपया 65-68 प्रति डॉलर पर कारोबार करता रहा, लेकिन 2018-19 में डॉलर के मुकाबले और गिरकर 70-74 रुपये प्रति डॉलर के दायरे में जा पहुंचा। रुपये में यह गिरावट मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह से रही। व्यापार के संदर्भ में देश की आयात क्रय क्षमता लगातार वृद्धि की ओर है। कच्चे तेल की कीमतों में निर्यात की तुलना में तेजी नहीं आने की वजह से है।
  • 2018 के दिसंबर में भारत का विदेशी बकाया ऋण 521.1 अरब डॉलर था जकि मार्च, 2018 के तुलना में 1.6 प्रतिशत अरब डॉलर कम है। लम्बी अवधि का विदेश बकाया ऋण 2018 के दिसंबर में 2.4 घटकर 417.3 अरब डॉलर रहा गया। हालांकि देश के कुल विदेशी बकाया ऋण में इसकी हिस्सेदारी पिछले वर्ष की समान अवधि के 80.7 प्रतिशत के लगभग बराबर 80.1 प्रतिशत रही।
  • भारत के आयात-निर्यात बास्केट उत्पादन में 2017-18 की तुलना में 2018-19 में कोई खास बदलाव नहीं आया। 2018-19 में देश से कुल 330.7 अरब डॉलर मूल्य वस्तुओं का निर्यात हुआ। इनमें सबसे ज्यादा पेट्रोलियम उत्पादों, कीमती पत्थरों, दवाओं, सोना और अन्य कीमती धातुओं का निर्यात हुआ। इस अवधि में देश में कुल 514.03 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का आयात किया गया। आयातित वस्तुओं में कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, मोती, कीमती और अर्द्ध-कीमती पत्थर तथा सोना प्रमुख रहे। 2018-19 के दौरान भारत का व्यापार घाटा 183.96 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। इस दौरान अमेरिका, चीन, हांगकांग, संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब भारत के प्रमुख साझेदार बने रहे।

व्यापार सुगमता

  • भारत ने अप्रैल, 2016 में विश्व व्यापार संगठन के व्यापार सुगमता समझौता की पुष्टि की और इसके तहत ही राष्ट्रीय व्यापार सुगमता समिति का गठन किया। समिति ने देश के आयात और निर्यात के उच्च शुल्क को घटाने में अहम भूमिका निभाई है। इसकी वजह से सीमापार व्यापार तथा देश के भीतर कारोबारी माहौल को सुगम बनाने के मामले में भारत का प्रदर्शन काफी बेहतर हुआ है।

व्यापार से संबंधित लोजिस्टिक सेवाएं:

  • सरकार ने राष्ट्रीय लोजिस्टिक कार्य योजना के तहत राष्ट्रीय लोजिस्टिक नीति का मसौदा तैयार किया है। इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास को गति देना और देश के व्यापार को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। इसके लिए लोजिस्टिक सेवाओं को बाधारहित, सक्षम, विश्वसनीय और कम लागत वाली बनाने के उपाए किए जाएंगे।

परिदृश्य

  • अप्रैल, 2019 में जारी विश्व आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में 2019 के मध्यावधि में वैश्विक स्तर पर उत्पादन में सुधार का अनुमान व्यक्त किया गया है। अनुमान लगाया गया है कि विकसित देशों द्वारा समोयोजित मौद्रिक नीति अपनाने तथा चीन और अमेरिका के बीच व्यापार तनाव का घटना इसमें बड़ी बड़ी भूमिका निभाएंगा। समीक्षा के अनुसार वैश्विक उत्पादन बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव होगा, लेकिन इसके बावजूद इसका असर भारत पर नहीं पड़ेगा क्योंकि वैश्विक उत्पादन में वृद्धि भारत के निर्यात में भी सहायक बनेगी। सरकार की नीतियों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में और उदार बनने की संभावना है, जिससे चालू खाता घाटा को पाटने वाले संसाधन और स्थिर होंगे। अगर खपत मे कमी आती है और निवेश तथा निर्यात से अर्थव्यवस्था को गति मिलती है तो चालू खाता घाटे को कम किया जा सकता है।

7. कृषि और खाद्य प्रबंधन

  • आर्थिक समीक्षा 2018-19 में कहा गया है कि भूमि की उत्पादकता से सिंचाई जल उत्पादकता की तरफ जाने की राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। नीतियों में सुधार करते हुए किसानों को इसके लिए संवेदनशील बनाना होगा और जल प्रयोग में सुधार राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। एशियन वाटर डेवलेपमेंट आउटलुक 2016 के मुताबिक करीब 89 फीसदी भूजल का इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है। सिंचाई के मौजूदा चलन की वजह से भूजल निरंतर नीचे की तरफ खिसकता जा रहा है, जो कि चिंता का विषय है। केंद्रीय वित्त और कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज आर्थिक समीक्षा 2018-19 संसद में पेश की।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि सिंचाई के लिए 89 प्रतिशत भूजल का इस्तेमाल किया जाता है। देश में धान और गन्ना उपलब्ध जल का 60 प्रतिशत से अधिक का जल ले लेते हैं जिससे अन्य फसलों के लिए कम पानी उपलब्ध रहता है।
  • पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र में कई तरह की समस्याएं उभर कर आई हैं। कृषि भूमि के बंटवारे और जल संसाधनों के कम होने से संकट बढ़ा है। जबकि अपनाए गए नए प्रभावी संसाधनों और जलवायु के अनुकूल सूचना एवं प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से कृषि क्षेत्र स्मार्ट हुआ है। कृषि जोतों के छोटे की वजह से भारत ने सीमांत किसानों के लिए उपयुक्त संसाधनों को अपनाने पर जोर दिया है।
  • आर्थिक समीक्षा के मुताबिक कृषि और संबंधित क्षेत्र में सकल पूंजी निर्माण के प्रतिशत के रूप में सकल पूंजी निर्माण (जीसीएफ) में वर्ष 2013-14 में 17.7 प्रतशित की बढ़त दिखाई देती है, लेकिन तत्पश्चात वर्ष 2017-18 में यह घटकर 15.5 प्रतिशत हो गया। 2012-13 के सकल पूंजी निर्माण 2,51,904 करोड़ से बढ़कर 2017-18 यह 2,73,555 करोड़ हो गई।
  • आर्थिक समीक्षा के मुताबिक महिलाएं फसल उत्पादन, पशुपालन, बागवानी,कटाई के बाद के कार्यकलाप कृषि/सामाजिक, वानिकी, मत्स्य पालन इत्यादि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। महिलाओं द्वारा उपयोग में लाई जा रही क्रियाशील जोतों का हिस्सा वर्ष 2005-06 में 11.7 प्रतिशत से बढ़कर 2015-16 में 13.9 प्रतिशत हो गई। महिला किसानों द्वारा संचालित सीमांत एवं छोटी जोतों का अंश बढ़कर 27.9 प्रतिशत हो गया है।

