(दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर) यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में समाचार पत्रों का संकलन (22 अप्रैल 2020)

दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर


(दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर) यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में समाचार पत्रों का संकलन (22 अप्रैल 2020)


:: राष्ट्रीय समाचार ::

राष्ट्रीय कार्यक्रम विद्यादान 2.0 का शुभारंभ

  • केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल 'निशंक'ने ई-लर्निंग सामग्री योगदान के लिए नई दिल्ली में विद्यादान 2.0 कार्यक्रम शुरू किया।
  • यह कार्यक्रम विशेष रूप से कोविड -19 से उत्पन्न स्थिति की पृष्ठभूमि में छात्रों (स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों) के लिए ई-लर्निंग कंटेंट की बढ़ती आवश्यकता और स्कूली शिक्षा के साथ डिजिटल शिक्षा को एकीकृत करते हुए संवर्धित शिक्षा की तत्काल आवश्यकता के कारण भी शुरू किया गया है ।

मोबाइल ऐप संयम

  • घरों में क्वारंटाइन नागरिकों की प्रभावी निगरानी और वास्तव में वे घर पर ही रुके हुए हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए स्मार्ट सिटी मिशन (एससीएम) के अंतर्गत आने वाले पुणे नगर निगम ने संयम नाम से एक मोबाइल एप्लीकेशन विकसित किया है। शहरी प्रशासन ने घरों में क्वारंटाइन नागरिकों की निगरानी के लिए तकनीक समाधानों के द्वारा कई प्रशासनिक कदम उठाए हैं।
  • टीम जांच करेंगी कि होम क्वारंटाइन में मौजूद लोगों ने संयम मोबाइल एप्लीकेशन डाउनलोड किया है। मोबाइल एप्लीकेशन में जीपीएस ट्रैकिंग है, जिससे क्वारंटाइन नागरिकों के घर से बाहर निकलने की स्तिति में शहरी प्रशासन को तुरंत अलर्ट मिल जाता है और स्थानीय वार्ड या स्थानीय पुलिस को सूचना भेज दी जाती है, जिसके बाद परिवार से संपर्क किया जाता है।
  • सभी होम क्वारंटाइन नागरिकों को ऐप डाउनलोड करने और उसे इंस्टाल करने के निर्देश दे दिए गए हैं। इन चिह्नित नागरिकों को क्वारंटाइन अवधि के दौरान मोबाइल डिवाइस 24 घंटे चालू रखने और जीपीएस को हमेशा ही स्विच-ऑन रखने की सलाह दी जाती है। निगरानी इकाई द्वारा केन्द्रीय स्तर पर नागरिकों की आवाजाही पर रियल-टाइम आधार पर नजर रखी जा सकती है और उन्हें लाल, पीला या हरे रंग से चिह्नित किया जा सकता है। लाल रंग से पता चलता है कि लोग लंबी अवधि से बाहर हैं; पीले रंग का मतलब है कि लोग सीमित आवाजाही कर रहे हैं और हरे रंग का मतलब है कि लोग घर के भीतर ही हैं।

इंटरनेट इन्फ्रा ऑनलाइन शिक्षा के लिए तैयार नहीं : रिपोर्ट

  • कोरोना वायरस के कारण उपजी परिस्थिति में भारतीय इंटरनेट इन्फ्रास्ट्रक्चर ऑनलाइन शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। शैक्षणिक संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग तैयार करने वाली संस्था क्वाकक्वारेल्ली सायमंड्स (क्यूएस) की एक रिपोर्ट में यह कहा गया है।
  • 'कोविड-19 : दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के लिए जागने का समय' शीर्षक रिपोर्ट क्यूएस आइ गौज द्वारा किए गए सर्वे पर आधारित है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि ऑनलाइन कक्षाओं के समय छात्रों को सबसे ज्यादा कनेक्टिविटी और सिग्नल में बाधा का सामना करना पड़ता है।
  • रिपोर्ट के मुताबिक, 'सर्वेक्षण में उल्लेख किया गया है कि भारत में प्रौद्योगिकी की बुनियादी संरचना इतनी गुणवत्तापूर्ण नहीं हो पाई है कि देश भर में छात्रों को ऑनलाइन कक्षाएं आसानी से उपलब्ध कराई जा सकें। ऐसा देखा गया है कि सरकारी और निजी क्षेत्र भी तकनीकी चुनौतियों से उबर नहीं पाए हैं। मसलन, पर्याप्त बिजली आपूर्ति और प्रभावी कनेक्टिविटी की कठिनाइयां हैं।' इसमें कहा गया, 'कोविड-19 के संक्रमण के कारण दुनिया कक्षाएं मुहैया कराने के लिए परंपरागत तरीकों से ऑनलाइन माध्यम की दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन समुचित इन्फ्रास्ट्रक्चर के अभाव में शिक्षा के लिए ऑनलाइन माध्यम पर पूरी तरह निर्भरता दूर का ही सपना है।'

26 दिन में लगाई नौ हजार ऑनलाइन कक्षाएं

  • लॉकडाउन में अकादमिक गतिविधियां ठप होने से कई लोग चिंतित हैं, ऐसे समय में मध्य प्रदेश के विश्वविद्यालयों ने सिर्फ 26 दिन में नौ हजार ऑनलाइन कक्षाएं लगाईं। प्रदेशभर के 19 सरकारी विश्वविद्यालयों ने ऑनलाइन कक्षाएं संचालित की हैं। पिछले दिनों राज्यपाल लालजी टंडन द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये की गई समीक्षा में यह जानकारी सामने आई है। समीक्षा बैठक में सभी विश्वविद्यालयों ने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश किया था।
  • लॉकडाउन में न सिर्फ विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन कक्षाएं संचालित की गई बल्कि चार हजार वीडियो लेक्चर भी विश्वविद्यालयों ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड किए। इसके जरिये विद्यार्थी कभी भी अपने विषय का लेक्चर ऑनलाइन देख सकते हैं।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि स्कीम में कुछ राज्यों को छुट

  • प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पीएम-किसान स्कीम के तहत असम एवं मेघालय राज्यों तथा जम्मू एवं कश्मीर और लद्वाख केंद्र शासित प्रदेशों के लाभार्थियों को उन्हें लाभ जारी किए जाने के लिए डेटा की आधार सीडिंग की अनिवार्य आवश्यकता में 31 मार्च, 2021 तक ढील देने को अपनी मंजूरी दे दी है।

क्या है स्कीम की विशेषता?

