(दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर) यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में समाचार पत्रों का संकलन (12 और 13 अप्रैल 2020)

दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर


(दैनिक समसामयिकी और प्रिलिम्स बूस्टर) यूपीएससी और सभी राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं के लिए हिंदी में समाचार पत्रों का संकलन (12 और 13 अप्रैल 2020)


:: राष्ट्रीय समाचार ::

युक्ति (यंग इंडिया कॉमबैटिंग कोविड विथ नॉलेज, टेक्नालाजी एंड इनोवेशन)

  • कोरोना वायरस से जिस तरह से पूरा देश एकजुट होकर मुकाबला कर रहा है। ठीक उसी तरह मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी इस संकट की चुनौतियों से संगठित होकर मुकाबला करने की युक्ति (यंग इंडिया कॉमबैटिंग कोविड विथ नॉलेज, टेक्नालाजी एंड इनोवेशन) खोजी है। यानि मंत्रालय से जुड़ी सारी गतिविधियों का संचालन और निगरानी अब इसी युक्ति पोर्टल के जरिए ही की जाएगी।

क्या है युक्ति की विशेषता?

  • यह पोर्टल कोरोना वायरस की वजह से शैक्षणिक क्षेत्र के सामने आ रही चुनौतियों को समग्र तरीके से सामने रखेगा। साथ ही मंत्रालय की ओर से इससे निपटने के लिए किए गए प्रयास शैक्षणिक संस्थानों और छात्रों के लिए कितने उपयोगी साबित हुए, इसकी भी पूरी जानकारी इस पर मिलेगी।
  • इस पोर्टल से सभी शैक्षणिक संस्थानों को जोड़ा जाएगा। साथ ही वह इससे जरिए वह सीधे अपने सुझाव भी दे सकेंगे। इसके साथ ही कोरोना के संकट काल में छात्र भी इस पर अपनी समस्याओं को रख सकेंगे। खासकर प्लेसमेंट जैसी समस्याओं पर मंत्रालय की ओर से पूरी मदद की जाएगी।
  • इस पोर्टल के माध्यम से स्कूल-कालेजों और विवि के पठन-पाठन पर भी नजर रखी जा सकेगी।

कुछ कारोबारी गतिविधियों बढ़ने के साथ लॉकडाउन बढ़ने के संकेत

  • कोरोना वायरस महामारी के महासंकट को थामने के लिए 14 अप्रैल तक लागू मौजूदा देशव्यापी लॉकडाउन का दो हफ्ते और बढ़ना तय हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लॉकडाउन बढ़ाने की मांग की। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो लॉकडाउन को 30 अप्रैल तक बढ़ाए जाने को सही ठहराते हुए इसका अनौपचारिक एलान तक कर डाला। हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री लॉकडाउन बढ़ाने के प्रस्ताव पर गौर कर रहे हैं। माना जा रहा कि प्रधानमंत्री अगले दो दिनों में एक बार फिर देश को संबोधित करते हुए लॉकडाउन बढ़ाने की आधिकारिक घोषणा करेंगे। पीएम ने बैठक में लॉकडाउन बढ़ाने के जहां संकेत दिए वहीं यह भी साफ कर दिया कि लॉकडाउन के दूसरे स्टेज का मूल मंत्र ‘जान भी, जहान भी’ होगा। संकेत साफ है कि देश के आर्थिक विकास के रुके पहिए को शुरू करने के लिए कुछ आर्थिक गतिविधियों को सर्तकता के साथ संचालन की इजाजत दी जा सकती है। पीएम ने मुख्यमंत्रियों को भरोसा दिलाते हुए यह भी कहा कि वह 24 घंटे उपलब्ध हैं। जरूरत पड़ने पर कभी भी कोई उनसे संपर्क कर सकता है।