8. उद्योग एवं अवसंरचना

  • केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2018-19 की आर्थिक समीक्षा पेश की। देश के उद्योग और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के विश्‍लेषण में समीक्षा में कहा गया है कि भारत को एक मजबूत और लचीले बुनियादी ढांचे के साथ औद्योगिक व्‍यवस्‍था की आवश्‍यकता है, जिसमें लचीलापन हो। वर्ष 2018-19 के दौरान औद्योगिक उत्‍पादन सूचकांक (आईआईपी) के संदर्भ में औद्योगिक विकास की दर वर्ष 2017-18 की 4.4 प्रतिशत की तुलना में 3.6 प्रतिशत रही। वर्ष 2018-19 के दौरान यह गिरावट मुख्‍य तौर पर मध्‍यम एवं लघु उद्योगों को धीमे क्रेडिट प्रवाह आदि की वजह से तीसरी और चौथी तिमाही में धीमी विनिर्माण गतिविधियों के कारा रही। इस बीच, आठ प्रमुख बुनियादी ढांचा सहायक उद्योगों ने वर्ष 2018-19 के दौरान 4.3 प्रतिशत की समग्र वृद्धि दर हासिल की, जो वर्ष 2017-18 में प्राप्‍त वृद्धि दर के बराबर है।
  • समीक्षा में कहा गया है कि सरकार ने विनिर्माण वृद्धि को तेज गति देने के लिए प्रमुख क्षेत्रों जैसे स्‍टार्ट-अप इंडिया, ईज ऑफ डुइंग बिजनेस, मेक इन इंडिया, विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश नीति सुधार आदि में अनेक उपायों की शुरूआत हुई है। वर्ल्‍ड बैंक ईज ऑफ डुइंग बिजनेस रिपोर्ट 2018 में 190 देशों की रैंकिंग में भारत ने 77वां स्‍थान हासिल किया है। सरकार एक उदार एफडीआई नीति के जरिए निवेश को बढ़ावा देने में अग्र-सक्रिय भूमिका निभा रही है। वर्ष 2018-19 के दौरान एफडीआई इक्विटी में कुल अंतर्वाह 44.36 अरब डॉलर था, जबकि 2017-18 के दौरान यह 44.85 अरब अमरीकी डॉलर था। सौभाग्‍य, पीएमएवाई आदि जैसे क्षेत्र विशेष प्रमुख कार्यक्रमों के लागू होने से सतत और लचीले बुनियादी ढांचे को पर्याप्‍त महत्‍व दिया जा रहा है। वर्ष 2018-19 में सड़कों का निर्माण प्रति दिन 30 किलोमीटर की दर से बढ़ा, जबकि 2014-15 में यह 12 किलोमीटर प्रति दिन था। रेल भाड़ा और यात्रियों की आवाजाही 2017-18 के 0.64 प्रतिशत की तुलना में 2018-19 में 5.33 प्रतिशत बढ़ गया। भारत में 2018-19 में कुल टेलीफोन कनेक्‍शन 118.34 करोड़ तक पहुंच गए। बिजली की स्‍थापित क्षमता 2018 में 3,44,002 मेगावाट से बढ़कर 2019 में 3,56,100 मेगावाट हो गई।

भारतीय उद्योग एक सिंहावलोकन

  • समीक्षा में कहा गया है कि वर्ष 2018-19 के दौरान औद्योगिक क्षेत्र के कार्य निष्‍पादन में वर्ष 2017-18 की तुलना में सुधार हुआ है। वास्‍तविक सकल मूल्‍यवर्धित (जीवीए) औद्योगिक विकास की दर वर्ष 2017-18 में 5.9 प्रतिशत की तुलना में वर्ष 2018-19 के दौरान बढ़कर 6.9 प्रतिशत हो गई। आईआईपी के अनुसार औद्योगिक विकास दर 2017-18 में 4.4 प्रतिशत की तुलना में वर्ष 2018-19 में 3.6 प्रतिशत थी। वर्ष 2018-19 के दौरान खनन, विनिर्माण और बिजली क्षेत्र में क्रमश: 2.9 प्रतिशत, 3.6 प्रतिशत और 5.2 प्रतिशत की सकारात्‍मक वृद्धि दर्ज की गई।
  • केन्‍द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों ने भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्य कर रहे केन्‍द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के 257 उद्यमों में से 174 उद्यम लाभ की स्थिति में थे और दो लाभ नहीं और हानि नहीं की स्थिति में थे। समीक्षा में कहा गया है कि सीपीएसई के प्रदर्शन में सुधार की काफी गुंजाइश है।
  • समीक्षा में आगे कहा गया है कि उद्योग में सकल पूंजी निर्माण की वृद्धि दर 2016-17 में (-) 0.7 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2017-18 में 7.6 प्रतिशत की तेज वृद्धि दर्ज की गई, जो उद्योग में निवेश की बढ़ोतरी को दर्शाता है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार औद्योगिक क्षेत्र में सकल बैंक क्रेडिट प्रवाह में मार्च 2018 में 0.7 प्रतिशत हुई वृद्धि की तुलना में मार्च 2019 में 6.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सरकार ने 2014 से उद्योगों के सुधार संबंधी अनेक कदम उठाए हैं, जिनसे समग्र कारोबारी माहौल में महत्‍वपूर्ण सुधार हुआ है। उद्यमी युवाओं के बीच नवाचार और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री ने 15 अगस्‍त, 2015 को स्‍टार्ट-अप इंडिया स्‍टैंड-अप इंडिया पहल की घोषणा की थी। 1 मार्च 2019 को 16,578 नये स्‍टार्ट-अप को 499 जिलों में मान्‍यता दी गई। विनियमों को आसान बनाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। जैसे स्‍टार्ट-अप द्वारा एकत्र किए गए निवेश पर आयकर से छूट आदि।
  • सरकार द्वारा विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश की एक उदार नीति के माध्‍यम से निवेश को प्रोत्‍साहित करने की एक पूर्व सक्रिय पहल की जा रही है। बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से, राष्‍ट्रीय निवेश और बुनियादी ढांचा कोष का करीब 400 अरब रुपये की पूंजी के साथ गठन किया गया, ता‍कि व्‍यावसायिक दृष्टि से संभव परियोजनाओं को निवेश के अवसर प्रदान किए जा सकें।

