(दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर) यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में समाचार पत्रों का संकलन (20 अप्रैल 2020)

दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर


(दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर) यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में समाचार पत्रों का संकलन (20 अप्रैल 2020)


:: राष्ट्रीय समाचार ::

'फ्लू वायरस' की संरचना वाले फूल ऑली/आयरन वुड

  • इन दिनों बस्‍तर की घाटी में विशेष प्रकार के फूल खिले हैं जो दिखने में किसी 'वायरस' की तरह हैं।  ताज्‍जुब की बात है कि सामान्‍य फ्लू  या कोविड-19 जैसी बीमारी के जड़ में वायरस की तरह दिखने वाले इस फूल की पत्‍तियों में औषधीय गुण भी मौजूद हैं।
  • बता दें कि पूरी दुनिया में नॉवेल कोरोना वायरस ने एक लाख से अधिक लोगों की जान ले ली है इसलिए लोग अब वायरस की संरचना से मिलती किसी भी तस्‍वीर या आकृति से घबराने लगे हैं। लेकिन बस्‍तर संभाग के चित्रकोट के समीप मटनार घाटी में खिले अल्ली फूल कोई वायरस नहीं हैं। हूबहू वायरस की तरह बनावट वाले इन फूलों से अभी बस्तर की पथरीली घाटियों में खूबसूरती छाई है। घाटी में खिले अल्ली फूल में औषधीय गुण भी पाए जाते हैं। इसका उपयोग रंग बनाने में भी किया जाता है।

पहली बार पुणे में ली गई वायरस की तस्‍वीर

  • उल्‍लेखनीय है कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआइवी) के वैज्ञानिकों ने मार्च के अंत में पहली बार नए कोरोना वायरस की तस्वीरें उजागर की। यह तस्‍वीर इमेज ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप (टेम) इमेजिंग का इस्तेमाल करके ली गई। इन तस्‍वीरों को इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित किया गया है।

सिर्फ बस्तर में है ऑली या अल्ली फूल

  • वनस्पतिशास्त्री डॉ एमएल नायक ने बताया कि ऑली फूल को छत्तीसगढ़ में सिर्फ बस्तर की पथरीली घाटियों में ही देखा गया है। स्थानीय ग्रामीण अल्ली के नाम से इसे पहचानते हैं। यह मेलास्टोमेस परिवार का सदस्य है और इसका वैज्ञानिक नाम मेमेकोलीन एड्यूल है। भारत में यह ऑली, आयरन वुड तो श्रीलंका में कोराकह (नीली धुंध) के नाम से चर्चित है। इसमें पीली डाई व ग्लूकोसाइड होता है। श्रीलंका के तटीय क्षेत्रों में ऑली फूलों का उपयोग रंग बनाने में होता है। बौद्ध भिक्षु आमतौर पर इसका उपयोग कपड़ा रंगने में वर्षों से करते रहे हैं। ईख की चटाई को रंगने में भी इन फूलों के रंगों का प्रयोग किया जाता है।

पत्तों में औषधीय गुण

  • आयुर्वेद चिकित्सक निखिल देवांगन बताते हैं कि ऑली की पत्तियों का रस एंटी डायरियल होता है। इसलिए बस्तर के ग्रामीण दस्त की समस्या होने पर इसकी पत्तियों का रस पीते हैं। हाजमा की समस्या से परेशान लोग भी इस फूल की पत्तियों के रस का उपयोग करते हैं। ऑली की शाखाओं का दातून भी ग्रामीण करते हैं।

कोरोना के टीके के विकास व दवा के परीक्षण के लिए टास्कफोर्स गठित

  • कोरोना को हराने के लिए सरकार ने एक उच्च स्तरीय टास्कफोर्स का गठन किया है। यह टास्कफोर्स महामारी से निपटने के लिए टीके के विकास और दवा के परीक्षण पर काम करेगा। नीति आयोग के सदस्य और सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार इसके सह अध्यक्ष होंगे।
  • केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रलय में संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने नियमित प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि टास्कफोर्स में आयुष विभाग, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, जैवप्रौद्योगिकी विभाग, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर), रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के सदस्य और महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं और औषधि नियंत्रक भी शामिल होंगे। टास्कफोर्स का उद्देश्य कोरोना के खिलाफ लड़ाई में उद्योग और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को सक्षम बनाना और गति देना है। ‘टीके के विकास के तरीकों की पहचान करने के लिए जैवप्रौद्योगिकी विभाग को केंद्रीय समन्वय एजेंसी बनाया गया है। सरकारी स्तर पर टीके के विकास के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की सूची बनाएंगे, प्रगति पर नजर रखेंगे और जरूरी सुविधा मुहैया होगा।

:: अंतर्राष्ट्रीय समाचार ::

करतारपुर गुरुद्वारा

  • पाकिस्तान में करतारपुर साहिब गुरुद्वारे के गुंबद ढहने पर भारत ने सवाल उठाए हैं। भारत ने कहा है कि इस घटना से सिख समुदाय आहत हुआ है। इसके साथ ही गुरुद्वारे में हुए नुकसान को सही कराने के लिए भी कहा है। बता दें कि शनिवार को करतारपुर गुरुद्वारे के आठ गुंबद मामूली आंधी में ढह गए थे। इनका निर्माण दो साल पहले यानी 2018 में हुआ था।

सिखों के दो धर्मस्थल

  • पाकिस्तान में सिखों के दो पवित्र तीर्थ स्थल हैं। लाहौर से लगभग 75 किलोमीटर दूर ननकाना साहिब। ये गुरु नानक देवजी महाराज का जन्म स्थल है। दूसरा करतारपुर। यहां गुरु नानकदेव अंतरध्यान हुए थे। यह लाहौर से लगभग 117 किलोमीटर दूर है। करतारपुर साहिब गुरुद्वारे में भारतीय सिख श्रद्धालुओं के लिए करतारपुर कॉरीडोर बनाया गया था। पिछले साल नवंबर में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अपने - अपने देशों में इसका उद्घाटन किया था। भारत-पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा से करतारपुर 3.80 किलोमीटर दूर है। गुरु नानक देव जी अपनी 4 प्रसिद्ध यात्राओं को पूरा करने के बाद 1522 में परिवार के साथ करतारपुर में रहने लगे थे। लाहौर से लगभग 117 किलोमीटर दूर स्थित है करतारपुर कारिडोर।

