(दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर) यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में समाचार पत्रों का संकलन (21 मार्च 2020)

दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर


(दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर) यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में समाचार पत्रों का संकलन (21 मार्च 2020)


:: राष्ट्रीय समाचार ::

राष्‍ट्रीय आरोग्‍य निधि और स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री के विवेकाधीन अनुदान (एचएमडीजी) योजना

  • स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय राष्‍ट्रीय आरोग्‍य निधि (आरएएन) एवं स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री के विवेकाधीन अनुदान की व्‍यापक योजना के तहत चिन्‍हित जानलेवा रोगों से ग्रसित एवं सरकारी अस्‍पतालों में उपचार करवा रहे निर्धन मरीजों के इलाज के लिए वित्‍तीय सहायता प्रदान करता है।
  • स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित राष्‍ट्रीय आरोग्‍य निधि की व्‍यापक योजना के तहत राज्‍य/केंद्र शासित प्रदेश-वार सीमान्‍त गरीबी रेखाओं से नीचे रहने वाले परिवारों से संबंधित रोगियों एवं प्रमुख जानवेला रोगों/कैंसर/दुर्लभ बीमारियों से ग्रसित लोगों को सरकारी अस्‍पतालों में चिकित्‍सकीय उपचार के लिए वित्‍तीय सहायता प्रदान की जाती है। 15 लाख रुपए तक की वित्‍तीय सहायता सरकारी अस्‍पताल के मेडिकल सु्परिटेंडेंट को ‘एकमुश्‍त अनुदान’ के रूप में योग्‍य मरीजों को उपलब्‍ध कराए जाते हैं, जहां वे उपचार प्राप्‍त कर रहे हैं।

इस योजना के तीन घटक हैं अर्थात

  1. राष्‍ट्रीय आरोग्‍य निधि (आरएएन) – कैंसर के अतिरिक्‍त जानलेवा बीमारियों से ग्रसित मरीजों को सहायता प्रदान करने के लिए,
  2. स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री की कैंसर मरीज निधि (एचएमसीपीएफ) – कैंसर से ग्रसित मरीजों को वित्‍तीय सहायता प्रदान करने के लिए, एवं
  3. विशिष्‍ट दुर्लभ रोगों से ग्रस्ति मरीजों के लिए वित्‍तीय सहायता हेतु स्‍कीम।
  • स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री के विवेकाधीन अनुदान (एचएमडीजी) के तहत उन मरीजों को अधिकतम 1 लाख 25 हजार रुपए का राशि प्रदान की जाती है, जिनकी वार्षिक आय 1 लाख 25 हजार से अधिक नहीं है, जिससे कि सरकारी अस्‍पतालों में भर्ती होने/उपचार कराने पर होने वाले व्‍यय के एक हिस्‍से को चुकाया जा सके।
  • इन योजनाओं के तहत वित्‍तीय सहायता राज्‍यों/केंद्र शासित प्रदेशों को जारी नहीं की जाती, बल्कि उन अस्‍पतालों को दी जाती है, जहां पात्र रोगी उपचार प्राप्‍त करते हैं।

रक्षा खरीद प्रक्रिया 2020 के मसौदे का अनावरण

  • रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह ने रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) 2020 के मसौदे का अनावरण किया जिसका उद्देश्य रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए स्वदेशी विनिर्माण को ज्यादा बढ़ाना और उसमें लगने वाली समय सीमा को कम करना है।ये और इस तरह के कई अन्य अभिनव उपाय अगस्त 2019 में स्थापित, रक्षा मंत्रालय के अधिग्रहण महानिदेशक की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट का हिस्सा थे।

नई रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) में प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तन इस प्रकार हैं:

  • स्वदेशी सामग्री अनुपात में वृद्धि-हमारे घरेलू उद्योग द्वारा प्राप्त अनुभव के मद्देनजर इस मसौदे में 'मेक इन इंडिया’ पहल का समर्थन करने के लिए खरीद की विभिन्न श्रेणियों में स्वदेशी सामग्री को लगभग 10 फीसदी तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। पहली बार स्वदेशी सामग्री के सत्यापन के लिए एक सरल और यथार्थवादी पद्धति को शामिल किया गया है।
  • कच्चे माल, अलॉय यानी विशेष मिश्रित धातुओं और सॉफ्टवेयर के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया है क्योंकि स्वदेशी कच्चे माल का उपयोग 'मेक इन इंडिया’ का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है और सॉफ्टवेयर में तो भारतीय कंपनियां विश्व में अग्रणी हैं।
  • देश में स्थापित एफएबी विनिर्माण इकाइयों से चिप्स और एयरो इंजन निर्माण इकाई से एकल विक्रेता आधार पर खरीद का आश्वासन।
  • कुल अनुबंध मूल्य की लागत के आधार पर न्यूनतम 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री के साथ नई श्रेणी खरीद (वैश्विक - भारत में निर्माण) को लाया गया है। इसमें केवल न्यूनतम आवश्यक सामग्री को ही विदेश से खरीदा जाएगा जबकि शेष मात्रा का निर्माण भारत में किया जाएगा। ये 'वैश्विक खरीद' श्रेणी से प्राथमिकता में होगा क्योंकि विनिर्माण भारत में होगा और देश में रोजगार सृजित होंगे।
  • पट्टे (लीज़िंग) को एक नई श्रेणी के रूप में पेश किया गया-आवधिक किराये के भुगतान के साथ विशाल प्रारंभिक पूंजीगत व्यय को प्रतिस्थापित करने के लिए मौजूदा 'बाय' (खरीद) और 'मेक' (निर्माण) श्रेणियों के साथ साथ अधिग्रहण के लिए लीज़िंग यानी पट्टे को एक नई श्रेणी के रूप में पेश किया गया है। लीज़िंग की अनुमति दो श्रेणियों के तहत दी जाती है, यानी लीज़ (भारतीय) जहां भारतीय इकाई कमतर है और संपत्ति की मालिक है, और दूसरी, लीज़ (वैश्विक) जहां वैश्विक इकाई कमतर है। ये उन सैन्य उपकरणों के लिए उपयोगी साबित होगा जो वास्तविक युद्ध में उपयोग नहीं किए जाते हैं जैसे कि परिवहन बेड़े, ट्रेनर, सिम्युलेटर आदि।
  • सॉफ्टवेयर और सिस्टम संबंधित परियोजनाओं की खरीद के लिए एक नया अध्याय शुरू किया गया है क्योंकि ऐसी परियोजनाओं में प्रौद्योगिकी में तेजी से बदलाव के कारण अप्रचलन बहुत तेज होता है और प्रौद्योगिकी के साथ गति बनाए रखने के लिए खरीद प्रक्रिया में लचीलापन आवश्यक है।
  • अनुबंध पश्चात प्रबंधन के लिए एक नया अध्याय शुरू किया गया है ताकि अनुबंध की अवधि के दौरान उत्पन्न होने वाले मुद्दों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रदान किए जा सकें क्योंकि आमतौर पर रक्षा अनुबंध लंबे समय तक चलते हैं।
  • आवश्यकता की स्वीकृति (एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी) के समझौते की प्रक्रिया को कम करके खरीद के लिए समय सीमाओं को घटाया गया है जो 500 करोड़ रुपये से कम की परियोजनाओं और दोहराए जाने वाले ऑर्डरों के लिए एक चरण की होगी। परीक्षण पद्धति और गुणवत्ता आश्वासन योजना आरएफपी का हिस्सा बनेंगे।
  • फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल विशेष ट्रायल विंग द्वारा अंजाम दी जाएंगी और इन ट्रायल का उद्देश्य छोटी कमियों का उन्मूलन करने के बजाय प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना होगा।
  • स्टार्ट-अप और इनोवेटर्स और डीआरडीओ की अनुसंधान परियोजनाओं समेत भारत में निर्माताओं से खरीद के सिलसिले में ’मेक’ (निर्माण) के लिए एक व्यापक अध्याय प्रस्तुत किया गया है।
  • उत्पाद समर्थन-अभी चलन वाली समकालीन अवधारणाओं को शामिल करने के लिए उत्पाद समर्थन के दायरे और विकल्पों को चौड़ा किया गया है, जैसे कि प्रदर्शन आधारित लॉजिस्टिक्स (पीबीएल), जीवन चक्र समर्थन अनुबंध (एलसीएससी), व्यापक रखरखाव अनुबंध (सीएमसी) आदि। ताकि उपकरण के लिए जीवन चक्र समर्थन का अनुकूलन किया जा सके। पूंजी अधिग्रहण अनुबंध में सामान्य रूप से वारंटी अवधि के पांच साल बाद भी समर्थन शामिल होगा।
  • घटकों के बजाय उत्पादों के निर्यात पर जोर देने के लिए संशोधित ऑफसेट दिशा-निर्देशों का प्रस्ताव दिया गया। रक्षा औद्योगिक गलियारों में स्थापित इकाइयों और एमएसएमई से खरीद के लिए उच्च गुणक प्रस्तावित किए गए। निजी कंपनियों / डीपीएसयू / ओएफबी और डीआरडीओ को प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के लिए उच्च गुणक प्रस्तावित किए गए।

वार्षिक टीचिंग रिफ्रेशर पाठ्यक्रम (अर्पित)

  • उच्च शिक्षा में शिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए एक अनूठी पहल में, सरकार उच्च शिक्षा संकाय के व्यावसायिक विकास के लिए पिछले दो वर्षों से ऑनलाइन ‘वार्षिक टीचिंग रिफ्रेशर पाठ्यक्रम (अर्पित) चला रही है। एमओओसी मंच - स्वयं के इस्तेमाल से, गुणवत्ता शिक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए 2018 में यह पाठ्यक्रम शुरू किया गया था। यह 15 लाख उच्च शिक्षा संकाय के ऑनलाइन पेशेवर विकास की एक बड़ी और अनूठी पहल है।
  • अर्पित के माध्यम से, पिछले दो वर्षों में 1.8 लाख से अधिक शिक्षकों को संशोधित पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए नए और उभरते रुझान, शैक्षणिक सुधार और कार्यप्रणाली प्रदान की गई है। 2018-19 में, 37,199 शिक्षकों को इस कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित किया गया था, जबकि 2019-20 में यह संख्या बढ़कर 1,46,919 हो गई, जो कार्यक्रम की लोकप्रियता के साथ-साथ लगभग चार गुना वृद्धि को दर्शाता है।

:: अंतर्राष्ट्रीय समाचार ::

World Happiness Report 2020 :

  • दुनिया के सबसे खुशहाल देशों की सूची में फिनलैंड ने तीसरी बार पहला स्थान हासिल किया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा शुक्रवार को जारी वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2020 के अनुसार शीर्ष 10 खुशहाल देशों में से नौ यूरोप के हैं, जबकि टॉप-20 में एशिया का एक भी देश नहीं है। 156 देशों की इस सूची में सबसे निचले पायदान पर अफगानिस्तान, दक्षिणी सूडान, जिम्बाब्वे और रवांडा है। जबकि शीर्ष में फिनलैंड के बाद डेनमार्क, स्वीट्जरलैंड, आइसलैंड और नॉर्वे शामिल है। वहीं न्यूजीलैंड आठवें स्थान पर है।

कैसे की जाती है रैंकिंग?