तीन जोन में बंटेंगे क्षेत्र

  • लॉकडाउन के दूसरे चरण में सरकार बदली पाबंदियों के साथ क्षेत्रवार रणनीति पर विचार कर रही है। यह रणनीति देशव्यापी लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से हटाने के लिए एक्जिट प्लान की तरह भी काम करेगी।
  • रेड जोन : जिन जिलों में संक्रमण के ज्यादा मामले आ रहे हैं, उन जिलों को पूरी तरह सील रखा जाएगा। वहां आवश्यक सेवाओं के अतिरिक्त किसी को अनुमति नहीं होगी।
  • ऑरेंज जोन : जहां मामले नियंत्रित हैं और नए मामले नहीं आ रहे, वहां सतर्कता के प्रावधानों के साथ सीमित आवाजाही और कृषि से जुड़ी गतिविधियों की अनुमति मिलेगी।
  • ग्रीन जोन : जिन जिलों में कोई संक्रमित नहीं, वहां कृषि के साथ-साथ कुछ एमएसएमई इकाइयों को सशर्त संचालन की अनुमति होगी। फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन अनिवार्य होगा।

सेट टॉप बॉक्स में पोर्टेबिलिटी की सिफारिश

  • टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने डीटीएच और केबल सर्विस की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव की नींव रख दी है। नियामक ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रलय से सिफारिश की है कि सभी सेट टॉप बॉक्स को इंटर ऑपरेबल बनाना अनिवार्य किया जाए। इसके लिए संबंधित कानूनों में जरूरी प्रावधान करने को कहा गया है। ऐसा होने से डीटीएच और केबल सर्विस में भी पोर्टेबिलिटी संभव होगी यानी बिना सेट टॉप बॉक्स बदले किसी भी सर्विस प्रोवाइडर से सेवा ले सकेंगे। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ने और सेवा बेहतर होने की उम्मीद है।

ट्राई की सिफारिश

  • ट्राई ने अपनी सिफारिश में कहा, ‘देश में सभी सेट टॉप बॉक्स को तकनीकी तौर पर इंटर ऑपरेबिलिटी में सक्षम होना चाहिए।’ इस काम के लिए कंपनियों को छह महीने का समय देने की बात कही गई है। नियामक ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रलय से एक को-ऑर्डिनेशन कमेटी बनाने को भी कहा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रलय, ट्राई, भारतीय मानक ब्यूरो और टीवी विनिर्माताओं के प्रतिनिधियों को बतौर सदस्य शामिल करने को कहा गया है। कमेटी के गठन से सेट टॉप बॉक्स को लेकर नए मानक निर्धारित करने के काम को गति मिलेगी। ट्राई ने सेट टॉप बॉक्स के साथ-साथ सभी टीवी निर्माताओं को भी ऐसे डिजिटल टीवी बनाने का निर्देश देने को कहा है, जिनमें यूएसबी पोर्ट बेस्ड कॉमन इंटरफेस हो। इसका अर्थ है कि सभी डिजिटल टीवी में अनिवार्य रूप से एक ऐसा ओपन यूएसबी पोर्ट होगा जिससे डीटीएच या केबल सर्विस को कनेक्ट किया जा सकेगा।

क्या है इंटर ऑपरेबिलिटी

  • सेट टॉप बॉक्स के इंटर ऑपरेबल होने का मतलब है कि वह तकनीकी रूप से किसी भी सर्विस प्रोवाइडर की सर्विस को सपोर्ट कर सकेगा। इसमें सैटेलाइट के जरिये सेवा देने वाले डीटीएच ऑपरेटर और केबल नेटवर्क के जरिये सर्विस देने वाले ऑपरेटर भी शामिल हैं। ग्राहक किसी भी सर्विस प्रोवाइडर से या बाजार में किसी ओपन सोर्स से सेट टॉप बॉक्स खरीदकर इस्तेमाल कर सकेगा।

क्या है लाभ?

  • अभी ग्राहक को सर्विस प्रोवाइडर की तरफ से ही सेट टॉप बॉक्स मिलता है। सर्विस प्रोवाइडर बदलने के लिए सेट टॉप बॉक्स भी बदलना पड़ता है। इस कारण से कई बार ग्राहक चाहकर भी सर्विस प्रोवाइडर नहीं बदलता है। ट्राई का कहना है कि इस कारण से इस क्षेत्र में टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन और सर्विस क्वालिटी सुधारने की दिशा में कुछ खास काम नहीं हो पा रहा है।