करतारपुर की पृष्ठभूमि

  • गुरु नानक देव जी की सोलहवीं पीढ़ी के रूप में डेरा बाबा नानक स्थित गुरुद्वारा चोला साहिब में सेवाएं निभा रहे सुखदेव सिंह और अवतार सिंह बेदी बताते हैं कि गुरु नानक देव ने रावी नदी के किनारे बसाए नगर करतारपुर में खेती कर 'नाम जपो, किरत करो और वंड छको' (नाम जपें, मेहनत करें और बांटकर खाएं) का संदेश दिया था। इस के बाद सिखों ने लंगर कराना शुरू किया था। इसी जगह भाई लहणा जी को गुरु गद्दी भी सौंपी थी, जिन्हें सिखों के दूसरे गुरु अंगद देव के नाम से जाना जाता है।
  • इतिहासकारों के अनुसार, करतारपुर में गुरुघर बनाने के लिए मांग उठी तो तत्कालीन गवर्नर दुनी चंद ने सिख समुदाय को 100 एकड़ जमीन मुहैया करवाई थी। 1925 में गुरुघर के निर्माण पर खर्च आई 1 लाख 35 हहजार 600 रुपए की रकम पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह ने दान की थी। वो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के दादा थे।
  • जब भारत का बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान की तरफ रहने वाले लाखों सिख हिंदुस्तान आ गए। उसी समय यह गुरुद्वारा वीरान हो गया। बरसों तक यह जगह उजाड़ रही। मगर उस दौर में भी गुरु नानक के कुछ मुसलमान भक्त यहां आते रहे। 1995 में पाकिस्‍तान की सरकार ने करतारपुर गुरुघर की मरम्मत का काम शुरू किया था, जो 2004 में पूरा हुआ था। आजादी के बाद करतारपुर गुरुद्वारे में 2001 में पहली बार यहां लंगर बंटा था। अकाली दल के नेता कुलदीप सिंह वडाला के तरफ से 'करतारपुर रावी दर्शन अभिलाखी संस्था' की शुरुआत की गई और 13 अप्रैल 2001 के दिन बैसाखी के दिन अरदास की शुरुआत हुई।

ऑस्ट्रेलिया ने वायरस की स्वतंत्र जांच की मांग की

  • ऑस्ट्रेलिया ने कोरोना महामारी को लेकर स्वतंत्र जांच की मांग की है। साथ ही इस महामारी से निपटने में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के तरीके की भी जांच की अपील की है। ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री मारिसे पायने ने रविवार को यहां कहा, ‘हम ऐसी स्वतंत्र पड़ताल पर जोर देंगे, जिसके तहत वुहान में वायरस का पता लगने के बाद चीन द्वारा उठाए गए शुरुआती कदमों की भी जांच शामिल हो।’ सरकारी न्यूज चैनल एबीसी से बात करते हुए पायने ने कहा, ‘स्वतंत्र जांच से हमें हर उस चीज का पता लगाना है, जिसके तहत वायरस की उत्पत्ति, इससे निपटने के लिए उठाए गए कदमों और सूचनाएं साझा करने संबंधी जानकारी मिल सकें।’

भारत के नये एफडीआई नियम डब्ल्यूटीओ के मुक्त व्यापार सिद्धांत का उल्लंघन: चीनी दूतावास

भारत की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति में कुछ खास देशों के लिये किये गये बदलाव विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के भेदभाव रहित व्यवहार के सिद्धांत का उल्लंघन है और यह मुक्त व्यापार के सामान्य रुझान के खिलाफ है।

  • प्रवक्ता ने कहा कि ‘‘अतिरिक्त अवरोध खड़े करने वाली यह नीति स्पष्ट तौर पर चीन के निवेशकों के लिये ही है। उसने कहा कि भारत का यह कदम जी20 देशों के बीच बनी उस सहमति के भी खिलाफ है जिसमें निवेश के लिये मुक्त, उचित और भेदभाव रहित परिवेश पर जोर दिया गया है।

पृष्ठभूमि

  • भारत ने पिछले सप्ताह अपनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति में बदलाव करते हुये उसकी सीमा से लगने वाले पड़ोसी देशों से आने वाले विदेशी निवेश के लिये सरकारी मंजूरी लेना आवश्यक कर दिया। भारत का कहना है कि यह कदम कोरोना वायरस महामारी के चलते अवसर का लाभ उठाते हुये घरेलू कंपनियों के अधिग्रहण को रोकने के लिये यह कदम उठाया गया है।

नोबेल विजेता वैज्ञानिक का दावा-वुहान की लैब में बना था वायरस

  • फ्रांस के नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक लूक मांटेग्नर ने इस दावे का समर्थन किया है कि कोविड-19 महामारी फैलाने वाले नोवल कोरोना वायरस की उत्पत्ति एक प्रयोगशाला में की गई है और यह मानव निर्मित है। उन्होंने यह भी कहा कि एड्स बीमारी को फैलाने वाले एचआइवी वायरस की वैक्सीन बनाने की कोशिश में यह बेहद संक्रामक और घातक वायरस तैयार किया गया है।
  • फ्रांस के सीन्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में एचआइवी (ह्यूमन इमोनोडिफिशियंसी वायरस) के सह-खोजकर्ता फ्रांसीसी वैज्ञानिक लूक मांटेग्नर ने बताया कि इसीलिए नोवल कोरोना वायरस की जीनोम में एचआइवी के तत्वों और यहां तक कि मलेरिया के भी कुछ तत्व होने की आशंका है। एशिया टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार चीनी शहर वुहान की प्रयोगशालाओं को वर्ष 2000 से कोरोना वायरस में विशेषज्ञता हासिल है।
  • प्रोफेसर लूक मांटेग्नर को मेडिसिन में एड्स के वायरस की पहचान करने के लिए वर्ष 2008 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसी शोध के लिए उनके सहयोगी प्रोफेसर फ्रैन एग्वोज बैग-सिनोसी को भी नोबेल से सम्मानित किया गया था।
  • उल्लेखनीय है कि कोविड-19 के वायरस जन्म वुहान की लैब में हुआ है। पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट की पुष्टि करते हुए कहा था कि कोरोना वायरस चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की लैब में बनाया गया है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि यह वायरस इंसानों में चमगादड़ के जरिये आया है। रिपोर्ट में यह भी कहा कि गया था कि पहला संक्रमित मरीज इसी लैब का एक कर्मचारी था, जो गलती से संक्रमित हो गया था।

:: भारतीय राजव्यवस्था ::

पर्याप्त प्रतिनिधित्व जांचे बगैर नहीं दिया जा सकता प्रोन्नति में आरक्षण और प्रमोशन: सुप्रीम कोर्ट

  • सुप्रीम कोर्ट ने एससी एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण और परिणामी वरिष्ठता पर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि राज्य सरकार पर्याप्त प्रतिनिधित्व जांचे बगैर प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरिष्ठता नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट ने एम नागराज और जनरैल सिंह के मामले में संविधान पीठ के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरिष्ठता देने से पहले पर्याप्त प्रतिनिधित्व जांचना होगा।

प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरिष्ठता देने की याचिकाएं खारिज

  • सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीसा प्रशासनिक सर्विस के एससी एसटी अधिकारियों को प्रोन्नति में आरक्षण और परिणामी वरिष्ठता के मामले में गत शुक्रवार 17 अप्रैल को यह अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरिष्ठता देने के राज्य सरकार के रिज्यूलूशन (निर्देश) को सही ठहरा रहे अधिकारियों की याचिकाएं खारिज कर दीं।

सुप्रीम कोर्ट ने लगाई उड़ीसा हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर

  • यह फैसला न्यायमूर्ति मोहन एम शांतनगौडर और आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने उड़ीसा हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर लगाते हुए दिया है। हाईकोर्ट ने उड़ीसा एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस के एससी एसटी अधिकारियों को प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरिष्ठता देने का राज्य सरकार का 20 मार्च 2002 का रिज्यूलूशन (निर्देश) रद कर दिया था। हाईकोर्ट ने इसके साथ ही ओडीशा एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस के क्लास वन (जूनियर ब्रांच)अधिकारियों की ग्रेडेशन लिस्ट भी रद कर दी थी। सुप्रीम ने आदेश को सही ठहराते हुए उसमें दखल देने से इन्कार कर दिया।

एससी एसटी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने पर राज्य परिणामी वरिष्ठता का प्रावधान कर सकती है

  • कोर्ट ने कहा कि 85वें संविधान संशोधन में जुड़े अनुच्छेद 16 (4ए) के मुताबिक अगर राज्य सरकार को लगता है कि एससी एसटी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो राज्य सरकार को अधिकार है कि वह प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरिष्ठता के प्रावधान कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने एम नागराज और जनरैल सिंह के मामले में संविधान पीठ के पूर्व फैसलों का दिया हवाला

  • कोर्ट ने कहा कि एम नागराज के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने संविधान संशोधन कर जोड़े गए इस प्रावधान की वैधानिकता परखी थी और उस फैसले में संविधान पीठ ने कहा था कि राज्य सरकार एससी एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं हैं, लेकिन अगर राज्य अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए प्रोन्नति में आरक्षण देना चाहते हैं तो राज्य सरकार को इसके लिए पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने होंगे साथ ही सरकारी नौकरियों में उनके पर्याप्त प्रतिनिधित्व की जांच करनी होगी और अनुच्छेद 335 के मुताबिक कार्यकुशलता का भी ध्यान रखना होगा।

प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरिष्ठता देने से पहले पर्याप्त प्रतिनिधित्व का आकलन करना होगा

  • जस्टिस रेड्डी ने पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए कहा है कि वर्ष 2018 में एम नागराज के फैसले को सात जजों की संविधान पीठ को पुनर्समीक्षा के लिए भेजे जाने की मांग ठुकराते हुए जनरैल सिंह मामले में संविधान पीठ ने कहा था कि एम नागराज फैसले को पुनर्समीक्षा के लिए भेजने की जरूरत नहीं है, लेकिन उस फैसले में एससी एसटी वर्ग के पिछड़ेपन के आंकड़े एकत्र करने की कही गई बात सही नहीं है क्योंकि फैसले का यह अंश इंद्रा साहनी (आरक्षण मामले में मंडल कमीशन पर फैसला) मामले में नौ न्यायाधीशों द्वारा दी गई व्यवस्था के खिलाफ है। हालांकि जनरैल सिंह के फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा था कि अनुच्छेद 16(4ए) के मुताबिक राज्य सरकार को प्रोन्नत पदों के बारे में पर्याप्त प्रतिनिधित्व का आकलन करना होगा। पीठ ने बीके पवित्रा फैसले का भी उदाहरण दिया जिसमें प्रोन्नति में आरक्षण के साथ वरिष्ठता के मामले में पिछड़ेपन और संपूर्ण कार्य कुशलता का ध्यान रखने के साथ कैचअप रूल लागू करने की बात कही गई है।

प्रोन्नति में आरक्षण और परिणामी वरिष्ठता पर उड़ीसा सरकार ने कोई कानून नहीं बनाया

  • पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में उड़ीसा सरकार ने संविधान के प्रावधान के मुताबिक क्लास वन सर्विस को प्रोन्नति में आरक्षण और परिणामी वरिष्ठता के बारे में न तो कोई कानून बनाया और न ही इस बारे में कोई कार्यकारी आदेश जारी किया था। राज्य सरकार के वकील ने यह बात स्वीकार भी की है। राज्य सरकार ने 20 मार्च 2002 का रिज्यूलूशन पर्याप्त प्रतिनिधित्व की जांच किये बगैर सिर्फ केन्द्र सरकार के निर्देश पर जारी कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि ये रिज्यूलूशन न तो अनुच्छेद 16(4ए) के मुताबिक है और न ही ये सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों में तय व्यवस्था के अनुरूप है। इस रिज्यूलूशन का कोई कानूनी आधार नहीं है।

ओडिशा में सरपंचों को मिली जिलाधीश की शक्तियां

  • भुवनेश्वर कोरोना से मुकाबला करने के लिए ओडिशा सरकार ने रविवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने सरपंचों को जिलाधीश की शक्तियां प्रदान की है।
  • ओडिशा में कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए अन्य राज्यों में फंसे लोगों के घर लौटते ही उनका पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। यह काम पंचायत स्तर पर होगा। अन्य राज्यों से अपने गांव आने वाले लोग पंचायत में अपने नाम का पंजीकरण कराएंगे। इसके लिए पंचायतों को सशक्त किया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बाहर से आने वाले लोगों को असुविधा न हो इसके लिए गांव व पंचायत स्तर पर पंजीकरण की सुविधा की गई है। पंजीकरण के बाद बाहर से आने वाले सदस्य 14 दिन के लिए क्वारंटाइन में रहेंगे। इस समय के दौरान उनके खाने, रहने, इलाज आदि की व्यवस्था सरकार की तरफ से की जाएगी।

:: भारतीय अर्थव्यवस्था ::

प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) प्रणाली से जरूरतमंदों के खातों में पहुंचे 36649 करोड़ का अंतरण

  • वित्त मंत्रालय की रविवार को जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह राशि मजबूत डिजिटल भुगतान प्रौद्योगिकी लोक वित्त प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) के माध्यम से डीबीटी के जरिये केंद्रीय योजनाओं/केंद्र प्रायोजित योजनाओं के अलावा राज्य सरकारों की योजनाओं के तहत सीधे लाभार्थियों के खाते में डाली गई है। मंत्रालय के अनुसार कुल 36,659 करोड़ रुपये से अधिक राशि 16.01 करोड़ लाभार्थियों को कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए जारी बंद (24 मार्च से 17 अप्रैल) के दौरान दिए गए।
  • कुल राशि में से 27,442 करोड़ रुपये केंद्र प्रायोजित योजनाओं और केंद्रीय योजनाओं के लिये तथा 9,717 करोड़ रुपये राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत डीबीटी माध्यम से कुल 16.01 करोड़ लाभार्थियों के खाते में डाले गए हैं। मंत्रालय के ब्योरे के अनुसार केंद्र प्रायोजित और केंद्रीय योजनाओं से जुड़े लाभार्थियों की संख्या 11.42 करोड़ जबकि राज्यों की विभिन्न योजनाओं से संबद्ध लाभार्थियों की संख्या 4.59 करोड़ रही।