  • किसी देश की खुशहाली मापने के लिए 6 मानकों पर सवाल तैयार किए जाते हैं। इनमें संबंधित देश के प्रति व्यक्ति की जीडीपी, सामाजिक सहयोग, उदारता और भ्रष्टाचार, सामाजिक स्वतंत्रता, स्वस्थ जीवन के जवाब के आधार पर रैंकिंग की जाती है। विश्व में सबसे खुशहाल देशों को सूचीबद्ध करने के लिए भूटान ने 2011 में संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव रखा था। इसे मंजूरी मिलने के बाद से हर साल 20 मार्च को ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस डे’ मनाया जाता है।

चार पायदान फिसला भारत

  • भारत इस रिपोर्ट में चार पायदान फिसलकर 144वें स्थान पर है। पिछले साल भारत को 140वां स्थान प्राप्त हुआ था। वहीं पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान 66वें, चीन 94वें, बांग्लादेश 107वें, नेपाल 92वें, मालदीव 87वें स्थान पर है। पाकिस्तान पिछली बार 67वें और चीन 93वें स्थान पर था।

अमेरिका ने किया हाइपरसोनिक मिसाइल का सफल परीक्षण

  • अमेरिका ने शुक्रवार को अपनी पहली हाइपरसोनिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया। रक्षा मंत्रालय पेंटागन के अनुसार इस मिसाइल की गति ध्वनि की गति से कम से कम पांच गुना ज्यादा होगी। इस लिहाज से यह मिसाइल 6,200 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा गति से दुश्मन पर हमला करेगी। यह बैलेस्टिक मिसाइल परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम होगी। अमेरिका का यह कदम रूस के जवाब में उठाया गया है। रूस ने हाइपरसोनिक मिसाइल बनाकर उसकी तैनाती भी कर दी है।

सबसे पहले 2017 में किया था परीक्षण

  • इस मिसाइल के प्रोटोटाइप का सबसे पहले अक्टूबर 2017 में परीक्षण किया गया था। लेकिन गुरुवार को हाइपरसोनिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया। यह परीक्षण थल सेना और नौसेना द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। यह जानकारी वाइस एडमिरल जॉनी वॉल्फ ने दी है। हाइपरसोनिक मिसाइल को दुनिया की सबसे तेज हमलावर मिसाइल माना जाता है। इससे किसी भी युद्ध का नक्शा बदल सकता है। इसकी गति रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को भी चकमा दे सकती है।

चीन भी हाइपरसोनिक मिसाइल बनाने की दिशा में कर रहा है काम

  • दिसंबर 2019 में रूस ने एवेनगार्ड हाइपरसोनिक मिसाइल बनाकर अमेरिका के सामने नई चुनौती पेश कर दी थी। रूस का दावा है कि उसकी मिसाइल 33 हजार किलोमीटर प्रति घंटा (मैक 27) की रफ्तार से दुश्मन पर हमला करने वाली है। इस रफ्तार से उड़ने वाली मिसाइल को किसी भी रडार से पकड़कर उसे रोकने के लिए कार्रवाई कर पाना असंभव सा है। चीन भी हाइपरसोनिक मिसाइल बनाने की दिशा में काम कर रहा है। अक्टूबर 2019 की अपनी राष्ट्रीय परेड में उसने तेज गति वाली डीएफ-17 मिसाइल का प्रदर्शन किया था लेकिन उसके हाइपरसोनिक होने पर शक है।

वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से होगा G7 सम्मेलन

  • अमेरिका ने कोरोनो वायरस महामारी के बढ़ते प्रकोप के चलते जून में कैंप डेविड में होने जा रहे जी7 शिखर सम्मेलन को रद्द कर दिया है। अब यह सम्मेलन व्यक्तिगत बैठक के स्थान पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित किया जाएगा।

जी-7 क्या है?

  • जी-7 दुनिया की सात सबसे बड़ी कथित विकसित और उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों का समूह है, जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमरीका शामिल हैं. इसे ग्रुप ऑफ़ सेवन भी कहते हैं.
  • समूह खुद को "कम्यूनिटी ऑफ़ वैल्यूज" यानी मूल्यों का आदर करने वाला समुदाय मानता है. स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की सुरक्षा, लोकतंत्र और क़ानून का शासन और समृद्धि और सतत विकास, इसके प्रमुख सिद्धांत हैं.

:: भारतीय राजव्यवस्था ::

बेरोजगारी के आकलन के लिए जेपीसी गठन की मांग

  • राज्यसभा में सदस्यों ने बेरोजगारी को लेकर संयुक्त संसदीय समिति के गठन के प्रस्ताव का समर्थन किया। माकपा सदस्य बिनॉय बिस्वम ने प्रस्ताव पेश करते हुए सरकार से देश में बेरोजगारी की स्थिति के उचित आकलन तथा समग्र रिपोर्ट तैयार करने के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन का अनुरोध किया था। बेरोजगारी की मौजूदा स्थिति का सही आकलन किए जाने की जरूरत बताते हुए बिस्वम ने कहा, सरकारी आंकड़े केवल 6.1 फीसद बेरोजगारी का दावा करते हैं। जबकि थिंक टैंक सीएमआइई के अनुसार देश में 13.2 फीसद लोग बेरोजगार हैं। इसे देखते हुए सरकार को पढ़े-लिखे नागरिकों के बीच बेरोजगारी की वर्तमान स्थिति पर एक समग्र रिपोर्ट पेश करनी चाहिए।
  • प्रस्ताव में सरकार को सुझाव दिया गया है कि उसे इस मसले का संपूर्ण अध्ययन एवं विवेचना करने तथा रोजगार गारंटी अधिनियम की रूपरेखा तैयार करने के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन का निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने अधिनियम का नाम शहीद भगत सिंह राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम रखे जाने की इच्छा जताई।

क्या होती है जेपीसी

  • दरअसल, संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी संसद की वह समिति होती है, जिसमें सभी दलों की समान भागीदारी होती है। जेपीसी को यह अधिकार होता है कि वह किसी भी व्यक्ति, संस्था या किसी भी उस पक्ष को बुला सकती है और उससे पूछताछ कर सकती है, जिसको लेकर उसका गठन हुआ है। अगर वह व्यक्ति, संस्था या पक्ष जेपीसी के समक्ष पेश नहीं होता है तो यह संसद की अवमानना का उल्लघंन माना जाएगा, जिसके बाद जेपीसी संबंधित व्यक्ति या संस्था से इस बाबत लिखित या मौखिक जवाब या फिर दोनों मांग सकती है।