सूक्ष्‍म, लघु और माध्‍यम उद्यम

भारत में सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र ने इस क्षेत्र के तेजी से विकास के लिए और व्‍यापार में आसानी को बढ़ावा देने के लिए अनेक महत्‍वपूर्ण घोषणाएं कीं, जिनमें ऑनलाइन पोर्टल के माध्‍यम से 59 मिनट के भीतर एक करोड़ रुपये तक के ऋणों के लिए सैद्धांतिक अनुमोदन प्रदान करना शामिल था। सभी जीएसटी पंजीकृत एमएसएमई के लिए एक करोड़ रुपये तक के वृद्धिशील क्रेडिट के संबंध में 2 प्रतिशत की ब्‍याज सहायता भी प्रदान की जा रही है और यह योजना 975 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ दो वित्‍तीय वर्षों 2018-19 और 2019-20 की अवधि के लिए प्रचालन में रहेगी। सरकार ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, सूक्ष्‍म और लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गांरटी न्‍यास निधि, प्रौद्योगिकी उन्‍नयन के लिए क्रेडिट समर्थित पूंजी सब्सिडी योजना, पारम्‍पारिक उद्योगों के उत्‍थान के लिए निधि योजना तथा नये उद्यमों की स्‍थापना एवं मौजूदा उद्यमों के विकास के लिए सूक्ष्‍म और लघु उद्यम क्‍लस्‍टर विकास कार्यक्रम जैसी कई योजनाएं।कार्यक्रम चलाए हैं।

सड़क क्षेत्र

समीक्षा में कहा गया है कि देश में राजमार्गों का निर्माण की गति में तेजी आई है। वर्ष 2014-15 में प्रति दिन 12 किलोमीटर सड़क का निर्माण होता था, वहीं वर्ष 2018-19 में प्रति दिन 30 किलोमीटर की दर से सड़कों का निर्माण हुआ। इसे प्रक्रिया को सरल बनाने, अंतर-मंत्रालयी समन्‍वय के लिए तंत्र को ठीक करने, सुस्‍त पड़ी हुई परियोजनाओं को पटरी पर लाने के लिए व्‍यापक कदम उठाने, निजी और सार्वजनिक दोनों प्रकार की निधियों का लाभ उठाने के लिए उन्‍नत परियोजनाओं का वित्‍त पोषण आदि किया जा सका। इस क्षेत्र में वर्ष 2014-15 में कुल निवेश 51,914 करोड़ रुपये था, वहीं वर्ष 2018-19 में यह निवेश बढ़कर 1,58,839 करोड़ रुपये हो गया।

वर्ष 2014-15 से 2018-19 की अवधि के दौरान सड़क क्षेत्र की प्रमुख उपलब्धियों में दिल्‍ली के आस-पास ईस्‍टर्न और वेस्‍टर्न पेरीफेरल एक्‍सप्रेस-वे, दिल्‍ली–मेरठ एक्‍सप्रेस-वे, कश्‍मीर में चेनानी-नशरी सुरंग, असम में ब्रहमपुत्र नदी पर धौला-सदिया पुल का निर्माण शामिल था।

नागर विमानन

  • समीक्षा में कहा गया है कि यात्रियों और सामरन के लिए भारत के अनुसूचित घरेलू हवाई परिवहन में वर्ष 2018-19 के दौरान में क्रमश: 14 प्रतिशत और 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2018-19 के दौरान कुल घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय यात्रियों की संख्‍या 204 मिलियन दर्ज की गई थी। हवाई विमान यात्रियों की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने और दूर-दराज के क्षेत्रों में हवाई संपर्क की व्‍यवस्‍था करने के लिए नये ग्रीन फील्‍ड हवाई अड्डों को तेजी से विकसित किया जा रहा है। वर्ष 2018-19 के अंतिम चरण में कुल 107 हवाई अड्डों पर निर्धारित एयर लाइन संचालन की व्‍यवस्‍था की गई।
  • उड़ान (उड़े देश का हर नागरिक) योजना के अंतर्गत क्षेत्रीय संपर्क के लिए बोली लगाए जाने के तीन चरणों में कुल 719 रूट आवंटित किए गए हैं, जिनमें से 182 रूट चालू स्थिति में हैं। इस येाजना में 23 ऐसे हवाई अड्डों को संपर्क प्रदान किया गया है, जो कार्य नहीं कर रहे थे, जबकि वर्ष 2026-27 तक 100 हवाई अड्डों को चालू करने का लक्ष्‍य रखा गया है। वर्ष 2018-19 में घरेलू विमान कार्गो 12.1 प्रतिशत बढ़ गया और भारत में 3.6 एमएमटी एयर कार्गो का निपटान किया गया। प्रथम राष्‍ट्रीय एयर कार्गो पोलिसी की रूपरेखा जनवरी 2019 में जारी की गई। इसका उद्देश्‍य वर्ष 2026-27 तक 10 मिलियन टन भार वहन के लक्ष्‍य पर पहुंचना है। उच्‍च हवाई अड्डा टैरिफ, रॉयल्‍टी, कुशल मानव शक्ति की कमी, रख-रखाव, मरम्‍मत और ओवर हॉल सुविधाओं के साथ-साथ विमान कल लीज अवधि की समाप्ति पर कई प्रकार की जांच के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता के कारण घरेलू एयरलाइनों के बीच तीखी प्रतिस्‍पर्धा को बढ़ावा मिला है।