डीबीटी प्रणाली से लगती है गड़बड़ियों पर लगाम

  • नकद अंतरण के जरिये भुगतान के लिये लेखा महानियंत्रक (सीजीए) के डिजिटल भुगतान प्रैद्योगिकी पीएफएमएस का उपयोग पिछले तीन वित्त वर्ष में काफी बढ़ा है। वर्ष 2018 में जहां डीबीटी के माध्यम से कुल राशि का वितरण 22 फीसदी था, वह बढ़कर 2019-20 में 45 फीसदी हो गया। डीबीटी से जहां एक तरफ नकद राशि सीधे लाभार्थी के खाते में जाती है वहीं गड़बड़ियों पर अंकुश लगता है और दक्षता बढ़ती है।
  • केंद्रीय या केंद्र प्रायोजित जिन योजनाओं के लिए डीबीटी माध्यम से भुगतान किया गया, उसमें पीएम किसान, महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी), प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और राष्ट्रीय स्कॉलरशिप पोर्टल के जरिये विभिन्न मंत्रालयें की ‘स्कॉलरशिप’ योजना शामिल हैं।

पीएम गरीब कल्याण योजना पैकेज से भी की जा रही मदद

  • इसके अलावा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना पैकेज के तहत घोषित नकद भुगतान भी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के जरिये किया जा रहा है। महिला जनधन खाताधारकों के खाते में 500-500 रुपये डाले जा रहे हैं। वित्तीय सेवा विभाग के आंकड़े के अनुसार 13 अप्रैल 2020 तक कुल 19.86 करोड़ महिला खाताधारकों के खाते में 9,930 करोड़ रुपये डाले गए हैं।
  • मंत्रालय के अनुसार कोरोना वायरस के दौरान उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों ने डीबीटी के माध्यम से लाभार्थियों के खाते में पैसे डाले हैं। आंकड़ों के अनुसार राज्य सरकारों ने पीएफएमएस का उपयोग कर 4.59 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को 9,217.22 करोड़ रुपये का लाभ 24 मार्च से 17 अप्रैल के बीच दिया है।
  • वित्त मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम किसान योजना के अंतर्गत 8,43,79,326 लाभार्थिययों को कुल 17,733.53 करोड़ रुपये दिए गए हैं। इस योजना के तहत लाभार्थी किसानों को साल में 2,000 रुपये की तीन किस्तों में कुल 6,000 रुपये दिए जाते हैं।

मनरेगा के लाभार्थियों को पांच हजार करोड़ से ज्यादा का भुगतान

  • इसी प्रकार मनरेगा के तहत 1,55,68,86 लाभार्थियों को 5,406.09 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत 10,98,128 लाभार्थियों को 280.80 करोड़ रुपये तथा प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत 7,58,153 लाभार्थियों को 209.47 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है।

पृष्ठभूमि

  • उल्लेखनीय है कि एक अप्रैल 2015 से वित्त मंत्रालय ने डीबीटी के तहत भुगतान, लेखा और रिपोर्टिंग के लिए पीएफएमएस के उपयोग को अनिवार्य कर दिया था। उसने सभी मंत्रालयों और विभागों को यह सुनिश्चित करने को कहा था कि डीबीटी योजनाओं के तहत कोई भी भुगतान का प्रसंस्करण तब तक नहीं होगा जब तक ऐसे भुगतान के लिए इलेक्ट्रॉनिक भुगतान फाइल पीएफएमएस के जरिये प्राप्त नहीं हो।

''ओवरऑल बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स: FICCI

  • कोरोनावायरस की वजह से देश के कारोबारियों का विश्वास इस समय 2008-09 के वित्तीय संकट के बाद से सबसे कमजोर नजर आ रहा है। उद्योग मंडल फिक्की की ओर से कराए गए एक हालिया सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। फिक्की के बिजनेस कॉन्फिडेंस सर्वे के मुताबिक सरकार की ओर से सही समय पर कदम उठाए जाने से घरेलू अर्थव्यवस्था में सामान्य स्थिति को जल्द-से-जल्द बहाल करने में मदद मिलेगी। इस सर्वेक्षण में देश के कारोबारियों ने रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा रेपो रेट में और एक फीसद की कटौती की मांग की है।
  • कोरोनावायरस महामारी के फैलने की वजह से वैश्विक आर्थिक परिदृश्य लगातार कमजोर पड़े हैं। भारत सहित कई देशों ने सोशल डिस्टेंसिंग से जुड़े नियमों को अपनाया है और इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन लागू किया है। लॉकडाउन की वजह से आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप पड़ गई हैं।
  • फिक्की ने कहा, ''ओवरऑल बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स हालिया सर्वेक्षण में 42.9 पर रहा, जो इससे पहले के सर्वेक्षण में 59 पर था।''
  • संगठन ने कहा है कि वैश्विक आर्थिक संकट के समय वित्त वर्ष 2008-09 के दूसरी तिमाही में यह सूचकांक 37.8 पर था। उद्योग मंडल ने कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों और आने वाले समय को लेकर अनिश्चितता के चलते सूचकांक नीचे आया है।
  • फिक्की ने पूरी इंडस्ट्री (खासकर सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों) के लिए रियायत, नीतिगत समर्थन, टैक्स होलीडेज के रूप में वित्तीय पैकेज की हिमायत की है। उसने कहा है, ''बैंकों में निर्णय करने वालों की विश्वास बहाली के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है। इसी के साथ कर्ज देने की पूरी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कदम उठाए जाने की जरूरत है।''
  • संगठन ने कहा है कि लेबर मार्केट से जुड़े नियमों में तत्काल सुधार किए जाने की जरूरत है और प्राथमिकता के आधार पर ऐसा किया जाना चाहिए।

:: विज्ञान और प्रौद्योगिकी ::

किफायती इलेक्ट्रो-कैटेलिस्ट बनाने के लिए मछली के गलफड़ों का उपयोग

  • भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्तशासी संस्थान, इंस्टीच्यूट आफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएनएसटी),मोहाली हाल ही में मछली के गलफड़ों से निर्मित्त कारगर किफायती इलेक्ट्रो-कैटेलिस्ट लेकर आया है जो पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा रूपांतरण उपकरणों के निर्माण में मदद कर सकता है।