आइआइआइटी (संशोधन) विधेयक

  • लोकसभा में आइआइआइटी (संशोधन) विधेयक पेश किया गया। मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने विधेयक को सदन के पटल पर रखा।

प्रमुख प्रावधान

  • इसमें पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड में सूरत, भोपाल, भागलपुर, अगरतला और रायचुर में बनने वाले पांच इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आइआइआइटी) को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान (आइएनआइ) का दर्जा देने का प्रावधान किया गया है।
  • इस विधेयक के तहत इन पांच आइआइआइटी के अलावा पीपीपी मोड पर तैयार मौजूदा 15 आइआइआइटी को भी आइएनआइ का दर्जा दिया जाएगा। इन संस्थानों को डिग्री देने की अनुमति दी जाएगी। इन सभी आइआइआइटी को अन्य यूनिवर्सिटी की तरह ही बीटेक, एमटेक और पीएचडी की डिग्री देने का अधिकार होगा।
  • इस विधेयक के तहत 2014 व 2017 के प्रिंसिपल एक्ट में संशोधन करने तथा पांचों संस्थानों को वैधानिक दर्जा दिए जाने का भी प्रावधान है।

:: भारतीय अर्थव्यवस्था ::

कोरोना के चलते फिच ने घटाया देश की वृद्धि दर का अनुमान

  • कोरोना वायरस के प्रकोप को देखते हुए फिच रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2020-21 के लिए भारत की वृद्धि दर के अनुमान को 5.6% से घटाकर 5.1% कर दिया है। रेटिंग एजेंसी का कहना है कि बढ़ते कोरोना वायरस से देश में निवेश और निर्यात दोनों प्रभावित होंगे।
  • इससे पहले फिच ने दिसंबर 2019 में अनुमान जताया था कि 2020-21 के लिए भारत की विकास दर 5.6% और अगले वर्ष यानि कि 2021-22 में वृद्धि दर 6.5% रहेगी।
  • फिच ने अपने ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक 2020 में कहा कि आने वाले हफ्तों में कोरोना वायरस का असर और बढ़ेगा। कोरोना से प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ती रहेगी लेकिन इससे ज्यादा तेजी से फैलाव को रोकने में कामयाबी मिलेगी। इसके बावजूद आर्थिक परिदृश्य नकारात्मक है।
  • फिच का कहना है कि कोरोना वायरस की वजह से कारोबारी माहौल बहुत प्रभावित हो रहा है। भारत में कच्चा माल सबसे ज्यादा चीन से आयात किया जाता है लेकिन चीन में कोरोना वायरस की वजह से सप्लाई रुक गई है।

स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व

  • भारत ने कच्चे तेल की कीमत में हाल में दर्ज की गई भारी गिरावट का बड़ा लाभ उठाने का फैसला किया है। सरकार सस्ती दर पर कच्चे तेल की खरीदारी करेगी और अपने रणनीतिक तेल भंडार को भर लेगी। सरकार ने किसी भी आपात परिस्थितियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए ये रणनीतिक तेल भंडार बनाए हैं।
  • सरकार ने 5,000 करोड़ रुपए (करीब 67 करोड़ डॉलर) मूल्य का तेल खरीदने का फैसला किया है। यह खरीदारी 30 डॉलर प्रति बैरल कीमत के आसपास होगी। एक बैरल 159 लीटर का होता है। इस सौदे की डिलीवरी अप्रैल-मई में होगी। इस आपूर्ति से तीन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को भर लिया जाएगा। इन तीनों भंडार की क्षमता 53.3 लाख टन की है। इनका निर्माण इंडिया स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (आईएसपीआरएल) ने किया है।

भंडार में पूरा तेल भरने से देश की 9.5 दिनों की जरूरत की पूर्ति होगी

  • 53.3 लाख टन के रणनीतिक भंडार अभी करीब आधे भरे हुए हैं। यदि इसे पूरा भर लिया जाता है, तो इतने तेल से भारत के 9.5 दिनों की तेल जरूरतों की पूर्ति हो सकेगी। ये तीन भंडार विशाखापत्तनम, मंगलोर और पादुर में हैं। इसके अलावा पादुर और चांदीखोल में 65 लाख टन क्षमता के अन्य भंडार भी बन रहे हैं। जल्द ही बीकानेर और राजकोट में दो अन्य भंडार बनाने पर भी काम शुरू होगा। इनका निर्माण पूरा होने के बाद यदि इन्हें भी भर लिया जाए, तो इससे एक महीने से अधिक की घरेलू जरूरत की पूर्ति हो जाएगी। इसके अलावा तेल मंत्रालय ने आईएसपीआरएल से कहा है कि वह अन्य जगहों पर भी भंडार बनाने की कोशिश करे, ताकि किसी भी वक्त 90-100 दिनों की घरेलू जरूरत की पूर्ति हो सके। इन दिनों सस्ते में मिल रहे तेल से भंडार को भरने से सरकार को बचत तो होगी ही, बाद में इसका वाणिज्यिक लाभ भी उठाया जा सकता है। मौजदा भंडार आधा भरे हुए हैं और 5,000 करोड़ रुपए के बजट से 53.3 लाख टन के भंडार को बाकी आधार भी भरा जा सकता है।

रणनीतिक भंडार को भरने के लिए पहले ही हो चुके हैं कई समझौते

  • आईएसपीआरएल ने 25 लाख टन के पादुर भंडार को आधे के किराए के लिए एडनॉक के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर कर लिया है। पिछले साल इसने पादुर भंडार की एक चौथाई क्षमता को किराया पर देने के लिए सऊदी अरैमको के साथ भी एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे। आईएसपीआरएल ने मैंगलोर के 15 लाख टन के भंडार के आधे हिस्से को पहले ही एडनॉक को किराए पर दे दिया है। इसने विशाखापत्तनाम के 10.3 लाख टन के भंडार को भी इराक के बासरा तेल से भर लिया है।