  • प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) स्कीम माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 24 फरवरी, 2019 को लांच की गई थी। इस स्कीम का उद्वेश्य कुछ विशेष अपवर्जनों के अधीन, खेती भूमि के साथ देश भर में सभी भूस्वामी कृषक परिवारों को आय सहायता उपलब्ध कराना है। इस स्कीम के तहत, 6000 रुपये प्रति वर्ष की राशि लाभार्थियों के बैंक खातों में चार-चार महीने पर2000 रुपये प्रत्येक की तीन किस्तों में जारी की जाती है। यह योजना 1 दिसंबर, 2018 से प्रभावी है। 1 दिसंबर, 2019 से असम एवं मेघालय राज्यों तथा जम्मू एवं कश्मीर और लद्वाख केंद्र शासित प्रदेशों के मामलों को छोड़कर, जिन्हें बेहद मामूली आधार पैठ के कारण इस आवश्यकता से 31 मार्च, 2020 तक रियायत दी गई है, लाभ की राशि केवल पीएम-किसान पोर्टल पर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश सरकारों द्वारा अपलोड किए गए लाभार्थियों के आधार सीडेड डेटा के जरिये ही जारी की जाती है।

क्यूँ किया जा रहा है?

  • ऐसा आकलन किया गया है कि असम एवं मेघालय राज्यों तथा जम्मू एवं कश्मीर और लद्वाख केंद्र शासित प्रदेशों के लाभार्थियों के डेटा की आधार सीडिंग के कार्य को पूरा करने में अभी बहुत अधिक समय लगेगा और अगर डेटा की आधार सीडिंग की अनिवार्य आवश्यकता में ढील को और विस्तार न दिया गया तो इन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लाभार्थी 1 अप्रैल, 2020 के बाद से इस स्कीम का लाभ उठाने में सक्षम नहीं हो पाएंगे।
  • इन राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में लाभार्थी किसानों की कुल संख्या, जिन्हें 8.4.2020 तक कम से कम एक किस्त का भुगतान किया गया है, असम में 27,09,586 लाभार्थी हैं, मेघालय में 98,915 लाभार्थी हैं और लद्वाख सहित जम्मू एवं कश्मीर में 10,01,668 लाभार्थी हैं।

फॉस्फोरस युक्‍त और पोटाशयुक्‍त (पीएंडके) उर्वरकों के (एनबीएस) दरों के निर्धारण को मंजूरी दी

  • प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थि‍क मामलों पर कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने वर्ष 2020-21के लिए फॉस्फोरस युक्‍त और पोटाशयुक्‍त (पीएंडके) उर्वरकों के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) दरों के निर्धारण को अपनी मंजूरी दे दी है।
  • सीसीईए ने एनबीएस योजना के तहत अमोनियम फॉस्फेट (एनपी 14:28:0:0)  नामक एक जटिल उर्वरक को भी शामिल करने को मंजूरी दे दी है।
  • 2020-21 के दौरान पीएंडके उर्वरकोंपर सब्सिडी देने पर 22,186.55 करोड़ रुपये का अनुमानित खर्च आएगा।
  • उर्वरक कंपनियों को सीसीईए द्वारा अनुमोदित सब्सिडी दरों पर पीएंडके पर सब्सिडी प्रदान की जाएगी।

पृष्ठभूमि:

  • सरकार उर्वरक निर्माताओं/आयातकों के माध्यम सेकिसानों को रियायती मूल्यों पर यूरिया और पीएंडके उर्वरकों की 21 श्रेणियां उपलब्ध करा रही है। पीएंडके उर्वरकों पर सब्सिडी एनबीएस योजना के तहत 01 अप्रैल 2010 से ही दी जा रही है। सरकार अपने किसान अनुकूल दृष्टिकोण के अनुसारकिसानों को किफायती कीमत पर पीएंडके उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।उर्वरक कंपनियों को उपर्युक्त दरों के अनुसार ही सब्सिडी दी जाएगी,ताकि वे किसानों को सस्ते दामों पर उर्वरक उपलब्ध करा सकें,अन्‍यथा यह संभव नहीं हो पाता।

:: अंतर्राष्ट्रीय समाचार ::

पाक ने आतंकियों की सूची से लखवी का नाम हटाया

  • पाकिस्तान ने अपनी निगरानी सूची से 3800 आतंकियों के नाम हटा दिए हैं। करीब 1800 नाम तो इस साल मार्च में ही हटाए गए, जिसमें 2008 के मुंबई हमले में आरोपित जकीउर रहमान लखवी का नाम भी शामिल है। यह जानकारी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस (एआइ) स्टार्टअप कैस्टेलम डाट एआई से सामने आई है।
  • एफएटीएफ की रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2018 में पाक की आतंकियों की सूची में 7600 नाम थे। नए डाटा स्रोतों का इस्तेमाल करने वाले कैस्टेलम ने पाया कि 9 से 27 मार्च के बीच इमरान सरकार ने पहले 1069 नाम सूची से हटा दिए। 27 मार्च के बाद 800 नाम और हटा दिए गए। अब इस सूची में 3800 नाम हैं। यानी डेढ़ साल में करीब इतने ही नाम सूची से हटाए गए। यह सूची तैयार करने और अपडेट करने की जिम्मेदारी पाकिस्तान की एजेंसी नेशनल काउंटर टेररिज्म एथारिटी की है। सूची तैयार करने का मकसद यह कि इसमे दर्ज किसी व्यक्ति से कोई वित्तीय संस्थान किसी तरह का आर्थिक लेनदेन न करे।

पृष्ठभूमि

  • दुनिया भर में आतंकी गतिविधियों को होने वाली फंडिंग पर नजर रखने वाली एजेंसी फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पाक को ग्रे लिस्ट में रखा है। इस लिस्ट से बाहर आने के लिए एफएटीएफ ने गत फरवरी में पाक के समक्ष 27 शर्ते रखी थीं, जिनमें से इमरान सरकार ने 14 शर्तो पर ही थोड़ा बहुत काम किया है। इस मामले में एफएटीएफ जून माह में पाक की फिर समीक्षा करेगा। समझा जा रहा है कि सूची में हेराफेरी का मकसद किसी तरह ग्रे लिस्ट से बाहर निकलना है।

FATF- फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स  क्या है?