कार्यप्रणाली

  • आईएनएसटी के डा. रामेंद्र सुंदर डे और उनकी टीम ने बाईनरी ट्रांजिशन मेटल्स आयरन (एफई) पर आधारित उच्च सक्रिय औैक्सीजन रिडक्शन रिएक्शन (ओआरआर) इलेक्ट्रो-कैटेलिस्ट, और पशु अवशिष्ट से प्राप्ति के रूप में मछली के गलफड़ों (एफजी) से उत्पन्न मैगलीन (एमएन) तथा एन-डोप्ड पोरस कार्बन (एफई, एमएन, एन-एफसीजी) की खोज की है जिसमें एक अनूठी छिद्रयुक्त संरचना होती है और यह हीट ट्रीटमेंट के बाद कंडक्टिव कार्बन नेटवक्र्स प्रदान कर सकता है और एक कारगर इलेक्ट्रोड मैटेरियल बन सकता है। यह कैटेलिस्ट पीएच (pH < 1, 7, and >13) के व्यापक रेंज में सक्रिय ऑक्सीजन रिडक्शन रिएक्शन प्रदर्शित करने में सक्षम रहा और इसने कामर्शियल पीटी/सी कैटेलिस्ट से बेहतर प्रदर्शन किया।
  • उन्होंने एक एयर कैथोड के रूप में कैटेलिस्ट के साथ एक होममेड रिचार्जेबल जेडएन-एयर बैट्री (जेडएबी) का निर्माण किया जिसने लंबी अवधि के लिए कठिन साईक्लिंग के बाद लगभग स्थिर चार्ज-डिस्चार्ज वोल्टेज प्लेटियोस प्रदर्शित किया। इसने कामर्शियल पीटी/सी आधारित जेडएबी से बेहतर प्रदर्शन किया। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस कैटेलिस्ट के असाधारण प्रदर्शन के पीछे कारण एफई-एमएन आधारित बाईनरी मोईटी की उपस्थिति है जो वास्तव में आक्सीजन (ओ2) बाइंडिंग के लिए लाभदायक है और ऑक्सीजन-ऑक्सीजनबॉन्ड्स को कमजोर करने के जरिये अल्क्लाइन माध्यम में ऑक्सीजन रिडक्शन रिएक्शन (ओआरआर) कैटेलिक निष्पादन को बढ़ावा देता है।

क्या होंगें लाभ?

  • यह जैव-प्रेरित कार्बन नैनोस्ट्रक्चर फ्यूल सेल, बायो फ्यूल सेल और मेटल -एयर बैट्री जैसी कई नवीकरणीय ऊर्जा रूपांतरण एवं भंडारण प्रौद्योगिकियों की प्राप्ति में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायक हो सकती है।
  • वर्तमान कार्यनीति निम्न लागत,उच्च सक्षम जैव प्रेरित इलेक्ट्रो-कैटेलिस्ट को संश्लेषित करने का मार्ग समृद्ध करती है जो कार्बन पर कामर्शियल प्लेटिनम (पीटी/सी) कैटेलिस्ट से बेहतर है और इसका उपयोग ऊर्जा रूपांतरण एवं भंडारण अनुप्रयोगों के लिए अगली पीढ़ी के गैर बेशकीमती कार्बन आधारित इलेक्ट्रो-कैटेलिस्ट के लिए किया जा सकता है।
  • शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि सिंथेसिस प्रोटोकाल की इंजीनियरिंग के साथ मिलकर ट्रांजिशन मेटल्स एवं हेटेरोएटम्स का सावधानीपूर्वक चयन कारगर एवं पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा रूपांतरण उपकरणों के लिए उच्च सक्रिय निम्न लागत इलेक्ट्रो-कैटेलिस्ट की खोज के लिए एक नया रास्ता प्रशस्त कर सकता है।

वैश्विक आयनमंडलीय मॉडल पर आधारित आर्टीफिशियल न्यूरल नेटवर्क (एएनएनआईएम)

  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के एक स्वायत्त संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ जिओमैग्नेटिज्म (आईआईजी), नवी मुंबई के शोधकर्ताओं ने संचार और नौवहन के लिए अहम माना जाने वाला व्यापक डाटा कवरेज के साथ आयनोस्फेरिक (आयनमंडलीय) इलेक्ट्रॉन घनत्व की पूर्व सूचना देने वाला एक वैश्विक मॉडल विकसित किया है।
  • डॉ. वी साई गौतम ने आईआईजी के अपने शोध पर्यवेक्षक डॉ. एस तुलसीराम के साथ दीर्घकालिक आयनमंडलीय अवलोकन का उपयोग करते हुए एक नए प्रकार का वैश्विक आयनमंडलीय मॉडल पर आधारित आर्टीफिशियल न्यूरल नेटवर्क (एएनएनआईएम) विकसित किया है, जिससे आयनमंडलीय इलेक्ट्रॉन घनत्व की पूर्व सूचना दी जाएगी और उच्च मापदंडों का अनुमान लगाया जाएगा।
  • एएनएन पैटर्न की पहचान, वर्गीकरण, क्लस्टरिंग, सामान्यीकरण, रैखिक और गैर रैखिक डाटा फिटिंग और टाइम सीरीज के अनुमान जैसी समस्याओं के समाधान के लिए मानव मस्तिष्क (या जैविक न्यूरॉन्स) में होने वाली प्रक्रियाओं की जगह लेता है। अभी तक एएनएन के उपयोग से वैश्विक आयनमंडलीय परिवर्तनशीलता मॉडल तैयार करने की दिशा में बेहद कम प्रयास किए गए हैं।

क्यों आवश्यक है यह प्रणाली?

  • संचार और नौवहन के लिए आयनमंडलीय परिवर्तनशीलता की निगरानी काफी अहम है। आयनमंडलीय परिवर्तनशीलता व्यापक स्तर पर सौर उत्पन्न और तटस्थ वातावरण में पैदा होने वाली प्रक्रियाओं दोनों के द्वारा प्रभावित होती है, इसलिए इसे मॉडल के रूप में स्वीकार किया जाना मुश्किल है। वैज्ञानिकों ने सैद्धांतिक और अनुभवजन्य तकनीकों के उपयोग से आयनमंडलीय मॉडल विकसित करने की कोशिश की है; हालांकि इलेक्ट्रॉक घनत्व का सटीक अनुमान लगाना अभी तक चुनौतीपूर्ण कार्य बना हुआ है।

कैसे बनाया गया यह मॉडल?