पृष्टभूमि

  • कच्चे तेल की कीमत मार्च में अब तक करीब 40 फीसदी गिर चुकी है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड दोपहर के कारोबार में करीब 6 फीसदी तेजी के साथ 29.75 डॉलर पर ट्रेड कर रहा है। कोरोना वायरस संक्रमण के मामले की शुरुआत के बाद से तेल कीमत में करीब 57 फीसदी की गिरावट चल रही है। 6 जनवरी को ब्रेंट क्रूड 68.91 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था। शुक्रवार 18 मार्च को यह गिरकर 24.88 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया था। इस स्तर से सिर्फ दो दिनों में क्रूड करीब 20 फीसदी महंगा हो चुका है।
  • पहले चीन और अब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने से उद्योग धंधे ठप्प हो गए। इससे क्रूड की मांग घट गई और इसकी कीमत में भारी गिरावट दर्ज की गई और यह 68 डॉलर से घटकर करीब 50 डॉलर पर आ गया था। इसके बाद क्रूड का भाव बढ़ाने के लिए पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक और रूस सहित कुछ अन्य देशों में उत्पादन घटाने को लेकर चर्चा हुई। इस चर्चा में रूस ने उत्पादन घटाने से इन्कार कर दिया। इसके बाद सऊदी अरब ने अपनी तरफ से उत्पादन बढ़ाने का एलान कर दिया और क्रूड का भाव भी घटा दिया। इससे बाजार में मांग कम रहने के बावजूद आपूर्ति बढ़ गई और प्राइस वार भी शुरू हो गया। इससे क्रूड के भाव को फिर एक बड़ा झटका लगा और यह 30 डॉलर से भी नीचे आ गया।

सस्ते तेल के और भी कई फायदे

  • वित्तीय घाटा कम होगा : क्रूड का भाव घटने से भारत को और भी कई फायदे हैं। भारत अपनी 80 फीसदी क्रूड जरूरत की आपूर्ति आयात से करता है। इसके कारण देश के एक बड़ी पूंजी बाहर चली जाती है। तेल कीमत यदि निचले स्तर पर बनी रही, तो कम पूंजी बाहर जाएगी। इससे व्यापार घाटा कम होगा। इसके साथ ही वित्तीय घाटा भी कम होगा।
  • घटेगी पेट्रोल-डीजल की कीमत : पेट्रोल-डीजल की कीमत क्रूड के भाव पर निर्भर करती है। क्रूड सस्ता होगा, तो पेट्रोल-डीजल और विमान ईंधन भी सस्ता होगा। इसका फायदा आम लोग व उद्योग सभी को होगा।
  • उत्पाद शुल्क बढ़ाकर सरकार बढ़ा सकती है अपनी आय : आम तौर पर सरकार क्रूड सस्ता होने पर पेट्रोल-डीजल व विमान ईंधन पर उत्पाद शुल्क बढ़ा देती है। इससे इन उत्पादों की कीमत ज्यादा नहीं घटती। यानी थोड़ा लाभ पब्लिक व उद्योग को होता है। थोड़ी कमाई सरकार की भी बढ़ जाती है।
  • महंगाई में गिरावट : क्रूड सस्ता होने से डीजल सस्ता होता है। डीजल का असर सभी चीजों की कीमत पर पड़ता है। इसलिए क्रूड सस्ता होने पर महंगाई भी घटती है।

:: भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी ::

विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस: 21 मार्च

  • ‘विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस’ डाउन सिंड्रोम के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र महासभा की सिफ़ारिश से वर्ष 2012 से मनाया जा रहा है।विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस’ वर्ष 2020 का विषय ‘(We Decide)’ है।
  • विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस के लिए 21 क्रोमोसोम (गुणसूत्र) त्रयी (ट्रायसोमिक) की विशिष्टता को दर्शाने के लिए तीसरे महीने की 21 तारीख़ का चयन किया गया था, जिसके कारण डाउन सिंड्रोम का होता है।
  • डाउन सिंड्रोम नाम, ब्रिटिश चिकित्सक जॉन लैंगडन डाउन के नाम पर पड़ा, जिन्होंने इस सिंड्रोम (चिकित्सकीय स्थिति) के बारे में सबसे पहले 1866 में पता लगाया था। विश्व में अनुमानित 1000 में 1 से लेकर 1100 में से 1 बच्चा डाउन सिंड्रोम के साथ पैदा होता है।
  • यह विषय सभी सामाजिक पहलुओं के संदर्भ में भरपूर जीवन जीने के लिए डाउन सिंड्रोम से पीड़ित सभी लोगों को समान अवसर प्रदान करने पर जोर देता है। नकारात्मक दृष्टिकोण, निम्न अपेक्षाएं, भेदभाव और बहिष्करण डाउन सिंड्रोम से पीड़ित लोगों को पीछे छोड़ देता हैं। ये दर्शाता है, कि अन्य लोग इन लोगों की चुनौतियों को समझ नहीं पाते है। उन्हें सशक्त बनाने के क्रम में हितधारकों को वास्तविक परिवर्तन लाने के लिए अवसर सुनिश्चित करने चाहिए।
  • वर्ष 2020 का ‘(We Decide) विषय का उद्देश्य सतत विकास लक्ष्य के लिए संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 2030 के एजेंडे को पूरा करने में भी मदद करेगा।

डाउन सिंड्रोम क्या है?