  • यह एक अंतर-सरकारी निकाय है जिसे फ्रांस की राजधानी पेरिस में जी7 समूह के देशों द्वारा 1989 में स्थापित किया गया था।
  • इसका काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धन शोधन (Money Laundering), सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार और आतंकवाद के वित्तपोषण जैसी गतिविधियों पर नजर रखना है।
  • इसके अलावा एफएटीएफ वित्त विषय पर कानूनी, विनियामक और परिचालन उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन को बढ़ावा भी देता है।
  • एफएटीएफ के निर्णय लेने वाले निकाय को एफएटीएफ प्लेनरी कहा जाता है। इसकी बैठक एक साल में तीन बार होती है।

सुनामी के खतरे में फुकुशिमा न्यूक्लियर स्टेशन

  • जापान के टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर को (Tokyo Electric Power Co- TEPCO) ने देश में फिर से सुनामी आने की चेतावनी दी है। बुधवार को टेप्को ने सरकारी रिपोर्ट का आकन करते हुए बताया कि देश को फिर से खतरनाक सुनामी का सामना करना पड़ सकता है जिसका प्रभाव फुकुशिमा न्यूक्लियर स्टेशन पर भी पड़ेगा। साल 2011 में भयंकर भूकंप और सूनामी से यह स्टेशन बहुत प्रभावित हुआ था, जिसे टेप्को अपने फुकुशिमा दाइची संयंत्र की साइट को साफ करने की कोशिश कर रहा है।
  • वहीं जापान सरकार के एक पैनल ने कहा है कि देश को एक बार फिर खतरनाक सुनामी का सामना करना पड़ सकता है। चेतावनी दी गई है कि इस बार यदि सुनामी आई तो लहरें 30 मीटर यानी 98 फीट से ज्यादा ऊंची उठेंगी और ये सब एक जोरदार भूकंप के आने के बाद होगा। इसके साथ ही पैनल ने कहा है कि भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 9 हो सकती है.
  • भूकंप और सुनामी पर काम करने वाले एक्सपर्ट्स कहा कहना है कि भूकंप प्रशांत महासागर के नीचे धरती की प्लेटों में कभी भी आ सकता है, जिसकी वजह से देश का होकाइडो और इवाते परफेक्टर सुनामी के खतरे में आ सकते हैं।
  • सरकारी पैनल की तरफ से यह भी कहा गया है कि जापान में हर 300 से 400 साल के बाद महाभूकंप और महासुनामी आती है। इससे पहले 17वीं सदी में आई थी और अब फिर से वो समय आ गया है।

ईरान ने सैन्‍य उपग्रह 'नूर'

  • कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी और अमेरिका के साथ व्यापक तनाव के बीच ईरान ने अपने एक सैन्‍य उपग्रह को लॉन्‍च किया है। ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने बुधवार को कहा कि एक सैन्‍य उपग्रह को लॉन्‍च किया गया है। रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने कहा कि कई बार असफलताओं के बाद बुधवार को सैन्‍य उपग्रह सफल प्रक्षेपण किया गया। ईरानी सेना ने इस उपग्रह का नाम 'नूर' यानी रोशनी रखा है। उपग्रह सफलतापूर्वक पृथ्वी की सतह से 425 किलोमीटर (264 मील) की कक्षा में पहुंच गया।

:: भारतीय अर्थव्यवस्था ::

फेसबुक ने जियो प्लेटफार्म्स में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी

  • सोशल मीडिया क्षेत्र की दिग्गज अमेरिकी कंपनी फेसबुक ने बुधवार को मुकेश अंबानी के नेतृव वाले रिलायंस इंडस्ट्रीज समूह की कंपनी जियो प्लेटफार्म्स लिमिटेड में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के लिए 5.7 अरब डॉलर या करीब 43,574 करोड़ रुपये निवेश का करार किया है।
  • इस सौदे से रिलायंस इंडस्ट्रीज समूह को अपने कर्ज का बोझ कम करने में मदद मिलेगी तथा फेसबुक की भारत में स्थिति और मजबूत होगी। रिलायंस इंडस्ट्रीज के दूरसंचार नेटवर्क जियो की शत प्रतिशत हिस्सेदारी जियो प्लेटफार्म्स लिमिटेड के पास है। जियो प्लेटफार्म्स में फेसबुक की हिस्सेदारी 9.99 प्रतिशत होगी।

जियो प्लेटफार्म्स कंपनी

  • जियो प्लेटफार्म्स, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) के पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है, जो तमाम प्रकार की डिजिटल सेवाएं प्रदान करती है। इसके ग्राहकों की संख्या 38.8 करोड़ से अधिक है। आरआईएल द्वारा अपने कर्ज को कम करने के प्रयासों के तहत फेसबुक के साथ यह सौदा किया गया है। इसके लिए आरआईएल अपने व्यवसायों में रणनीतिक भागीदारी की तलाश कर रही है। समूह अपने तेल-रसायन कारोबार में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिए सऊदी अरामको के साथ बातचीत भी कर रही है। समूह ने अगले साल तक कर्ज मुक्त होने का लक्ष्य तय किया है। जियो में हिस्सेदारी के लिए कथित तौर पर गूगल से भी बातचीत की जा रही थी, लेकिन उन बातचीत के नतीजे के बारे में जानकारी फिलहाल नहीं है। ताजा सौदा जियो और फेसबुक दोनों के लिए फायदेमंद है क्योंकि चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट बाजार है।

UPI, IMPS लेनदेन में कमी एवं RTGS में आई तेजी

  • UPI पेमेंट सिस्टम के जरिए मार्च महीने में लेनदेन में कमी आई है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक मार्च में यूपीआई लेनदेन की संख्या घटकर 124.68 करोड़ रह गई, जबकि फरवरी में 132.57 करोड़ थी।
  • एनपीसीआई के आंकड़ों के मुताबिक IMPS (तत्काल भुगतान सेवा) लेनदेन की संख्या भी मार्च में घटकर 21.68 करोड़ रह गई, जबकि फरवरी में यह आंकड़ा 24.78 करोड़ था।
  • इस दौरान लेनदेन का मूल्य भी 2.14 लाख करोड़ रुपये से घटकर 2.01 लाख करोड़ रुपये रह गया। इस बीच रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक आरटीजीएस (तत्काल सकट निपटान) लेनदेन फरवरी के मुकाबले मार्च में 34 फीसद बढ़कर 120.47 लाख करोड़ रुपये हो गया।

UPI क्या है?