अहमदाबाद: अब बाहर निकलने पर मास्क पहनना अनिवार्य

  • गुजरात के अहमदाबाद में कोरोना वायरस के मामलों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर नगर निगम ने सोमवार से लोगों के लिए घर से बाहर निकलते समय मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया है। ऐसा नहीं करने पर पांच हजार का जुर्माना या तीन साल की सजा हो सकती है।
  • अहमदाबाद में रविवार को कोविड-19 के 19 मामले सामने आने के बाद शहर में संक्रमितों की संख्या 266 हो गई है जो गुजरात में सबसे अधिक है। अब तक इस बीमारी के चलते शहर में 11 लोगों की मौत हो गई है। गुजरात में कोरोना के अब तक कुल 493 मरीज मिले हैं। इनमें से 23 की मौत हो चुकी है और 44 मरीज पूरी तरह ठीक हो चुके हैं।

:: अंतर्राष्ट्रीय समाचार ::

'दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था' रिपोर्ट: वर्ल्ड बैंक

  • वर्ल्ड बैंक ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जबर्दस्त झटका दिया है। इससे देश की अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन 1991 के उदारीकरण के बाद सबसे खराब रहेगा। वर्ल्ड बैंक ने रविवार को 'दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था' पर केंद्रित रिपोर्ट में कहा कि 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर घटकर 1.5 से 2.8 प्रतिशत के बीच रहेगी।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

  • रिपोर्ट में कहा है कि 2019-20 में भारतीय अथव्यवस्था की वृद्धि दर 4.8 से 5 प्रतिशत के बीच रहेगी।
  • कोविड-19 का झटका ऐसे समय लगा है जबकि वित्तीय क्षेत्र पर दबाव की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था में पहले से सुस्ती है। इस महामारी पर अंकुश के लिए सरकार ने देशव्यापी पाबंदी लागू की है। इससे लोगों की आवाजाही रुक गई है और वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हुई है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 की वजह से घरेलू आपूर्ति और मांग प्रभावित होने के चलते 2020-21 में आर्थिक वृद्धि दर घटकर 1.5 से 2.8 प्रतिशत रह जाएगी। वैश्विक स्तर पर जोखिम बढ़ने के चलते घरेलू निवेश में सुधार में भी देरी होगी।
  • रिपोर्ट कहती है कि अगले वित्त वर्ष यानी 2021-22 में कोविड-19 का प्रभाव समाप्त होने के बाद अर्थव्यवस्था पांच प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर सकेगी। हालांकि, इसके लिए अर्थव्यवस्था को वित्तीय और मौद्रिक नीति के समर्थन की जरूरत होगी।

पृष्ठभूमि

  • विश्व बैंक ने भी अन्य वैश्विक एजेंसियों के साथ सुर में सुर मिलाते हुए कोविड-19 के मद्देनजर वृद्धि दर का अनुमान घटाया है। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की वृद्धि दर का अनुमान घटाकर चार प्रतिशत किया है। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने भी वृद्धि दर के अनुमान को घटाकर 3.5 प्रतिशत कर दिया है।
  • फिच रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष में भारत की वृद्धि दर दो प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की वृद्धि दर के अनुमान को घटाकर 5.5 से 3.6 प्रतिशत कर दिया है। मूडीज इन्वेस्टर सर्विसेज ने 2020 के कैलंडर वर्ष में भारत की वृद्धि दर 2.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। पहले उसने इसके 5.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था।

बंग बंधु की हत्या में शामिल पूर्व सैन्य अधिकारी को फांसी

  • बंग बंधु शेख मुजीबुर रहमान की हत्या में शामिल बांग्लादेश सेना के एक पूर्व अधिकारी र्व कैप्टन अब्दुल माजिद को रविवार लगते ही रात 12.01 (स्थानीय समय) पर फांसी दे दी गई।

पृष्ठभूमि

  • उल्लेखनीय है बांग्लादेश के संस्थापक बंग बंधु की हत्या 1975 में एक तख्ता पलट के दौरान हुई थी। सेना के कई अधिकारी इसमें शामिल थे। हत्या के बाद अब्दुल माजिद फरार हो गया था। बांग्लादेश के गृहमंत्री असदुज्जमां खान कमाल ने बताया कि माजिद ने खुद हत्या की बात स्वीकार की था। वह नवंबर 1975 में ढाका जेल में चार लोगों की हत्या में शामिल था।