जहाजरानी

31 जनवरी, 2019 की स्थिति के अनुसार भारत के पास नियंत्रित टन भार सहित 19.22 मिलियन (12.74 मिलियन जीटी) की डीडब्‍ल्‍यूटी के साथ 1405 जहाजों का बेड़ा था। बंदरगाहों के माध्‍यम से मात्रा की दृष्टि से लगभग 90 प्रतिशत और मूल्‍य की दृष्टि से 70 माल का आयात-निर्यात होता है। निरंतर बढ़ती हुई व्‍यापार अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सागरमाला, परियोजना उन्‍नति जैसी बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन की सहायता से पत्‍तन क्षमता के विस्‍तार को सर्वोच्‍च प्रथमिकता दी गई है।

बनारस में भारत के पहले मल्‍टी मॉडल टर्मिनल का उद्घाटन माननीय प्रधानमंत्री ने नवम्‍बर 2018 को किया था और गंगा पर प्रथम कंटेनर परेषण, जिसे कोलकाता से भेजा गया था, इस टर्मिनल पर उसी दिन प्राप्‍त किया गया था। अंतर्देशीय जलमार्ग को सस्‍ता और पर्यावरण अनुकूल परिवहन के साधन के रूप में प्रोत्‍साहित किया जा रहा है। भारत बांग्‍ला प्रोटोकॉल मार्ग के जरिये पूर्वोत्‍तर राज्‍यों तक जलमार्ग विकसित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। 2017-18 में अन्‍तर्देशीय जलमार्ग पर 55 मिलीयन टन का कार्गो ट्रैफिक रहा और यह 2017-18 में 31 प्रतिशत बढ़ा।

दूरसंचार क्षेत्र

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि 2018-।9 में भारत में कुल टेलीफोन कनेक्‍शन बढ़कर 118.34 करोड़ हो गया। 2013-14 में टेलीफोन कनेक्‍शन की संख्‍या 93.3 करोड़ थी। इस तरह इसमें 26.84 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीफोन कनेक्‍शनों की संख्‍या 51.42 करोड़ है। सभी प्रकार के उपभोक्‍ताओं में वायरलेस टेलीफोन का हिस्‍सा 98.17 प्रतिशत है। मार्च 2019 के अंत तक भारत में सम्‍पूर्ण टेलीफोन घनत्‍व 90.10 प्रतिशत है। ग्रामीण टेलीफोन घन्‍त्‍व 57.50 प्रतिशत तथा शहरी टेलीफोन घनत्‍व 159.66 प्रतिशत रहा।

भारत में मोबाइल उद्योग का विकास पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। जीएसएम रिपोर्ट के अनुसार मोबाइल उद्योग लगभग भारत के जीडीपी में 6.5 प्रतिशत का योगदान देता है। आशा है कि यह 2020 तक बढ़कर 8.2 प्रतिशत हो जाएगा। 2018 में मोबाइल प्रौद्योगिकी तथा सेवाओं ने वैश्विक जीडीपी में 4.6 प्रतिशत का योगदान किया। यह योगदान 4.8 ट्रिलियन डॉलर (जीडीपी का 4.8) प्रतिशत है और इस क्षेत्र ने प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से 32 मिलियन रोजगार सृजन किया।

अगले 15 वर्षों में 5जी टेक्‍नालॉजी वैश्विक अर्थव्‍यवस्‍था में 2.2 ट्रिलियन डॉलर का योगदान करेगी। नई टेक्‍नालॉजी से विनिर्माण, उपयोगिता तथा पेशेवर/वित्‍तीय सेवाओं को सर्वाधिक लाभ प्राप्‍त होगा। 5जी टेक्‍नालॉजी की परिकल्‍पना आधार रूप में नेटवर्क से जुड़े समाज की क्षमता का विस्‍तार करने के लिए की गई है। सरकार ने उच्‍चस्‍तरीय 5जी इंडिया 2020 फोरम का गठन किया था। इस फोरम ने भारत में 5जी का विजन तैयार किया और अगस्‍त 2018 में ‘मेकिंग इंडिया 5जी रेडी’ पर अपनी रिपोर्ट पेश की।

2018-19 के दौरान दूरसंचार क्षेत्र में 2.67 बिलियन डॉलर का प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश आया। यह 2015-16 के 1.3 बिलियन डॉलर के स्‍तर से दोगुना है।

पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस

  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि सरकार का लक्ष्‍य आत्‍मनिर्भरता प्राप्‍त करके देश के ऊर्जा क्षेत्र को ‘रिफॉर्म, परफॉर्म तथा ट्रांसफॉर्म’ करना है। पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने अनेक सुधार और नये कार्यक्रम प्रारंभ किया है। इसमें मुक्‍त रकबा लाइसेंसिंग पालिसी (ओएलपी), खोजे गए छोटे क्षेत्र (डीएसएफ) नीति, तेल और गैस के लिए रिकवरी पद्धति को प्रोत्‍साहित करने की नीति शामिल हैं।
  • सरकार ने इस वर्ष खोज, शीघ्र मुद्रीकरण, प्रोत्‍साहनयुक्‍त उत्‍पादन, प्रक्रिया सरलीकरण और कारोबारी सुगमता को प्रोत्‍साहित करने की दृष्टि से अनेक कदम उठाये हैं।
  • प्रधानमंत्री उज्‍जवला योजना गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की पांच करोड़ महिलाओं को एलपीजी कनेक्‍शन उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से लांच किया था। इस योजना के अन्‍तर्गत 31 मार्च, 2019 तक 7.189 करोड़ एलपीजी कनेक्‍शन जारी किए गए हैं।

विद्युत क्षेत्र

  • विद्युत उत्‍पादन और संप्रेक्षण में सराहनीय प्रगति हुई है। 2018 की 3,44,002 मेगावाट की तुलना में बढ़कर 2019 में 3,56,100.19 मेगावाट हो गई। 2018-19 के दौरान कुल ऊर्जा उत्‍पादन 1376बीयू (आयात सहित तथा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत) हुआ।
  • सौभाग्‍य योजना (प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना) लॉंच किए जाने के बाद से मार्च, 2019 तक 2.62 करोड़ घरों को विद्युतीकृत किया गया है।

आवास

  • रियल एस्‍टेट विनियमन तथा विकास अधिनियम 2016 (रेरा) पारित किया गया ताकि नियमन सुनिश्चित किया जाए और कारगर तथा पारदर्शी तरीके से रियल एस्‍टेट क्षेत्र को प्रोत्‍साहित किया जाए और मकान खरीदार के हित की रक्षा की जाए।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) 25 जून, 2015को लॉंच की गई। इसका उद्देश्‍य सभी पात्र परिवारों/लाभार्थियों को 2022 तक आवासीय सुविधा प्रदान करना था। अब तक पीएमएवाई (यू) के अन्‍तर्गत 4,427 शहरों/नगरों को शामिल किया गया है।
  • जून, 2015 में पांच वर्षों की अवधि के लिए स्‍मार्ट सिटी लॉंच किया गया। इसका उद्देश्‍य शहरों को विकसित करना है ताकि शहरी ढांचागत सुविधा और नागरिकों को अच्‍छा जीवन का माहौल दिया जा सके। एससीएम के अर्न्‍तगत सभी 100 शहरों ने स्‍पेशल परपस व्‍हीकल, शहर स्‍तरीय परामर्श फोरम को अपनाया है और परियोजना प्रबन्‍धन सलाहकारों की नियुक्ति की है। शहरों के लिए ‘इज ऑफ लिविंग’ सूचकांक पर पहली रूपरेखा 2017 में लॉंच की गई जिसका उद्देश्‍य ऐसा सूचकांक बनाना है जो शहरी नियोजन तथा प्रबन्‍धन में डाटा प्रेरित दृष्टिकोण अपनाएं और शहरों के बीच स्‍वस्‍थ्‍य प्रतियोगिता प्रोत्‍साहित करे। इज ऑफ लिविंग सूचकांक 2019 परिणामों पर अधिक फोकस के साथ लागू किया गया।
  • आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि उद्योगों के विकास के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा मूल और आवश्‍यक हैं। पिछले कई वर्षों में भारत ने आधारभूत संरचना पर काफी निवेश किया है, लेकिन चुनौती आधारभूत संरचना क्षेत्र में पर्याप्‍त निवेश जुटाने की है। यह निवेश अनेक ट्रिलियन डॉलर का है। निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के सहयोग से विभिन्‍न नवाचारी उपायों से आधारभूत संरचना क्षेत्र में निवेश अंतर को पाटना होगा। आधारभूत संरचना क्षेत्र में निजी निवेश मुख्‍य रूप से पीपीपी रूप में आया है। यह क्षेत्र बीच में फंसी परियोजनाओं और विवादों/दावों के मामले में फंसी परियोजनाओंकी चुनौती से जूझ रहा है। इस क्षेत्र को व्‍यापक समाधान/निस्‍तारण विकल्‍प विकसित करना होगा। समय की आवश्‍यकता एक संस्‍थागत व्‍यवस्‍था करना है ताकि आधारभूत संरचना क्षेत्र में विवादों का समयबद्ध समाधान हो सके।
  • 2032 तक दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बनने के लिए भारत को मजबूत आधारभूत संरचना विकसित करने की जरूरत है। देश के सम्‍पूर्ण आधारभूत संरचना क्षेत्र की निवेश आवश्‍यकताएं सार्वजनिक निवेश से पूरी नहीं हो सकतीं। इसलिए वास्‍तविक चुनौती सार्वजनिक क्षेत्र के साथ भागीदारी करके देश में पर्याप्‍त निजी निवेश लाना है।

9. सेवा क्षेत्र

केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने आज संसद में वर्ष 2018-19 की आर्थिक समीक्षा पेश की।

सेवा क्षेत्र का भारत के सकल संवर्धित मूल्‍य (जीवीए) में 54 प्रतिशत का योगदान है। इसकी वृद्धि दर 2017-18 के 8.1 प्रतिशत से कम होकर 2018-19 में 7.5 प्रतिशत रह गई। जिन क्षेत्रों में मंदी देखी गई, वे हैं - पर्यटन, व्‍यापार, होटल, परिवहन, संचार और प्रसारण संबंधी सेवाएं, लोक प्रशासन और रक्षा। वित्‍तीय, रियल एस्‍टेट और व्‍यावसायिक सेवाओं की श्रेणी में तेजी देखी गई। 2017-18 के 10.4 मिलियन की तुलना में 2018-19 में 10.6 मिलियन पर्यटक भारत आए। पर्यटन से होने वाली विदेशी मुद्रा की आमदनी 2018-19 में घटकर 27.7 प्रतिशत हो गई, जो 2017-18 में 28.7 अरब अमरीकी डॉलर थी। आईटी-बीपीएम (बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट) उद्योग 2017-18 में 8.4 प्रतिशत बढ़कर 167 अरब अमरीकी डॉलर हो गया और इसके 2018-19 में 181 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच जाने का अनुमान है।