  • यह ऐसा कॉन्सेप्ट है, जो कई बैंक अकाउंट को एक मोबाइल एप्लीकेशन के जरिये रकम ट्रांसफर करने की इजाजत देता है. इसे नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (NPCI) ने विकसित किया है. इसका नियंत्रण रिजर्व बैंक और इंडियन बैंक एसोसियेशन के हाथ में है.

इमीडियेट पेमेंट ट्रांसफर सर्विस (IMPS) क्या है?

  • इमीडियेट पेमेंट ट्रांसफर सर्विस (IMPS) आपको तुरंत फंड ट्रांसफर करने की इजाजत देता है और इसका अपर ट्रांसफर लिमिट 2 लाख रुपये है। IMPS के लिए फंड ट्रांसफर अमाउंट के आधार पर 5 से 15 रुपये तक फंड ट्रांसफर चार्ज लिया जाता है।

रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (RTGS) क्या है?

  • रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (RTGS) एक बड़े अमाउंट वाले लेनदेन के लिए होता है और इसके माध्यम से आप 2 लाख रुपये से बड़ी रकम ट्रांसफर कर सकते हैं। जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है, इस माध्यम से होने वाला मनी ट्रांसफर, रियल टाइम बेसिस पर होता है। RTGS ट्रांसफर के लिए कोई अपर लिमिट नहीं है।

आयातित तांबे के प्रोडक्ट्स की कथित डंपिंग की जांच करेगा भारत

  • भारत ने चीन, कोरिया, मलेशिया, नेपाल, श्रीलंका और थाईलैंड से आयातित ऑटो और इलेक्ट्रिकल इंडस्ट्री में उपयोग होने वाले तांबे से बने फ्लैट प्रोडक्ट्स की कथित डंपिंग की शिकायत के बाद जांच शुरू कर दी है।  एक घरेलू निर्माता अग्रवाल मेटल वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड ने इन छह देशों से आयातित तांबे और तांबे की मिश्र धातु के फ्लैट प्रोडक्ट्स के आयात पर एंटी-डंपिंग जांच के लिए वाणिज्य मंत्रालय की जांच शाखा डीजीटीआर के समक्ष एक आवेदन दायर किया था। आवेदक ने इन देशों से माल की डंपिंग का आरोप लगाया है और आयात पर डंपिंग रोधी ड्यूटीज लागू करने का अनुरोध किया है।

डंपिंग क्या है?

  • किसी देश द्वारा दूसरे मुल्क में अपने उत्पादों को लागत से भी कम दाम पर बेचने को डंपिंग कहा जाता है।
  • इससे घरेलू उद्योगों का सामान महंगा पड़ने के कारण वे बाजार में पिट जाते हैं।
  • सरकार इसे रोकने के लिए निर्यातक देश में उत्पाद की लागत और अपने यहां मूल्य के अंतर के बराबर शुल्क लगा देती है। इसे ही डंपिंगरोधी शुल्क यानी एंटी डंपिंग ड्यूटी कहा जाता है।

:: विज्ञान और प्रौद्योगिकी ::

झाड़ लता (कोक्यूलस हिसरुटस): हर्बल बेल

  • कोरोना वायरस के खिलाफ छिड़ी जंग में अब देसी जड़ी-बूटियों को भी आजमाने की तैयारी है। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) ने झाड़ लता (कोक्यूलस हिसरुटस) नामक हर्बल बेल से तैयार होने वाली औषधि को कोरोना संक्रमण से निपटने में सबसे उपयोगी पाया है। फिलहाल इस बेल का इस्तेमाल डेंगू के लिए तैयार की जा रही हर्बल औषधि को बनाने में किया जा रहा है। सीएसआइआर अब इस बेल से तैयार हर्बल औषधि को कोरोना के मरीजों पर आजमाने की तैयारी में है। उसने ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआइ) से इसके क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी मांगी है। डीसीजीआइ की बुधवार को होने वाली उच्चस्तरीय समिति की बैठक में इसके क्लीनिकल ट्रायल को मंजूरी मिलने की पूरी संभावना है।

क्या है झाड़ लता की विशेषता?

‘इस हर्बल बेल का इस्तेमाल अभी मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में एलर्जी सहित कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है। इसके जरिये कोरोना पीड़ितों की रोग प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। इस बेल का इस्तेमाल डेंगू के लिए तैयार की जा रही हर्बल औषधि को बनाने में किया जा रहा है।

कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने की तेजी के हो सकते है दुष्परिणाम

  • दुनियाभर में इस समय कोरोना वायरस (कोविड-19) की वैक्सीन बनाने की मानो रेस चल रही है। हर देश जल्द से जल्द वैक्सीन बना लेना चाहता है। वैसे तो ऐसे प्रोजेक्ट की संख्या सैकड़ों में है, लेकिन 86 प्रोजेक्ट दमदार माने जा रहे हैं। इनके शोधकर्ता वैक्सीन विकसित करने के अहम पड़ाव पर हैं। कुछ तो ह्यूमन ट्रायल के करीब पहुंच चुके हैं।
  • इंडिपेंडेंट के अनुसार इसे लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और ब्रिटेन के वायरोलॉजिस्ट को एक चिंता भी है। यदि प्रायोगिक वैक्सीन में कुछ भी गलत हुआ तो हजारों-लाखों लोग प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा लैब की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल कायम है। ब्रिटेन के चीफ साइंटिफिक एडवाइजर सर पैट्रिक वालांसे भी इससे चिंतित हैं।

वर्षों तक करनी होगी देखभाल :