  • हाल के वर्षों में आर्टीफिशियल न्यूरल नेटवर्क्स (एएनएन) ने ज्यादा जटिल और गैर रैखिक समस्याओं की देखरेख की संभावनाओं का प्रदर्शन किया है। इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए वैश्विक आयनमंडलीय अवलोकन का उपयोग करते हुए आयनमंडलीय मॉडल विकास में आईआईजी के दल द्वारा एक नया मशीन लर्निंग दृष्टिकोण अपनाया गया।
  • शोधकर्ताओं ने लगभग दो दशक के वैश्विक डिजिसॉन्डे (एक साधन जो रेडियो फ्रीक्वेंसी पल्सेस भेजकर रियल टाइम आधार पर आयनमंडल के इलेक्ट्रॉन घनत्व का आकलन करता है), ग्लोबल नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) रेडियो प्रच्छादन और ऊपरी स्तर पर ध्वनि अवलोकन (साउंडर्स ऑब्जर्वेशन) के व्यापक डाडाबेस के उपयोग के द्वारा एक न्यूरल नेटवर्क आधारित वैश्विक आयनमंडलीय मॉडल विकसित किया है। ये डाटाबेस कृत्रिम डाटा बिंदुओं (बाहरी) को हटाने के लिए विभिन्न गुणवत्ता नियंत्रण उपायों के साथ तैयार किए गए हैं और इनका उद्देश्य प्रशिक्षण देना है। दिन की संख्या, सार्वभौमिक समय, अक्षांश, देशांतर, एफ10.7 सूचकांक (फोटो आयनीकरण के लिए जिम्मेदार), केपी (इससे अशांत अंतरिक्ष मौसम स्थितियों का पता चलता है), चुंबकीय झुकाव, रुझान, निचला अक्षांश, दक्षिणी तटस्थ हवाओं जैसे इनपुट्स को अध्ययन में शामिल किया गया है। एएनएन का लक्ष्य (आउटपुट) किसी भी स्थान और समय के लिए लंबवत रूप में इलेक्ट्रॉन घनत्व है। एएनएनआईएम विकसित करने के लिए आईआईजी में उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर के उपयोग से एएनएन के साथ डाटा तैयार किया गया था।
  • आईआईजी दल द्वारा जारी एएनएनआईएम पूर्व सूचना का इलेक्ट्रॉन घनत्व अवलोकन में असंगत रडार और उपग्रह के साथ मिलान किया गया। इसके अलावा एनएनआईएम ने आयनमंडल की विसंगतियों को पुनः सफलतापूर्वक पेश किया। एएनएनआईएम ने भू-चुंबकीय तूफानों जैसे अशांत मौसम अवधि के दौरान आयनमंडल की सामान्य रूपात्मक विशेषताओं को भी दर्ज किया, जब सूर्य से पैदा होने वाले चुंबकीय बादल (कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) के रूप में जाना जाता है) पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर से परस्पर संपर्क में आते हैं।
  • आईआईजी शोधकर्ताओं द्वारा विकसित मॉडल को आयनमंडलीय अनुमानों में एक संदर्भ मॉडल के रूप में उपयोग किया जा सकता है और इसमें ग्लोबल नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) पोजिशनिंग खामियों की गणना में प्रयोग होने की पूरी क्षमताएं हैं।

बग स्निफर

  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के तहत एक स्वायत्त संस्थान के आघारकर अनुसंधान संस्थान (एआरआई), पुणे के अनुसंधानकर्ताओं ने बैक्टीरिया का तेजी से पता लगाने के लिए एक संवेदनशील और किफायती सेंसर विकसित किया है। यह पोर्टेबल उपकरण केवल 30 मिनट में एक मिलीलीटर नमूना से इतना कम कि केवल दस बैक्टीरिया कोशिकाओं का भी पता लगा सकता है। वर्तमान में, वे एक विधि पर काम कर रहे हैं  जिसमे इस्चेरिचिया कोलाई और साल्मोनेला टाइफिम्यूरियम को अलग करने और इनका पता लगाने का काम साथ-साथ किया जा सकेगा।

कार्यप्रणाली

  • प्रमुख अनुसंधानकर्ता डॉ धनंजय बोडास और एआरआई की उनकी टीम ने इसे 'बग स्निफर' कहा है, जो एक बायोसेंसर है। यह बैक्टीरिया की उपस्थिति का पता लगाने के लिए सिंथेटिक पेप्टाइड्स, चुंबकीय नैनोपार्टिकल्स और क्वांटम डॉट्स का उपयोग करता है। यह एक किफायती है और कम समय में जल और खाद्य जनित रोगाणुओं की जांच का प्रभावी तरीका प्रदान करता है। अनुसंधानकर्ताओं ने तांबे के तारों और पॉली (डाइमिथाइलसिलोक्सेन) से बने माइक्रो चैनल से युक्त एक चिप भी विकसित किया है। रोगाणुओं का पता लगाने के लिए उपलब्ध पारंपरिक तकनीकें कम संवेदनशील हैं और कोशिकाओं की कम संख्या पता नहीं लगा सकती हैं। इसके अलावा पारंपरिक तारीके में समय तथा म्हणत अधिक लगता है।  एआरओ उपकरण में 30 मिनट के भीतर प्रति 1 एमएल नमूने में 10 कोशिकाओं (निम्न सीमा) का पता लगाने की क्षमता है।
  • सबसे ज्यादा रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया इस्चेरिचिया कोलाई और साल्मोनेला टायफिम्यूरियम को अलग-अलग रूप से और साथ-साथ सिंथेटिक पेप्टाइड्स का उपयोग करके पता लगाया जा सकता है, जो एक पहचान तत्व के रूप में कार्य करते हैं और पता लगाने की प्रक्रिया को विशिष्टता प्रदान करते हैं। यइन पेप्टाइड्स में, जो पता लगाए जाने वाले बैक्टीरिया के लिए अत्यधिक विशिष्ट हैं, बहुत कम विरोधी- प्रतिक्रिया होती है। यह जैव प्रौद्योगिकी जर्नल में प्रकाशित हुआ था। शुरू में, पेप्टाइड्स से जुड़े चुंबकीय नैनोकणों को बैक्टीरिया के साथ माइक्रोचैनल के माध्यम से प्रवाह करने की अनुमति दी गई थी।
  • बाहरी चुंबकीय क्षेत्र का अनुप्रयोग करने पर, पेप्टाइड से जुड़े बैक्टीरिया को पृथक किया गया। अंत में, क्वांटम डॉट्स के साथ टैग किए गए पेप्टाइड को जाँच पूरा करने के लिए माइक्रोचैनल्स के माध्यम से प्रबाहित किया गया। बैक्टीरिया को पकड़ने के बादक्वांटम-डॉट- से जुड़े पेप्टाइड्स के कारण माइक्रोचैनल्स ने मजबूत और स्थिर प्रतिदीप्ति का प्रदर्शन किया।.

क्या होंगें लाभ?

  • बग स्निफर किफायती है, और इसे बनाने के लिए आवश्यक कच्चा माल आसानी से उपलब्ध हैं। प्रमुख अनुसंधानकर्ता डॉ धनंजय बोडास ने कहा कि नैनोसेंसर और इसे विकसित करने के लिए किए गए शोध में तेजी से लैब-ऑन-ए-चिप निदान के लिए कई संभावनाएं खुलेंगी।
  • वर्तमान में, अनुसंधानकर्ताइस्चेरिचियाकोलाई और साल्मोनेला टाइफिम्यूरियम का पता लगाने के साथ-साथ पृथक करने पर काम कर रहे हैं। इसके लिए लैंप (लूप-मेडीएतेड आईसोथर्मल एम्पलीफिकेशन) का उपयोग किया जा रहा है। डीएनए के प्रवर्धन के लिए यह एकल-ट्यूब तकनीक है और कुछ बीमारियों का पता लगाने के लिए कम लागत वाला विकल्प है। यह कार्य आईसीएमआर द्वारा वित्त पोषित है।

कोरोना वायरस के इलाज की नई उम्मीद: ‘डिकॉय प्रोटीन’ Decoy Proteins

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए वैज्ञानिक लगातार प्रयासरत हैं। कई देशों में इससे लड़ने के लिए दवा और टीके को बनाने की दिशा में काम तेजी से चल रहा है। हालांकि अब कोरोना वायरस संक्रमण के खिलाफ वैज्ञानिकों को एक नई जुगत नजर आ रही है। उनके अनुसार, लोगों को डिकॉय प्रोटीन (लुभाने/ फंसाने वाले प्रोटीन) का इंजेक्शन लगाकर इस वायरस का संक्रमण रोका जा सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ लिसेस्टर के शोधकर्ताओं ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है।