सेवा क्षेत्र में भारत का सकल संवर्धित मूल्‍य

हाल में वृद्धि में नरमी रहने के बावजूद सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन कृषि और विनिर्माण के क्षेत्र में बेहतर होना जारी रहा, जिसका कुल जीवीए वृद्धि में 60 प्रतिशत से अधिक योगदान था।

सेवा क्षेत्र में व्‍यापार

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि 2017-18 (अप्रैल-दिसंबर) में मजबूत प्रदर्शन के बाद अप्रैल-दिसंबर 2018 के दौरान सेवाओं के निर्यात में कुछ मंदी देखने को मिली। उप-क्षेत्रों द्वारा परिवहन सेवाओं के निर्यात में 2017-18 (अप्रैल-दिसंबर) के दौरान अपनी गति मजबूत बनाए रखी। इसे प्रचार करके बेची जाने वाली वस्‍तुओं के व्‍यापार क्रिया कलाप के सुदृढ़ीकरण से सहायता मिली, जबकि कम्‍प्‍यूटर और आईसीटी सेवाओं के निर्यात में निरंतर सुधार जारी रहा। दूसरी तरफ यात्रा की प्राप्तियों में 2017-18 (अप्रैल-दिसंबर) में मजबूत वृद्धि दर्ज किए जाने के बाद अप्रैल-दिसंबर 2018 के दौरान कुछ हद तक नरमी रही, जो इस अवधि के दौरान विदेशी पर्यटकों का आगमन कम होने के तर्ज पर थी। कारोबार सेवाओं के निर्यात में भी यही रुझान देखा गया। इस दौरान सभी क्षेत्रों में आयात में गिरावट आने के परिणामस्‍वरूप पिछले वर्ष से अप्रैल-दिसंबर 2018 के दौरान सेवा आयात घटा है। 2017-18 (अप्रैल-दिसंबर) की स्थिति के अनुसार बढ़ते सेवा व्‍यापार अधिशेष से भारत के लगभग 50 प्रतिशत व्‍यापार घाटे के वित्‍त पोषण में सहायता मिली। तथापि सेवा व्‍यापार अधिशेष मुख्‍यत: कम्‍प्‍यूटर और आईसीटी सेवाओं की वजह से हुआ था और कुछ हद तक यात्रा सेवाओं के परिणाम स्‍वरूप था। साथ-साथ भारत व्‍यापार सेवाओं, बीमा तथा पेंशन में बहुत ही कम व्‍यापार अधिशेष और वित्‍तीय सेवाओं में कम व्‍यापार घाट उठाता है।

सेवा क्षेत्र में विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश (एफडीआई)

सेवा क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी अंतर्वाह भारत में होने वाले कुल एफडीआई इक्विटी अंतर्वाह का 60 प्रतिशत से अधिक है। 2018-19 के दौरान सेवा क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी अंतर्वाह पिछले वर्ष के लगभग 28.26 अरब डॉलर से घटकर 696 अरब डॉलर का रह गया, जो 1.3 प्रतिशत कम था। यह भारत में हुए संपूर्ण एफडीआई अंतर्वाह है। थोड़ी गिरावट की तर्ज पर है। ऐसा उप-क्षेत्रों, जैसे कि दूरसंचार, परामर्शी सेवाओं और वायु तथा जल परिवहन के क्षेत्र में कम एफडीआई अंतर्वाह के कारण हुआ, जिसका मजूबत अंतर्वाह शिक्षा, खुदरा व्‍यापार और सूचना एवं प्रसारण के क्षेत्र में देखने को मिला।

पर्यटन

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि पर्यटन क्षेत्र अर्थव्‍यवस्‍था के विकास का एक प्रमुख तंत्र है, जो जीडीपी, विदेशी मुद्रा अर्जित करने तथा रोजगार के संबंध में महत्‍वपूर्ण योगदान देता है। भारत में 2017-18 में विदेशी पर्यटन आगमन (एफटीए) 14 प्रतिशत से बढ़कर 10.4 मिलियन तथा विदेशी मुद्रा से आमदनी (एफईई) में 20.6 प्रतिशत से 28.7 अरब अमरीकी डॉलर की वृद्धि हुई। तथापि यह क्षेत्र 2018-19 में मंदी का सामना कर रहा है। 2017-18 में 10.4 मिलियन की तुलना में, 2018-19 में विदेशी पर्यटन आगमन (एफटीए) 10.6 मिलियन रहा है। वृद्धि के संबंध में, एफटीए की वृद्धि दर 2017-18 में 14.2 प्रतिशत से घटकर 2018-19 में 2.1 प्रतिशत हो गई है। पर्यटन से प्राप्‍त होने वाली विदेशी मुद्रा आय (एफईई) 2017-18 में 28.7 अरब अमरीकी डॉलर से 2018-19 में घटकर 27.7 अरब अमरीकी डॉलर रह गई है। वृद्धि के संबंस में एफईई 2017-18 में 20.6 प्रतिशत से घटकर 2018-19 में -3.3 प्रतिशत हो गया है। हाल के वर्षों में विदेशी पर्यटन में तेजी आई है। 2016 के 21.87 मिलियन से 2017 के दौरान 23.94 मिलियन भारतीय नागरिकों ने भारत से प्रस्‍थान किया, जो 9.5 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। यह भारत में आने वाले विदेशी पर्यटकों की तुलना में दोगुने से अधिक है।