  • दुनियाभर में यदि सभी 86 प्रोजेक्ट ह्यूमन ट्रायल तक पहुंच गए तो आठ से नौ लाख लोगों पर प्रायोगिक वैक्सीन का इस्तेमाल किया जाएगा। ब्रिटेन में ही इनकी संख्या एक लाख तक हो सकती है, जहां ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी भी ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन के साथ वैक्सीन विकसित करने में लगी हुई है। एक एक्सपर्ट ने बताया कि हमें वैक्सीन के ह्यूमन ट्रायल के लिए आगे आने वाले लोगों की वर्षों तक देखभाल करनी होगी, क्योंकि हमें नहीं पता कि इन वैक्सीन का क्या प्रभाव होने वाला है।

बहुत बड़ा है खतरा :

  • विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि कोरोना की किसी प्रस्तावित वैक्सीन में कोई गड़बड़ी हुई तो ह्यूमन ट्रायल के दौरान हम एक नए तरह के संक्रमण को जन्म दे देंगे। इंडिपेंडेंट के अनुसार यह संक्रमण भी बहुत तेजी से दुनिया में फैला देगा। ऐसा होने पर करोड़ों-अरबों डॉलर भी डूब जाएंगे। ऐसे में सभी नियामकों और सरकारों के साथ शोधकर्ताओं को थोड़ा रुककर अपनी सारी गणनाएं दोबारा कर लेनी चाहिए। वैसे भी दुनिया में एंटी-वैक्सीन लॉबी है, जिसे शोधकर्ताओं के किसी भी गलत कदम का इंतजार रहता है।

हजारों लोगों ने झेली भयंकर परेशान :

  • ब्रिटिश सरकार और ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन ने वर्ष 2009 में स्वाइन फ्लू की वैक्सीन विकसित की थी। हजारों लोगों पर ह्यूमन ट्रायल किए गए। तमाम लोगों ने सरकार और कंपनी पर मुकदमा ठोक दिया कि उन्हें तमाम नतीजों की कोई जानकारी नहीं दी गई और उनकी सेहत पर प्रायोगिक वैक्सीन का बुरा प्रभाव पड़ा। ये लोग लाखों पौंड का हर्जाना सरकार और ग्लैक्सो से चाहते हैं। अहम है कि ब्रिटेन में ह्यूमन ट्रायल में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों की रजामंदी के साथ साइड इफेक्ट के इलाज की जिम्मेदारी भी सरकार और कंपनी की होती है।

एस-प्रोटीन को निशाना बनाने की तैयारी :

  • दुनियाभर के शोधकर्ता कोरोना वायरस के एस-प्रोटीन (स्पाइक प्रोटीन) को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं। अपने स्पाइक के कारण ही कोरोना वायरस किसी भी सतह पर अच्छी तरह से चिपक जाता है। वह इसी तरह फेफड़ों से चिपककर जैली की तरह दिखने लगता है, जो खतरनाक निमोनिया को पैदा करता है और संक्रमित मरीज मारा जाता है। इसके साथ ही वैज्ञानिक डीएनए तकनीक का इस्तेमाल वैक्सीन बनाने में कर रहे हैं।

लैब में ही बड़ा खतरा :

  • किसी भी वैक्सीन का मुख्य मकसद किसी विशेष बीमारी के प्रति मानव शरीर को तैयार करना होता है। शरीर उस बीमारी के वायरस को मारने के लिए जरूरी ताकत जुटा लेता है। अब तक दो तरीके से वैक्सीन तैयार होता है। डेड वायरस या फिर वायरस की कॉपी के जरिये। इन तरीकों से ही मीजल्स से लेकर स्वाइन फ्लू तक की वैक्सीन तैयार हुई हैं। इन दोनों तरीकों में ही खतरा है। खतरा है लैब स्तर से ही वायरस के फैल जाने का, जैसा अंदेशा वुहान की लैब को लेकर जताया जा रहा है।

वर्षों तक जिंदा रह सकता है कोरोना :

  • ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन एक्सपर्ट सारा गिल्बर्ट स्वीकार करती हैं कि वैक्सीन विकसित करने में कई खतरे हैं। यूनिवर्सिटी के जेनर इंस्टिट्यूट के निदेशक प्रो. एड्रियन हिल जोर देकर कहते हैं कि किसी एक कंपनी के बस की बात नहीं है कि वह दुनिया में करोड़ों वैक्सीन डोज बना सके। ऐसे में दो या अधिक शोधकर्ताओं को वैक्सीन विकसित करने में सफलता मिलनी चाहिए। वह चेतावनी देते हैं कि आने वाले वर्षों में भी कोविड-19 जिंदा रह सकता है और हमें वैक्सीन की जरूरत पड़ती रहेगी।

कोरोना वायरस का रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट: एक समग्र अवलोकन

  • कोरोना वायरस संक्रमण के कारण कई देशों में लागू लॉकडाउन की स्थिति से बाहर निकलने की छटपटाहट है। लेकिन इसके लिए कोई ऐसा ठोस रास्ता नहीं मिल रहा है, जिससे कि यह पुख्ता हो सके कि संक्रमण फैलने की संभावना खत्म हो गई है। ऐसे में लॉकडाउन खोलने की जरूरत पर संक्रमण फिर बढ़ने का अंदेशा भारी पड़ रहा है। फिर भी जनजीवन को सामान्य बनाने की दिशा में एंटीबॉडी टेस्ट पर दुनिया भर में फोकस किया जा रहा है। नेचर के अनुसार इससे पता चल सकता है कि कोरोना वायरस के प्रति क्या कोई व्यक्ति प्रतिरक्षित (इम्यून) हो गया है? कुछ लोग तो इसे ‘इम्यूनिटी पासपोर्ट’ तक कह रहे हैं। माना जाता है कि इससे स्वास्थ्य तथा जरूरी सेवाओं में लगे कर्मियों को यह पता चल सकता है कि क्या उन्हें अब भी संक्रमण का खतरा है।

सटीकता की पुष्टि के लिए ज्यादा परीक्षणों की जरूरत :