  • डाउन सिंड्रोम एक अनुवांशिक विकार है, जो कि क्रोमोसोम-21 में एक अतिरिक्त क्रोमोसोम के जुड़ने की उपस्थिति के कारण होता है। अधिकांश लोगों की सभी कोशिकाओं में 46 गुणसूत्र होते हैं, लेकिन डाउन सिंड्रोम से पीड़ित लोगों में उनके 47 गुणसूत्र होते हैं और इसके कारण वे अलग दिखते हैं तथा अलग तरीके से सीखते हैं।

डाउन सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्तियों के लक्षण:

  • डाउन सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति में बहुत हल्के से गंभीर संज्ञानात्मक कमी का स्तर, मांसपेशी टोन में कमी, छोटी नाक व नाक की चपटी नोक, ऊपर की ओर झुकी हुई आंखें, छोटे कान, मांसपेशियों में कमज़ोरी, सामान्य से परे लचीले जोड़, अंगूठा और उसके बगल की ऊँगली के बीच की दूरी अधिक होना तथा मुंह से बाहर निकलती रहने वाली जीभ जैसे लक्षण होते है। डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे विभिन्न दोषों जैसे कि जन्मजात हृदय रोग, सुनने में परेशानी, आंख की समस्याओं से प्रभावित होते हैं।
  • डाउन सिंड्रोम सभी जातियों और आर्थिक स्थिति के लोगों में पाया जाता है। डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चा किसी भी उम्र की मां से जन्म ले सकता है, हालांकि डाउन सिंड्रोम का ज़ोखिम मां की उम्र अधिक होने के साथ बढ़ता है। 35 वर्षीय महिला के डाउन सिंड्रोम से पीड़ित गर्भधारण की संभावना 350 में से 1 तथा 40 वर्ष की उम्र के बाद डाउन सिंड्रोम से पीड़ित गर्भधारण की संभावना 100 में से 1 होती है।

वायरस जी10 पी3

  • लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) के बॉयोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के वैज्ञानिकों ने रोटा वायरस फैमिली का नया वायरस जी10 पी3 खोजा है। प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मीनाक्षी बताती हैं कि यह वायरस विश्व में पहले कहीं रिपोर्ट ही नहीं हुआ था। खास बात है कि हरियाणा के आर्गेनाइज्ड डेयरी फार्म की भैंस में यह पाया गया। जब इस पर वैज्ञानिकों ने और रिसर्च की तो मालूम चला कि यह सैमियन मंकी यानि बंदरों से भैंसों में आया है।
  • डॉ. मीनाक्षी ने बताया कि वह रोटा वायरस पर काम कर रही हैं। तभी उन्होंने डायरिया ग्रस्त कई भैंस के बच्चों के मल के सैंपल लिए, जिसमें जी10पी3 वायरस मिला। वह बताती हैं कि कभी कोई बंदर रोटा वायरस से प्रभावित रहा होगा और उसने अपने मल से पशुओं के चारे या पानी को दूषित कर दिया होगा। इसके बाद यह वायरस भैंस के पेट में पहुंच गया होगा। इस बात की भी काफी संभावना है कि भैंस के अंदर पहले से मौजूद वायरसों से मिलकर यह नया वायरस जी10 पी3 डेवलप हुआ।
  • खास बात है कि इस वायरस में रिवर्स जूनोसिस वाले गुण मौजूद हैं। यानि यह वायरस पशुओं से इंसानों में और इंसानों से पशुओं में भी फैल सकता है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने इस वायरस की खोज कर आगामी प्रयोगों के लिए इससे सफलतम रूप से राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र की वीटीसीसी सेंटर में सुरक्षित किया है।

ऐसे हुई वायरस की खोज

  • प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मीनाक्षी बताती हैं कि पहले हम यह समझते थे कि पशुओं का रोटा वायरस सिर्फ पशुओं में ही असर करता है और इंसानों का रोटा वायरस इंसानों पर ही संक्रमण फैलाता है। हमारे पास अक्सर विभिन्न जानवरों के सैंपल आते रहते हैं। इसी के तहत हमने पशुओं के गोबर के सैंपल चेक किए, जिसमें नया वायरस जी10 पी3 मिला। डॉ. मीनाक्षी बताती हैं कि इस वायरस को लेकर माल्यूकुलर केरेक्टराइज किया, जिसमें इसके विशेष जीन को लक्षित किया गया। तब पता चला कि यह दो वायरसों से मिलकर बना है। इसी रिसर्च में हमें पता चला कि यह वायरस इंसानों से जानवर में भी आ सकता है। इसलिए इसे रिवर्स जूनोसिस कहते हैं।

अभी तक पशुओं में रोटा वायरस के लिए नहीं है वैक्सीन

  • रोटा वायरस एक खतरनाक बीमारी है। रोटा वायरस अगर पशुओं में हो तो दस्त हो जाते हैं, जबकि इंसानों में रोटा वायरस के कारण उल्टी और दस्त दोनों होते हैं। पशुओं में तो अभी तक इस वायरस से लडऩे के लिए कोई वैक्सीन नहीं है मगर इंसानों में इसे रोकने के लिए भारत ने विश्व बैंक की मदद से एक वैक्सीन तैयार की है। मगर यह जरूरी नहीं कि एक वैक्सीन सभी प्रकार के रोटा वायरस पर काम करे। डॉ. मीनाक्षी बताती हैं कि पशुओं के रोटा वायरस को लेकर वैक्सीन बनाने की तरफ प्रयास किया जा रहा है।