आईटी-बीपीएम सेवा

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि नैस्‍कॉम के आंकड़ों के अनुसार भारतीय आईटी-बीपीएम उद्योग 2016-17 में 154 अरब अमरीकी डॉलर से 2017-18 में 8.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 167 अरब अमरीकी डॉलर (ई-कॉमर्स को छोड़कर, लेकिन हार्डवेयर सहित) पर पहुंच गया। इसके 2018-19 में 181 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंचने की उम्‍मीद है। आईटी-बीपीएम निर्यात 2017-18 में 7.7 प्रतिश बढ़कर 126 अरब अमरीकी डॉलर हो गया और अनुमान है कि 2018-19 में यह 12 प्रतिशत की वृद्धि दर से 136 अबर अमरीकी डॉलर तक पहुंच जाएगा। अनुमान है कि वित्‍त वर्ष 2018-19 में ई-वाणिज्‍य बाजार 12 प्रतिशत की वृद्धि दर से 43 अरब अमरीकी डॉलर पर पहुंच जाएगा। आईटी सेवाएं लगभग 20 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी के साथ बीपीएम द्वारा अनुसरित लगभग 52 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी के साथ सबसे बड़ा हिस्‍सा है। सॉफ्टवेयर उत्‍पाद तथा इंजीनियरिंग सेवाओं के साथ लगभग 19 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी है, जबकि हार्डवेयर की 10 प्रतिशत है।

मीडिया और मनोरंजन सेवा

मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र में मुख्‍य रूप से टेलीविजन, प्रिंट, रेडियो, फिल्‍में, संगीत, डिजिटल विज्ञान, ओवर द टॉप (इंटरनेट पर डाली गई ओटीटी फिल्‍म तथा टेलीविजन सामग्री), विजुअल इफैक्‍ट (वी इफैक्‍ट्स) और गेमिंग शामिल है। प्रौद्योगिकी ने इस क्षेत्र में बहुत तेजी से बदलाव किए हैं। विशेष रूप से सामग्री और वाहक में। फिक्‍की-ईवाई मीडिया और मनोरंजन रिपोर्ट, 2019 के अनुसार इस उद्योग का आकार 2013 में 91,810 करोड़ रुपये से 2018 में 1,67,500 करोड़ रुपये तक बढ़ गया है। पिछले पांच वर्षों में 82.44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ओडियो विजुअल सेवाओं की सरकार द्वारा विकास पर केन्द्रित चुने गए (2018) 12 सर्वोत्‍तम सेवा क्षेत्रों में से एक के रूप में पहचान की गई है, ताकि इसकी पूर्ण क्षमता का उपयोग किया जा सके।

10. सामाजिक अवसंरचना, रोजगार और मानव विकास

आर्थिक समीक्षा 2018-19 में सामाजिक अवसंरचना विशेषकर शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश के महत्व को रेखांकित किया गया है। समावेशी विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए इसे विकास रणनीति की प्राथमिकता माना गया है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार “गरीबी तथा अन्य समस्याओं को समाप्त करने के लिए ऐसी नीतियां होनी चाहिए जो स्वास्थ्य और शिक्षा को बेहतर बनाती है, असमानता को कम करती है और दीर्घकालिक उपायों के तहत आर्थिक विकास को गति देती है।“ सतत विकास लक्ष्य 2030 हासिल करने के लिए भारत गंभीरता से प्रयास कर रहा है। केन्‍द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2018-19 पेश की।

सामाजिक क्षेत्र में परिव्यय की प्रवृत्तियाँ

केन्द्र और राज्यों द्वारा सामाजिक सेवाओं पर परिव्यय 2014-15 के 7.68 लाख करोड़ से बढ़कर 2018-19 (बीई) में 13.94 लाख करोड़ हो गया। केन्द्र और राज्यों द्वारा सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में सामाजिक सेवाओं पर खर्च में 1 प्रतिशत से अधिक अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसके फलस्वरूप वर्ष सामाजिक सेवाओं पर खर्च वर्ष 2014-15 में 6.2 से बढ़कर वर्ष 2018-19 (बीई) में 7.3 प्रतिशत तक हो गया है। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर किए जाने वाला खर्च 2014-15 में 2.8 प्रतिशत था जो 2018-19 (बीई) में बढ़कर 3 प्रतिशत हो गया। इसी प्रकार जीडीपी के प्रतिशत के रूप में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक परिव्यय 1.2 से बढ़कर 1.5 प्रतिशत हो गया।

महिला सशक्तिकरण

महिलाओँ को मुख्य धारा में लाने और समाज में बदलाव के लिए सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, उज्जवला योजना, पोषण अभियान, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत की है। समय के साथ परिवार के निर्णय में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। एनएफएचएस-4 के अनुसार अखिल भारतीय स्तर पर परिवार में निर्णय लेने के मामले में विवाहित महिलाओं की भागीदारी 2005-06 के 76.5 प्रतिशत से बढ़कर 2015-16 में 84 प्रतिशत हो गई है। अखिल भारतीय स्तर पर महिलाओं के वित्तीय समावेश में भी वृद्धि दर्ज की गई है। बैंकिंग सेवाएं या बचत खाते जो महिलाएं स्वयं उपयोग करती हैं – 2005-06 में महिलाओं का अनुपात 15.5 प्रतिशत था जो 2015-16 में बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया है। सभी मंत्रालयों में लिंगानुपात को ध्यान में रखते हुए बजट, योजना और कार्यक्रम बनाये जा रहा है।

सामाजिक सुरक्षा योजनाएं

आर्थिक सर्वेक्षण में पिछले पांच वर्षों के दौरान सरकार द्वारा प्रारंभ किए गए विभिन्न सामाजिक योजनाओँ को रेखांकित किया गया है। यह देश के लोगों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दर्शाता है। पीएम किसान -2019 के अंतर्गत 3.10 करोड़ सीमांत किसानों को 2,000 रुपये की पहली किस्त प्राप्त हुई है तथा 23 अप्रैल, 2019 तक 2.10 करोड़ किसानों को दूसरी किस्त प्राप्त हुई है। 30 दिसंबर, 2018 तक आयुष्मान भारत के अंतर्गत 6.18 लाख लोग पीएमजेएवाई योजना से लाभांवित हुए हैं। 39.48 लाख ई-कार्ड जारी किए गए हैं। 25 राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों के 5.33 लाख गांवों को स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित किया गया है। 2 अक्टूबर, 2019 तक पूरा देश ओडीएफ हो जाएगा।