नकली से लुभाने की अवधारणा

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि कोविड-19 रोग पैदा करने वाला वायरस शरीर में फेफड़ों और वायुमार्ग की कोशिकाओं की सतह पर रिसेप्टर (ग्राही) के द्वारा प्रवेश करता है, जिसे एसीई-2 रिसेप्टर कहते हैं। ये रक्त प्रवाह में प्रवेश द्वार उपलब्ध कराने के साथ संक्रमण को सुगम बनाते हैं। अब वैज्ञानिक चाहते हैं कि वायरस को लुभाने के लिए इसकी ‘नकल’ (फेक) इंजेक्ट की जाए ताकि वायरस फेफड़ों के ऊतकों तक आने के बजाय एक दवा से चिपक जाए।

भ्रमित करने पर आधारित

  • यूनिवर्सिटी ऑफ लिसेस्टर के शोधकर्ताओं ने ऐसा प्रोटीन विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया है, जो न सिर्फ एसीई-2 का नकल हो बल्कि वायरस के लिए और भी ज्यादा आकर्षक हो। डेली मेल के अनुसार इसके पीछे सिद्धांत है कि यदि वायरस शरीर में प्रवेश करेगा तो एसीई-2 की नकल वायरस को भ्रमित कर देगी और यह उसे सोख लेगा, जिससे कोविड-19 के लक्षण विकसित होने की रोकथाम होगी। इस नजरिये को इस विकराल महामारी के खिलाफ उम्मीद की तरह देखा जा रहा है।

क्या है एसीई-2 रिसेप्टर

  • एसीई-2 रिसेप्टर पूरे शरीर की कोशिकाओं के सतह पर पाये जाते हैं लेकिन फेफड़ों और वायुमार्ग (एयरवेज) में पाये जाने वाले ये रिसेप्टर कोरोना वायरस के खास निशाने पर होते हैं। शरीर के अन्य हिस्सों में पाये जाने वाले ये रिसेप्टर एंजियोटेंसिन कन्वर्टिंग एंजाइम (एसीई) को कंट्रोल कर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के काम आते हैं। यह एंजाइम ह्रदय और रक्त प्रवाह से जुड़ा है। हालांकि फेफड़े के भीतर इसके कार्य को लेकर कोई विशिष्ट जानकारी नहीं है।

संक्रमण क्षमता रोकने की कोशिश

  • कुछ अन्य वैज्ञानिक यह भी कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना वायरस के लिए प्रभावी तौर पर रास्ता ही बंद करने को एसीई-2 से ही छुटकारा पा लिया जाए। लेकिन इसके खतरनाक साइड इफेक्ट हो सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ लिसेस्टर के प्रोफेसर निक ब्रिंडल कहते हैं, ‘हमारा लक्ष्य है कि वायरस को बांधने के लिए एक आकर्षक डिकॉय प्रोटीन बनाकर उसकी संक्रमण क्षमता को रोक दें और कोशिकाओं के सतह पर मौजूद रिसेप्टरों के कार्य को संरक्षित कर दें।’ दरअसल, होता यह है कि फेफड़े की कोशिकाओं के रिसेप्टरों तथा अन्य ऊतकों को ‘हाइजैक’ कर वायरस पूरे शरीर में फैल जाता है और रोग पैदा करता है। इसलिए यदि यह तरीका कामयाब रहा तो दुनिया भर में फैले इस घातक रोग के नए मामलों को रोकने की संभावना बनेगी।

शोध के सकारात्मक प्रारंभिक परिणाम

  • स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट तथा कनाडा के यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया (यूबीसी) के शोधकर्ताओं को इस अवधारणा के सकारात्मक प्रारंभिक परिणाम मिले हैं। टीम ने लैब में मानव कोशिकाओं में आनुवंशिक रूप से संवर्धित एसीई-2 का ‘घुलनशील’ रूप भी इस्तेमाल किया है, जिसे एचआरएस एसीई-2 कहा है। यह वायरस को फांस लेता है और एसीई-2 के मार्ग को बाधित कर देता है, जिससे प्रारंभिक चरण में वायरस का बढ़ना रुक जाता है। सेल जर्नल में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि एचआरएस एसीई-2 सार्स-कोविड वायरस-2 की वृद्धि रोक देता है, जो सेल कल्चर में 1,000 से 5,000 गुना तक कम हो सकता है।

कोरोना कैसे करता है शरीर में प्रवेश

  • वैज्ञानिक जर्नल सेल में मार्च में जर्मन शोधकर्ताओं के आलेख के मुताबिक, कोरोना वायरस मानव शरीर में प्रवेश के लिए रिसेप्टरों पर निर्भर होता है। वैज्ञानिकों ने 2002 के सार्स आउटब्रेक के दौरान भी पाया कि सार्स वायरस के भी मानव शरीर को भेदने में ये रिसेप्टर काफी अहम रहे। उल्लेखनीय है कि सार्स और कोरोना वायरस आपस में बहुत ही करीबी हैं। चूंकि यह बात सामने आई है कि एसीई-2 रिसेप्टर वायरस का एंट्री प्वाइंट है, इसलिए वैज्ञानिक इसे ही वायरस को रोकने के लिए हथियार बनाने के तरीके खोजने के लिए बेचैन हैं।

अलग नजरिये से भी

  • बढ़े कदम इस बीच, दो अमेरिकी कंपनियोंअलनायलम फार्मास्यूटिकल्स (मैसाचुसेट्स) तथा वीर बॉयोटेक्नोलॉजी (सैन फ्रांसिस्को) ने बहुत ही अलग दृष्टिकोण अपनाया है। ये कंपनियां वायरस को भ्रमित या विचलित करने के लिए ज्यादा एसीई-2 उपलब्ध कराने के बजाय यह कोशिश कर रही हैं कि शरीर में एसीई-2 की मात्रा ही कम कर दिया जाए। वे इस उम्मीद में हैं कि यदि एसीई-2 रिसेप्टर को शांत (साइलेंट) कर दिया जाए तो वायरस लक्षित कोशिकाओं को संक्रमित नहीं कर पाएगा, क्योंकि कोशिकाओं के करीब जाने में सक्षम ही नहीं होगा। लेकिन वैज्ञानिकों में इस पद्धति को लेकर मतभेद है, क्योंकि वे आश्वस्त नहीं हैं कि एसीई-2 रिसेप्टर को ब्लॉक करना ठीक रहेगा या नहीं।

फंसाने की कोशिश

  • एंजाइम की कॉपी एचआरएस एसीई-2 वायरस को असली कोशिकाओं के बजाय खुद से चिपकने को आकर्षित करता है। यह कोशिकाओं को उसी क्षमता से संक्रमित करने से भ्रमित करता है, जिसके कारण फेफड़ों और अन्य अंगों में वायरस की वृद्धि कम हो जाती है।