कोरोना वायरस जैसी ही प्रकृति है इसकी

  • डॉ. मीनाक्षी बताती हैं कि स्वाइन फ्लू, कोरोना, कोविड वायरस यह सभी आरएनए (रेबो न्यूक्लिक एसिड) वायरस हैं। इसमें प्रूफ रीङ्क्षडग नहीं होती। इसलिए यह वायरस अपनी प्रकृति को बदलता रहता है। दूसरे वायरसों के संपर्क में आने यह एक नया रूप ले लेता है। यह वायरस मुंह के द्वारा, शौच के बाद हाथ न धोने से या सीवरेज वाले पानी से दूषित फल व सब्जियां खाने से आंत में पहुंच जाता है और वहां संक्रमण फैलाता है। इसके साथ ही मल के द्वारा ही यह बाहर वातावरण में आता है। अगर सीवरेज के पानी से पीने वाला पानी दूषित हो जाए तब भी यह वायरस जानवरों और इंसानों दोनों में ही संक्रमण पैदा कर सकता है। हमें मिला जी10 पी3 भी कुछ इसी प्रकार के नेचर का है। अगर कोई इंसान इस वायरस से ग्रस्त मिल्क प्रोडक्ट को खा ले तो वह भी बीमार पड़ सकता है।

सफेद मक्खी प्रतिरोधी कपास का परीक्षण करेगा सीएसआईआर

  • वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के वैज्ञानिकों ने टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा फर्न के जीन्स के उपयोग से कपास की एक कीट-प्रतिरोधी ट्राँसजेनिक किस्म विकसित की है। यह किस्म सफेद मक्खी के हमले से कपास की फसल को बचाने में मददगार हो सकती है। जल्दी ही कपास की इस किस्म का परीक्षण शुरू किया जाएगा।
  • कपास की यह किस्म लखनऊ स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई है।

टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा फर्न के जीन्स का प्रयोग

  • यह कीट-प्रतिरोधी किस्म विकसित करने के लिए शोधकर्ताओं ने पौधों की जैव विविधता से 250 पौधों की पहचान की है, जिनमें ऐसे प्रोटीन अणुओं का पता लगाया जा सके, जो सफेद मक्खी के लिए विषैले होते हैं। सभी पौधों के पत्तों के अर्क को अलग-अलग तैयार किया गया था, और सफेद मक्खी को उन पत्तों को खाने के लिए दिया गया। इन पौधों में से, एक खाद्य फर्न टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा का पत्ती अर्क सफेद मक्खी में विषाक्तता पैदा करते हुए पाया गया है।” इसी आधार पर टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा के जीन्स के उपयोग से कपास की यह ट्रांसजेनिक प्रजाति विकसित की गई है।
  • टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा संवहनी पादप (ट्रैकेओफाइट) समूह का हिस्सा है। इस पौधे को नेपाल में सलाद के रूप में उपयोग किया जाता है। एशिया के कई क्षेत्रों में गैस्ट्रिक विकारों को दूर करने के लिए भी इस समूह के पौधों का उपयोग होता है, जो इनमें कीटनाशक प्रोटीन के मौजूद होने की संभावना को दर्शाते हैं।इस समूह के पौधों में लिगिनत ऊतक (जाइलम) पाए जाते हैं, जो भूमि से प्राप्त जल एवं खनिज पदार्थों को पौधे के विभिन्न अंगों तक पहुँचाने का कार्य करते हैं।

सफेद मक्खियों पर प्रभाव

  • सफेद मक्खियों को जब कीटनाशक प्रोटीन की सीमित मात्रा के संपर्क में रखा गया तो उनके जीवन-चक्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। इन बदलावों में सफेद मक्खी द्वारा खराब एवं असामान्य अंडे देना औरनिम्फ, लार्वा तथा मक्खियों का असाधारण विकास शामिल है। हालाँकि, दूसरे कीटों पर इस प्रोटीन को प्रभावी नहीं पाया गया है। इससे पता चलता है कि यह प्रोटीन विशेष रूप से सफेद मक्खी पर अपना असर दिखाता है। प्रोटीन की विषाक्तता का परीक्षण चूहों पर करने पर इसे स्तनधारी जीवों के लिए भी सुरक्षित पाया गया है।”

क्या नुकसानदायक है सफ़ेद मक्खी?

  • सफेद मक्खी न केवल कपास, बल्कि अन्य फसलों को भी नुकसान पहुँचाने के लिए जानी जाती है। यह दुनिया के शीर्ष दस विनाशकारी कीटों में शामिल है, जो दो हजार से अधिक पौधों की प्रजातियों को नुकसान पहुँचाते हैं और 200 से अधिक पादप वायरसों के वेक्टर के रूप में भी कार्य करते हैं। वर्ष 2015 में सफेद मक्खी के प्रकोप से पंजाब में कपास की दो तिहाई फसल नष्ट हो गई थी, जिसके कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा और वे कपास की खेती से मुँह मोड़ने लगे थे।

पृष्टभूमि

  • वैज्ञानिकों का कहना यह भी है कि बीटी (बेलिस थ्यूरेनजिनेसिस) कपास मुख्य रूप से बॉलवर्म जैसे कीटों से निपटने के लिए विकसित की गई थी, जो फसल को सफेद मक्खी के प्रकोप से बचाने में कारगर नहीं है। फसलों पर इसके प्रकोप को देखते हुए वर्ष 2007 में एनबीआरआई के वैज्ञानिकों ने सफेद मक्खी से निपटने के लिए कार्य करना शुरू किया था।

कोरोना से लड़ाई में कारगर मलेरिया की दवा क्लोरोक्वीन

  • मलेरिया के इलाज के लिए 76 साल पहले आई दवा पूरी दुनिया में कोविड 19 के इलाज में प्रभावी होने को लेकर चर्चा में है। हालांकि भारत के वैज्ञानिकों मे इसे लेकर चुप्पी है लेकिन फ्रांस के वैज्ञानिकों द्वारा कोविड 19 के इलाज में क्लोरोक्वीन के कारगर होने के दावे के बाद अमेरिका में दवाओं की नियामक एजेंसी एफडीए और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस पर मुहर लगा दी है। भारत में भी जयपुर में इटली के कोरोना वायरस पीडि़त नागरिक के इलाज में एड्स की दवाओं के साथ-साथ क्लोरोक्वीन का इस्तेमाल किया गया था।