  • सैन फ्रांसिस्को स्थित विटिलैंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल बुश के मुताबिक, किट की विश्वसनीयता की जांच नहीं होती है। ब्रिटेन में कोविड-19 के लिए टेस्टिंग स्ट्रैटिजी के निदेशक कैथी हॉल ने 8 अप्रैल को संसदीय समिति को बताया कि किसी भी देश ने एंटीबॉडी टेस्टिंग को कोविड-19 की जांच के लिए मान्य नहीं किया है। आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, कैनबरा के फिजिशियन तथा लैब माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट पीटर कॉलिगनॉन कहते हैं कि किट्स की सटीकता की पुष्टि के लिए परीक्षण ऐसे लोगों पर होना चाहिए, जिनमें कोविड-19 था और जिनमें नहीं है। लेकिन अधिकांश टेस्ट का आकलन कुछ लोगों के आधार पर है, क्योंकि किट विकसित करने की जल्दबाजी है। इसलिए मौजूदा किट से टेस्टिंग पर्याप्त सटीक नहीं है।
  • उच्च गुणवत्ता वाली जांच में 99 फीसद संवेदनशीलता यानी एक फीसद ही फॉल्स पॉजिटिव या फॉल्स निगेटिव रिजल्ट आने चाहिए। जबकि मौजूदा कॉर्मिशियल एंटीबॉडी टेस्ट शुरुआती संक्रमण की जांच में 40 फीसद तक ही विशिष्ट है। पॉइंट ऑफ केयर टेस्ट तो लैब टेस्ट से भी कम विश्वसनीय हैं। क्योंकि इसमें रक्त का कम नमूना लिया जाता है और जांच भी लैब की तुलना में कम नियंत्रित वातावरण में होती है। डब्ल्यूएचओ भी पॉइंट ऑफ केयर टेस्ट की सिर्फ शोध के लिए सिफारिश करता है।

क्या है एंटीबॉडी टेस्ट :

  • वायरस जब शरीर में प्रवेश करता है तो इम्यून सिस्टम उससे लड़ने लिए एंटीबॉडी बनाता है। टेस्ट किट वायरस के अवयवों का इस्तेमाल कर एंटीबॉडी की मौजूदगी का पता लगाते हैं, जिसे ऐंटिजन कहते हैं। जांच आमतौर पर दो प्रकार की होती हैं। पहला- लैब टेस्ट- जिसमें करीब दिन भर का समय लगता है। दूसरा है- पॉइंट ऑफ केयर टेस्ट, जिसके परिणाम 15 से 30 मिनट में मिल जाते हैं। अमेरिका की प्रीमियर बायोटेक तथा चीन की ऑटोबायो डायग्नॉस्टिक्स समेत कई कंपनियां पॉइंट ऑफ केयर किट्स उपलब्ध कराती हैं, जो पता लगाता है कि व्यक्ति में वायरस था या नहीं। लेकिन इस जांच से वायरस है या नहीं- इसका सटीक पता नहीं चलता। इसलिए सक्रिय संक्रमण के इलाज में इसका सीमित उपयोग है। लेकिन अमेरिका तथा आस्ट्रेलिया जैसे देशों में इसका इस्तेमाल संदिग्ध संक्रमितों का पता लगाने में होता है। अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने सक्रिय कोरोना वायरस की जांच के लिए इस विधि के इस्तेमाल को अधिकृत किया है लेकिन कहा है कि एफडीए ने इसकी समीक्षा नहीं की है और इसका निष्कर्ष रोग की पुष्टि के लिए एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न आस्ट्रेलिया, पर्थ के क्लीनिकल वायरोलॉजिस्ट डेविड स्मिथ के मुताबिक, सक्रिय रूप से संक्रमित लोगों के इलाज में एंटीबॉडी टेस्ट महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन परिणाम की व्याख्या सावधानीपूर्वक करने की जरूरत है।

संक्रमण इम्यूनिटी के बराबर नहीं :

  • एंटीबॉडी टेस्ट के संबंध में बड़ा सवाल है कि पैथोजन संक्रमण को कितनी इम्यूनिटी देगा। सुरक्षात्मक इम्यूनिटी के लिए शरीर को विशिष्ट एंटीबॉडी बनाने की जरूरत होती है, जिसे नूट्रिलाइजिंग (बेअसर करने वाला) एंटीबॉडी कहते हैं। यह वायरस को कोशिकाओं में प्रवेश से रोकता है। लेकिन यह साफ नहीं है कि जिनमें कोविड-19 था, क्या उन सभी में एंटीबॉडी बना है। चीन में 175 लोगों पर हुए शोध के मुताबिक, कोविड-19 संक्रमण से उबरे 10 लोगों में नूट्रिलाइजिंग एंटीबॉडी नहीं बने, जबकि कइयों में काफी मात्रा में एंटीबॉडी बना। ये लोग संक्रमित थे लेकिन स्पष्ट नहीं है कि उनमें सुरक्षात्मक इम्यूनिटी थी या नहीं। यह भी पता नहीं है कि सुरक्षात्मक इम्यूनिटी कब तक कायम रहेगी। नूट्रिलाइजिंग एंटीबॉडी बन जाता है, तब भी अधिकांश को मौजूदा टेस्ट पकड़ नहीं पाता। इस तरह इम्यूनिटी पासपोर्ट का यह मतलब भी नहीं होता कि व्यक्ति संक्रमित नहीं है। इन चुनौतियों के बावजूद एंटीबॉडी टेस्ट से यह समझा जा सकेगा कि किस
  • समूह के लोग संक्रमित हुए हैं और उसका फैलाव कैसे रोका जाए। पीसीआर टेस्ट फेल होने की स्थिति में भी इसका इस्तेमाल सक्रिय संक्रमण का पता लगाने में किया जा सकता है।

विश्वसनीयता पर सवाल :

  • यह भी कहा जा रहा है कि एंटीबॉडी टेस्ट को बहुत बढ़-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि टेस्ट इसका सूचक नहीं है कि कोई व्यक्ति दोबारा संक्रमण के प्रति इम्यून हो गया। सैन फ्रांसिस्को स्थित विटिलैंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल बुश कहते हैं, ‘गलत जांच के बजाय जांच न होना बेहतर है।’ वैसे, शोधकर्ता एंटीबॉडी टेस्ट का इस्तेमाल आबादी में कोरोना वायरस के संक्रमण का अनुमान लगाने के लिए करते हैं, जो ऐसे स्थानों के लिए अहम है, जहां मानक जांच की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है या जिनमें मामूली लक्षण दिखते हैं या लक्षण ही नहीं होते हैं और संक्रमितों में गिनती होने से छूट जाते हैं। आबादी के एक हिस्से में सर्वे टेस्ट करने के बाद इसका इस्तेमाल वृहत समुदाय में संक्रमण का अनुमान लगाने में होता है। दुनिया में दर्जनों समूह अभी ऐसे अध्ययन कर रहे हैं।