एसीई-2 का स्तर ज्यादा तो खतरा अधिक

  • पहली नजर में एसीई-2 के स्तर को कम करना अच्छा लग सकता है, क्योंकि सिद्धांतत: इससे वायरस के संक्रमण का खतरा कम होगा। लेकिन यदि किसी व्यक्ति में आनुवंशिक तौर पर एसीई-2 का स्तर ज्यादा है तो वह संक्रमण के प्रति ज्यादा संवेदनशील होगा। स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल, बासेल के शोधकर्ताओं ने दावा किया कि जिन लोगों में एसीई-2 का उच्च स्तर होता है, (जैसे कि उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह को नियंत्रित करने के लिए दवा लेने वाले लोग) उन्हें वायरस संक्रमण का ज्यादा जोखिम होता है।

ड्रग टायल को मिली हरी झंडी

  • ऑस्ट्रिया की कंपनी एपैरॉन बायोलॉजिक्स को उसकी एक दवा एपीएन001 के ट्रायल की हरी झंडी मिली है। इस दवा में एचआरएस एसीई-2 एक सक्रिय पदार्थ है। फेज-2 ट्रायल का लक्ष्य चीन में कोविड-19 से गंभीर रूप से संक्रमित 200 रोगियों के इलाज का है और पहले रोगी का इलाज जल्द ही किए जाने की उम्मीद है।

उम्मीद पर टिकी निगाहें

  • कुछ अन्य वैज्ञानिक इस दावे को नकारते हुए कहते हैं कि लोगों को अपनी दवाएं लेना बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि उपरोक्त दावे का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। एसीई-2 का स्तर कम करने के अनपेक्षित नतीजे हो सकते हैं, खासकर जब स्वस्थ लोगों में वे दवाएं रक्तचाप नियंत्रित रखने में अहम हों। एसीई-2 - फेफड़े को वायरस जन्य नुकसान से प्रभावी संरक्षण भी देता है। इसलिए कोविड-19 जैसे फेफड़े के संक्रमण वाले रोग में एसीई-2 का स्तर घटाना समस्या पैदा कर सकता है।
  • इसका उदाहरण 2008 में चूहे पर किया गया एक अध्ययन है। एसीई-2 से ‘मुक्त’ चूहे में सार्स वायरस के संक्रमण से सांस की गंभीर समस्या पैदा हो गई। यहां यह उल्लेखनीय है कि सार्स और कोविड-19 एक जैसे ही हैं। फिलहाल दुनिया भर में कोविड-19 पर सैकड़ों शोध हो रहे हैं और उन्हीं से संभवत: कोई स्पष्ट तस्वीर उभरे। वैसे, यूनिवर्सिटी ऑफ लिसेस्टर के शोधकर्ता अगले 12 सप्ताह में अपने ट्रायल के परिणामों की उम्मीद कर रहे हैं।

:: विविध ::

हिंदू कॉलेज की डॉ अपर्णा वाइट हाउस में बनीं आर्थिक सलाहकार

  • नोएडा की डॉ. अपर्णा माथुर को अमेरिका के व्हाइट हाउस में आर्थिक सलाहकार परिषद में नियुक्त किया गया है। वे इस परिषद में शामिल होने वाली एकमात्र भारतीय है। उनकी तैनाती लगभग 10 दिन पहले ही हुई है। उन्हें अमेरिका में कॉरपोरेट कर ढांचे को मजबूत करने की जिम्मेदारी मिली है।

कपिलदेव त्रिपाठी

  • कार्मिक मंत्रालय के एक आदेश के अनुसार आईएएस अधिकारी कपिलदेव त्रिपाठी को सोमवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का सचिव नियुक्त किया गया है। असम-मेघालय कैडर के 1980 बैच के आईएएस (सेवानिवृत्त) अधिकारी त्रिपाठी इस समय लोक उद्यम चयन बोर्ड (पीईएसबी) के अध्यक्ष हैं।

:: प्रिलिम्स बूस्टर ::

  • हाल ही में चर्चा में रहे 'बग स्निफर-bug sniffer' क्या है? (बैक्टीरिया की पता लगाने वाला बायो सेंसर)

  • चर्चा में रहे वैश्विक आयनमंडलीय मॉडल पर आधारित आर्टीफिशियल न्यूरल नेटवर्क (ANNIM) का प्रयोग किन क्षेत्रों में होगा?  (संचार और नौवहन)

  • हाल ही में इंस्टीच्यूट आफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST) मोहाली द्वारा किस जीव से पर्यावरण अनुकूल इलेक्ट्रो-कैटेलिस्ट का निर्माण किया है? (मछली, मछली के गलफड़ों से निर्मित)

  • हाल ही में चर्चा में रहे ‘डिकॉय प्रोटीन’ क्या है एवं इनका विशेष कार्य क्या होता है? (एंजाइम/ प्रोटीन का   कृत्रिम प्रतिरूप, वायरस/ बैक्टीरिया लुभाकर उन्हें नष्ट करना)

  • भारत सरकार द्वारा किसकी  सह-अध्यक्षता में कोविड-19 के टीके के विकास और दवाओं के परीक्षण के लिए टास्क फोर्स का गठन किया  गया है? (नीति आयोग और सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार)

  • हाल ही में  भारत में उद्योग के संदर्भ जारी हुए ''ओवरऑल बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स” कितना रहा एवं यह सर्वेक्षण किस संस्था के द्वारा कराया गया? (42.9, FICCI)

  • कोविड-19 की संरचना के समान दिखने वाली वाली औषधियां फूल का क्या नाम है एवं इसका मुख्य अनुप्रयोग क्या है? (ऑली या आयरन वुड,  प्राकृतिक रंग बनाने में)

  • चर्चा में रही प्रत्यक्ष लाभ अंतरण(DBT) के तहत भुगतान, लेखा और रिपोर्टिंग का अनिवार्य प्रबंधन किस प्रणाली के द्वारा होता है? (लोक वित्त प्रबंधन प्रणाली- PFMS)

  • चर्चा में रही कारपोरेट द्वारा संचालित सबसे बड़ा भोजन वितरण कार्यक्रम ‘‘मिशन अन्न सेवा” किस कंपनी की पहल है? (रिलायंस)

  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) ने कोविड-19 के टीके के विकास हेतु किन संस्थाओं के प्रस्ताव को वित्त पोषण हेतु मंजूरी प्रदान की है? (कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड, भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड)

  • हाल ही में किसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का सचिव नियुक्त किया गया है? (कपिल देव त्रिपाठी)

  • हाल ही में भारतीय मूल के किस व्यक्ति को अमेरिका के व्हाइट हाउस में आर्थिक सलाहकार परिषद में नियुक्त किया गया है? (डॉ अपर्णा माथुर)

  • हाल ही में किस नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक ने प्रयोगशाला में कोविड-19 के वायरस की उत्पत्ति का दावा किया है? (लूक मांटेग्नर- फ्रांस)

 

 

 

स्रोत साभार: Dainik Jagran (Rashtriya Sanskaran), Dainik Bhaskar (Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara (Rashtriya Sanskaran) Hindustan Dainik (Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times (Hindi & English), PTI, PIB

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