क्यों है कारगर क्लोरोक्वीन

  • कोविड 19 के इलाज में क्लोरोक्वीन की तरफ दुनिया भर के वैज्ञानिकों का ध्यान यूं नहीं नहीं गया। दरअसल कोविड 19 भी सार्स की तरह कोरोना फैमली का एक वायरस है। कोविड 19 वायरस का वैज्ञानिक नाम सार्स-कोव-दो है। इसीलिए इसे न्यू कोरोना वायरस भी कहा जाता है। 2002 में सार्स वायरस के 23 देशों में फैलने के बाद इसको लेकर दुनिया भर में शोध किये गए। इन शोधों के दौरान ही पता चला कि सार्स वायरस को रोकने में क्लोरोक्वीन काफी हद तक कामयाब है। शोध में सामने आया कि क्लोरोक्वीन मानव शरीर के भीतर कोशिका के ऊपर एक परत बना देता है। इस परत के कारण वायरस मानव कोशिका से जुड़ नहीं पाता है। परिणाम यह होता है कि वायरस को पनपने और कई गुना बढ़ने के लिए कोशिका से जरूरी प्रोटीन नहीं मिल पाता है। इस कारण वायरस का प्रभाव सीमित हो जाता है।
  • चूंकि कोविड 19 की कोई निश्चित दवा नहीं थी, इसीलिए इससे पीडि़त मरीजों के इलाज के कई दवाओं का एक साथ प्रयोग किया जाने लगा। सार्स वायरस के खिलाफ क्लोरोक्वीन के कारगर होने के कारण कोविड 19 के इलाज में इसे भी शामिल किया गया। लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि यह क्लोरोक्वीन कोविड 19 वायरस से ग्रसित होने के पहले काम करता है या फिर उसके बाद भी काम करता है। इसे लेकर अमेरिका से लेकर यूरोप में जांच शुरू हो गई है।

:: विविध ::

वि‍श्‍व वानि‍की दि‍वस-21 मार्च

  • प्रत्येक वर्ष दुनि‍याभर में वनों को महत्व देने के लि‍ए 21 मार्च को वि‍श्व वानि‍की/वन दि‍वस मनाया जाता है। वसंत ऋतु के इस दि‍न दक्षि‍णी गोलार्ध में रात और दि‍न बराबर होते हैं। यह दि‍न वनों और वानि‍की के महत्व और समाज में उनके योगदान के तौर पर मनाया जाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2011 को अंतर्राष्ट्रीय वि‍श्व वानि‍की/वन दि‍वस के रूप में मनाने की घोषणा की है। वर्ष 2020 की थीम ‘वन और जैव विविधता-Forests and Biodiversity’ है।

कान्स फिल्म महोत्सव 2020

  • कोरोना वायरस (Corona Virus- Covid 19) के बढ़ते खतरे के मद्देनजर कान्स फिल्म महोत्सव 2020 (Cannes Film Festival 2020) को टाल दिया गया है. इस समारोह में 40,000 लोगों के शामिल होने की उम्मीद थी. फिल्म जगत के सबसे प्रतिष्ठित और सबसे बड़े महोत्सव को टाल दिया गया है.

क्या है कान्स फिल्म फेस्टिवल

  • कान्स फिल्मोत्सव के बारे में कहा जाता है कि साल 1939 से शुरू होने के बाद आज तक इसे नहीं टाला गया था. इसे विश्व के सबसे सम्मानजनक फिल्म उत्सवों में से एक माना जाता है. हर साल मई के महीने में ही फ्रांस के कान शहर में होने वाले 'Festival De Cannes' को फिल्मों का महाकुंभ कहा जा सकता है. इसमें दुनिया भर के टॉप निर्देशकों की फिल्म को प्रदर्शित किया जाता है. दुनिया के कोने-कोने से फिल्मी सितारे इस महाकुंभ में पहुंचते हैं और हर साल उनका रेड कार्पेट लुक चर्चा का विषय बनता है.

:: प्रिलिम्स बूस्टर ::

  • हाल ही में चर्चा में रहे क्लोरोक्वीन किस रोग के इलाज की प्रमुख दवा है? (मलेरिया)
  • राष्ट्रीय आरोग्य निधि के तहत दुर्लभ बीमारियों से ग्रसित लोगों को अधिकतम वित्तीय सहायता के रूप में कितनी राशि प्रदान की जाती है? (15 लाख रुपए)
  • उच्च शिक्षा संकाय के व्यवसायिक विकास हेतु सरकार कौन सा ऑनलाइन प्रशिक्षण पाठ्यक्रम संचालित कर रही है? (वार्षिक टीचिंग रिफ्रेशर पाठ्यक्रम-अर्पित)
  • हाल ही में जारी वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक में भारत की रैंकिंग कितने रही? (144)
  • आइआइआइटी (संशोधन) विधेयक के द्वारा किन आइआइआइटी को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा प्रदान किया जाएगा? (सूरत, भोपाल, भागलपुर, अगरतला और रायचुर आइआइआइटी)
  • किस तिथि को विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस मनाया जाता है एवं इस वर्ष की थीम क्या है? (21 मार्च, 2020 की थीम We Decide)
  • हाल ही में भारतीय वैज्ञानिकों के द्वारा खोजे गए नए वायरस जी10 पी3 किस वायरस समूह का हिस्सा है? (रोटावायरस फैमिली)
  • हाल ही में वैज्ञानिकों के द्वारा किस पौधे की सहायता से सफेद मक्खी प्रतिरोधी कपास की नई प्रजाति को विकसित किया है? (टेक्टेरिया मैक्रोडोंटा फर्न)
  • विश्व वन दिवस किस तिथि को मनाया जाता है एवं इस वर्ष की थीम क्या है? (21 मार्च, वर्ष 2020 की थीम-वन और जैव विविधता)

स्रोत साभार: Dainik Jagran (Rashtriya Sanskaran), Dainik Bhaskar (Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara (Rashtriya Sanskaran) Hindustan Dainik (Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times (Hindi & English), PTI, PIB

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