समय का महत्व :

  • यदि जांच संक्रमण के तुरंत बाद की गई तो हो सकता है कि एंटीबॉडी विकसित नहीं हुआ हो। ऐसे में जिस एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए किट डिजाइन किया है, वह उसे नहीं पकड़ सकता। वैज्ञानिक सार्स- कोरोना वायरस-2 के प्रति भी यह पता नहीं लगा पाये हैं कि शरीर का इम्यून कितने समय में रेस्पॉन्ड करता है और कब तक एंटीबॉडी बनाता है। एचआइवी के लिए भी 99 फीसद सटीकता वाला एंटीबॉडी टेस्ट विकसित करने में कई साल लगे।

आइएसएस पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजेगा नासा

  • अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने घोषणा की है कि वह 27 मई को स्पेसएक्स के रॉकेट को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आइएसएस) पर भेजेगा। इस रॉकेट के जरिये दो अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री भी स्पेस में जाएंगे। लगभग एक दशक बाद अमेरिका से उड़ान भरने वाला यह पहला रॉकेट हो होगा, जिसमें मानव भी होंगे।
  • नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) के प्रमुख जिम ब्रिडेनस्टाइन ने एक ट्वीट के जरिये यह जानकारी दी है। उन्होंने कहा, ‘2011 के बाद नासा 27 मई को एक बार फिर अमेरिका की धरती से अमेरिकी रॉकेट के जरिये से अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को लांच करेगा।’
  • इस अभियान के लिए नासा ने दो अनुभवी अंतरिक्ष यात्री रॉबर्ट बहंकेन और डगलस हर्ले का चयन किया है, जो एलन मस्क की कंपनी ‘स्पेसएक्स’ द्वारा बनाए गए फाल्कन 9 रॉकेट से आइएसएस के लिए उड़ान भरेंगे। कंपनी ने एक क्रू ड्रेगन स्पेसक्राफ्ट भी तैयार किया है।
  • बता दें कि क्रू ड्रैगन कैप्सूल स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल का एक संशोधित (मॉडिफाइड) संस्करण है, जिसका उपयोग 2012 से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आइएसएस) में सामान भेजने के लिए किया गया था। कुछ दिनों पहले तक आइएसएस पर एक अमेरिकी और दो रूसी अंतरिक्ष यात्री मौजूद थे, जिन्होंने बीते सप्ताह ही कजाकिस्तान में सफलता पूर्वक लैंडिंग की थी।

फाल्कन 9 रॉकेट का परीक्षण

  • एलन मस्क के नेतृत्व वाली ‘स्पेसएक्स’ ने अपने फाल्कन 9 रॉकेट का परीक्षण किया है, जो 23 अप्रैल को एक ‘स्टारलिंक 6’ नामक मिशन के तहत 60 स्टारलिंक उपग्रहों के बेड़े को लेकर अंतरिक्ष में जाएगा। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस रॉकेट को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) के कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र के ऐतिहासिक लांच पैड 39ए से छोड़ा जा सकता है। यह इस साल का पांचवां स्टारलिंक मिशन होगा और 2019 से अब तक कंपनी के ऑपरेशनल उपग्रहों का सातवां बैच होगा। परीक्षण के कुछ देर बाद ही स्पेसएक्स ने ट्वीट किया-‘फाल्कन 9 का स्टैटिक परीक्षण पूरा हुआ। अब फ्लोरिडा में एलसी-39ए से 60 स्टारलिंक उपग्रहों को गुरुवार को छोड़ने की तैयारी है।’

विशेषज्ञों की सलाह हर्ड इम्यूनिटी' विकसित करे भारत

  • कोरोना वायरस का संक्रमण सीमित रखने के लिए पूरे भारत में लॉकडाउन की मियाद 14 अप्रैल से बढ़ाकर 3 मई कर दी गई है। इस दौरान एक्सपर्ट्स के बीच इस बात की चर्चा हो रही है कि लॉकडाउन कोरोना को कुछ दिनों तक तो रोक सकता है, लेकिन इसके हटते ही लोग जब एक-दूसरे से घुलने-मिलने लगेंगे तो यह वायरस फिर तेजी से फैलने लगेगा। इसलिए, इनका मानना है कि कोरोना का सबसे प्रभावी समाधान देश की बड़ी आबादी में इम्यूनिटी लेवल के बढ़ने से ही मिल सकता है। एक्सपर्ट्स इसके लिए 'हर्ड इम्यूनिटी यानी सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता' की थिअरी दे रहे हैं।

UK ने हर्ड इम्यूनिटी के सिद्धांत को नकारा

  • इस सिद्धांत के मुताबिक, जब बड़ी आबादी में कोरोना का संक्रमण होगा तो उसमें वायरस के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का भी विकास होगा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, संक्रमित लोगों के शरीर में कोरोना से लड़ने की क्षमता बढ़ जाएगी तो उनके शरीर पर कोरोना के संक्रमण का कोई असर नहीं होगा और फिर कोरोना भी शरीर में पहले से मौजूद करोड़ों-अरबों वायरस की तरह एक आम वायरस बनकर रह जाएगा। हालांकि, इस थिअरी को यूनाइटेड किंगडम (UK) ने नकार दिया और लॉकडाउन की अवधि बढ़ा दी।

हर्ड इम्यूनिटी के सिद्धांत को समझें

  • इधर, एक बड़े महामारी विशेषज्ञ जयप्रकाश मुलियिल का कहना है, 'कोई भी देश लंबे समय तक लॉकडाउन नहीं झेल सकता है और खासकर भारत जैसा देश। आपको बुजुर्गों को इन्फेक्शन से बचाकर हर्ड इम्यूनिटी के एक पॉइंट पर पहुंचना होगा। और जब हर्ड इम्यूनिटी पर्याप्त संख्या में पहुंच जाएगी तो महामारी रुक जाएगी, तब बुजुर्ग भी सुरक्षित हो जाएंगे।'
  • नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर डिजीज डायनैमिक्स, इकनॉमिक्स ऐंड पॉलिसी और वॉशिंगटन स्थित प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्तांओं (रिसर्चर्स) की एक टीम का मानना है कि भारत में हर्ड इम्यूनिटी की थिअरी कामयाब हो सकती है क्योंकि यहां की बड़ी आबादी युवाओं की है जिनमें ज्यादातर को वायरस से संक्रमित होने के बावजूद अस्पताल नहीं ले जाना पड़ेगा और उनकी मौत नहीं होगी।