31 अक्टूबर, 2018 तक प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के अंतर्गत 14.27 करोड़ पंजीयन हुए हैं। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के तहत 5.57 करोड़ पंजीयन हुआ है। प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना के तहत ईपीएफओ को उद्यमियों द्वारा दिया जाने वाला 12 प्रतिशत अंशदान नए कर्मचारियों (मासिक वेतन 15,000 रुपये से कम) के संदर्भ में शुरुआती तीन वर्षों तक सरकार द्वारा दिया जाएगा। अटल पेंशन योजना, अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना, प्रधानमंत्री वय वंदना योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से लोगों को सीधा लाभ प्राप्त हुआ है।

शिक्षा

आर्थिक समीक्षा के अनुसार प्राथमिक शिक्षा पर विशेष जोर देने के सुखद परिणाम सामने आए हैं, जैसा शैक्षणिक सांख्यिकी, एक नज़र में (ईएसएजी) में दिखाया गया है। 12वीं तक की शिक्षा में लड़कियों की संख्या में वृद्धि हुई है। लड़कियों के लिए कुल नामांकन दर (जीईआर) लड़कों के नामांकन दर की अपेक्षा अधिक हो गई है। पहली बार आठवीं कक्षा तक कक्षावार और विषयवार ज्ञान प्राप्ति को शिक्षा में गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए विकसित किया गया है। 2018-19 में लॉन्च किए गए समग्र शिक्षा कार्यक्रम का उद्देश्य प्री स्कूल से लेकर 12वीं कक्षा तक गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करना है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ तथा आईसीटी द्वारा संचालित ई-पाठशाला और सारांश जैसे कार्यक्रमों ने शिक्षा प्राप्ति को आसान बनाया है। आर्थिक समीक्षा में 12वीं कक्षा के स्तर पर पढ़ाई छोड़ना, शिक्षकों की कमी और उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए आवश्यक बदलाव को चिंता का विषय माना गया है।

स्वास्थ्य

आर्थिक समीक्षा के अनुसार मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) में 37 अंकों की गिरावट आई है। 2011-13 में यह प्रति लाख जीवित जन्म के लिए 167 थी जो 2014-16 में घटकर प्रति लाख जीवित जन्म के लिए 130 हो गई है। पांच वर्ष से कम के बच्चों की मृत्यु दर (यू-5एमआर) 2008-16 के दौरान 6.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से कम हुई है। 1990-2007 के दौरान प्रतिवर्ष कम होने की दर 3.3 प्रतिशत थी। मातृ और नवजात के स्वास्थ्य से संबंधित नई योजनाओं में शामिल हैं – लक्ष्य (गुणवत्ता को बेहतर बनाने की पहल)। इस योजना के तहत माँ और नवजात की मृत्यु, रुग्णता आदि के संबंध में देखभाल की जाती है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गर्भवती महिलाओं को प्रत्येक महीने की 9 तारीख को गुणवत्तापूर्ण देखभाल की सुविधा प्रदान की जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती बनाने के लिए वैकल्पिक स्वास्थ्य देखभाल एक उपाय है। राष्ट्रीय आयुष मिशन का उद्देश्य पूरे देश में किफायती आयुष स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना है।

कौशल विकास और रोजगार

श्रम बल की रोजगार क्षमता को बेहतर बनाने के लिए कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसके लिए राष्ट्रीय कौशल विकास व उद्यमिता नीति बनाई गई है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, प्रधानमंत्री कौशल केंद्र, राष्ट्रीय कार्य कौशल संवर्धन योजना आदि का शुभारंभ किया गया है। लाभार्थियों को स्किल वाउटर दिए गए हैं जिनकी मदद से वे किसी भी प्रशिक्षण केन्द्र में व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। आर्थिक समीक्षा के अनुसार स्थानीय उद्यमों की सहायता से पाठ्यक्रमों का विकास, प्रशिक्षण के तरीके, उपक्रम की उपलब्धता प्रशिक्षण प्रदान करने वालों का प्रशिक्षण आदि कदमों से कौशल विकास को समुचित सहायता प्राप्त होगी। श्रमबल के रोजगार के वार्षिक अनुमान के लिए आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) का शुभारंभ किया गया है। ईपीएफओ आंकड़ों के अनुसार मार्च 2019 में रोजगार के 8.15 लाख औपचारिक अवसरों का सृजन हुआ है।

कनेक्टिविटी के बेहतर होने से लोगों की जीवन संबंधित गुणवत्ता बेहतर होती है। लोग चिकित्सा सेवाओ, स्कूलों, बाजारों व अन्य सामाजिक सेवाओं तक आसानी से पहुंच पाते हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के अंतर्गत 2014 से 1,90,000 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ है। ग्रामीण गरीबी और बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए मनरेगा एक प्रभावी कार्यक्रम है। इसके तहत ग्रामीण गरीबों और अकुशल श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। 2018-19 के दौरान इस योजना के तहत रोजगार के 267.96 करोड़ कार्य दिवसों का सृजन हुआ। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 31 मार्च, 2019 तक एक करोड़ पक्के आवासों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इस योजना के तहत 31 मार्च, 2019 तक 1.54 करोड़ घरों का निर्माण पूरा हो चुका है जो निर्धारित लक्ष्य से अधिक है। मानव संसाधन और समावेशी विकास में निवेश करते हुए भारत सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) हासिल करने की दिशा में अग्रसर है।

Courtesy: PIB




Get Daily Dhyeya IAS Updates via Email.

 

After Subscription Check Your Email To Activate Confirmation Link