नियंत्रित तरीके से फैलने दें वायरस: एक्सपर्ट्स

  • उनका कहना है कि अगर अगले सात महीनों तक नियंत्रित तरीके से वायरस को फैलने दिया जाए तो नवंबर तक देश की 60% आबादी कोरना से इम्यून हो जाएगी और तब यह बीमारी फैल नहीं सकेगी। रिसर्च टीम का मानना है कि चूंकि भारत की 93.5% आबादी 65 से कम उम्र की है, इसलिए यहां कोरोना से मौतों की दर भी इटली, स्पेन जैसे यूरोपीय देशों के मुकाबले बहुत कम रहेगी। हालांकि, अगर नियंत्रित तरीके से वायरस फैलने दिया जाए तो भारत में कितनी मौतों हो सकती हैं, इसका कोई अनुमानित आंकड़ा नहीं बताया गया है।
  • दोनों संस्थानों का सुझाव है कि भारत में लॉकडाउन हटाया जाए और 60 वर्ष से कम उम्र के लोगों को सामान्य कामकाज करने की अनुमति दी जाए। हालांकि, तब भी सोशल डिस्टैंसिंग बरतने, मास्क पहनने और भीड़-भाड़ पर रोक जैसे एहतियाती उपाय होते रहें। उसके बाद ज्यादा से ज्यादा लोगों की जांच हो और सभी संदिग्ध संक्रमितों को अलग-थलग किया जाए।
  • पीपल्स हेल्थ मूवमेंट के ग्लोबल को-ऑर्डिनेटर टी सुंदररमण ने कहा, 'एक तरह से आप यह कह रहे हैं कि हम (60 वर्ष से कम उम्र के) लोगों को संक्रमित होने और फिर बीमारी से खुद ही ठीक होने देंगे। हम सिर्फ बीमार लोगों का ही ध्यान रखेंगे।' उन्होंने कहा, '(हर्ड इम्यूनिटी की) यही पॉलिसी है।'

:: विविध ::

इजरायल के डिजिटल बैंक को तैयार करेगी टीसीएस

  • भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर सेवा कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) इजरायल में पहली बार पूरी तरह डिजिटल बैंक तैयार करेगी, जिसे एक तसवीर बदलने वाली परियोजना के रूप में देखा जा रहा है और जो दूसरे क्षेत्रों के बिजनेस मॉडल को भी प्रभावित कर सकता है।
  • इजराइल के वित्त मंत्रालय ने बैंकिंग सेवा ब्यूरो का निर्माण करने के लिए टीसीएस को चुना है, जिसका मकसद उसके बैंकिंग क्षेत्र में बदलाव लाना है। इसका इस्तेमाल डिजिटल बैंकिंग कामकाज मंच के रूप में किया जाएगा और टीसीएस के बैंक्स ग्लोबल बैंकिंग प्लेटफार्म से लैस होगा।
  • यह 40 वर्षों के दौरान इजरायल में बैंकिंग लाइसेंस पाने वाला पहला बैंक है। डिजिटल बैंक की शुरुआत 2021 में होगी।

:: प्रिलिम्स बूस्टर ::

  • किस स्पेस एजेंसी के द्वारा ‘स्टारलिंक 6’ नामक मिशन के तहत 60 स्टारलिंक उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ा जाएगा? (स्पेसएक्स-SpaceX)

  • हाल ही में चर्चा में रही यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) की शुरुआत कब की गई थी एवं इसका विकास किस संस्था ने किया है? (2016,भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम NPCI)

  • हाल ही में CSIR ने डेंगू के इलाज में प्रयोग की जाने वाली किस जड़ी बूटी का कोरोनावायरस के मरीजों पर क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी मांगी गई है? (झाड़ लता-कोक्यूलस हिसरुटस)

  • हाल ही में चर्चा में रहे उर्वरकों की पोषण आधारित सब्सिडी (NBS) की शुरुआत कब की गई एवं इसमें कौन सेउर्वरक शामिल है? (2010, फॉस्फेट और पोटाश उर्वरक- पीएंडके)

  • हाल ही में सरकार के द्वारा ई-लर्निंग कंटेंट को विकसित करने और उनमें योगदान देने के लिए किस राष्ट्रीय कार्यक्रम को शुरू किया है? (विद्यादान 2.0)

  • घरों में क्वारंटाइन नागरिकों की प्रभावी निगरानी और रियल टाइम मॉनिटरिंग से चर्चा में रहे मोबाइल एप्लीकेशन का क्या नाम है? (संयम ऐप- पुणे नगर निगम द्वारा विकसित)

  • हाल ही में किस देश के द्वारा सैन्य उपग्रह 'नूर' को लाँच किया गया है? (ईरान)

  • हाल ही में चर्चा में रही ‘हर्ड इम्यूनिटी-Herd immunity’ क्या है? (बड़ी आबादी का बीमारी से संक्रमित होकर सामूहिक प्रतिरोधकता का विकसित होना)

  • इजराइल में पूर्णत: डिजिटल बैंक तैयार करने के कार्यक्रम से चर्चा में रही भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी कौन है? (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज-TCS)

  • हाल ही में किस वैश्विक कंपनी ने रिलायंस जिओ लिमिटेड में 10% की हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की है? (फेसबुक)

  • प्रति वर्ष पृथ्वी दिवस कब मनाया जाता है एवं वर्ष 2020 की थीम क्या है? (22 अप्रैल, Climate Action)

  • आयातित तांबे के प्रोडक्ट्स के कारण चर्चा में रही डंपिंग (Dumping) क्या है? (किसी देश द्वारा दूसरे देश में अपने उत्पादों को लागत से भी कम मूल्य पर बेचना)

 

 

 

स्रोत साभार: Dainik Jagran (Rashtriya Sanskaran), Dainik Bhaskar (Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara (Rashtriya Sanskaran) Hindustan Dainik (Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times (Hindi & English), PTI, PIB

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