:: भारतीय राजव्यवस्था ::

मुख्यमंत्री राहत कोष में सीएसआर फंड की मांग

  • देश भर में पॉजिटिव मामलों की बढ़ती संख्या के कारण कोरोना वायरस के खिलाफ संघर्ष लंबा खिंचने की आशंका को देखते हुए राज्यों से कारपोरेट सीएसआर फंड मुख्यमंत्री राहत कोष या कोविड-19 के लिए राज्य राहत कोष में भी भेजे जाने की मांग उठ रही है। सूत्रों ने कहा कि कारपोरेट मामलों के मंत्रलय को राज्य सरकारों समेत विभिन्न भागीदारों से प्रतिवेदन मिले हैं। सीएम राहत कोष में कारपोरेट अंशदान को भी कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबलिटी (सीएसआर) पर खर्च के रूप में शामिल करने की मांग की गई है। अभी तक उनकी मांग पर कोई फैसला नहीं लिया गया है।

क्या है सीएसआर?

  • कंपनी कानून, 2013 में लाभप्रद स्थिति में चल रही कुछ निश्चित श्रेणी की कंपनियों को अपने तीन साल के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम दो फीसदी हिस्सा कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत खर्च करना होगा। यह नियम 1,000 करोड़ रुपये या अधिक के टर्नओवर या 5,00 करोड़ रुपये या अधिक के नेट वर्थ अथवा 5 करोड़ रुपये या अधिक के शुद्ध लाभ वाली कंपनी पर लागू होगा।

:: भारतीय अर्थव्यवस्था ::

एचडीएफसी में चीन के केंद्रीय बैंक पीबीसी ने बढ़ाई अपनी हिस्सेदारी

  • चीन के केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना यानी पीबीसी ने भारत में संपत्ति के बदले कर्ज देने वाली एचडीएफसी लिमिटेड में हिस्सेदारी एक प्रतिशत से अधिक कर ली है। एचडीएफसी ने बताया कि इस वर्ष 31 मार्च को चीन के केंद्रय बैंक की हिस्सेदारी 1,74,92,909 शेयरों के साथ 1.01 प्रतिशत पर जा पहुंची।
  • कई रिपोर्ट का कहना है कि चीन के प्रमुख बैंक भारत में निवेश की संभावनाएं तलाश रहे हैं। गौरतलब है कि चीन की कई कंपनियों और निवेशकों ने भारतीय कंपनियों में निवेश किया हुआ है। लेकिन चीन के प्रमुख बैंकों का भारत की बैंकिंग या प्रमुख गैर-बैंकिंग कंपनियों में कोई उल्लेखनीय निवेश अब तक नहीं रहा है।

:: विज्ञान और प्रौद्योगिकी ::

हर्बल डिवार्मर ‘वर्मीवेट’

  • राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान-भारत (NIF) ने पशुओं में कृमि के उपचार के लिए रासायनिक विधि के विकल्प के रूप में एक स्वदेशी हर्बल दवा (डिवार्मर) पेश की है। स्वदेशी हर्बल दवा (डिवार्मर) का उत्पादन वाणिज्यिक रुप में ‘वर्मीवेट’ के नाम से किया जा रहा है।
  • इस दवा के निर्माण के लिए NIF ने गुजरात के श्री हर्षाभाई पटेल द्वारा भेजे गए एक उपचार विधि पर काम किया जिसके माध्यम से पशुओं में इंडोपारासाइट (कृमि) संक्रमण बीमारी का इलाज किया जाता था। एनआईएफ ने इस स्वदेशी उपचार को अद्भुत पाया।  प्राकृतिक रुप से संक्रमण में इस कृमिनाशक के प्रभाव का मूल्यांकन के उपरांत ग्रासरूट पेटेंट के तहत इस स्वदेशी ज्ञान को श्री हर्षाभाई पटेल के नाम से पेटेंट दिया गया।
  • पशुओं में इंडोपारासाइट (कृमि) संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए एनआईएफ ने इस दवा-उपचार का मूल्य संवर्धन किया और राकेश फार्मास्यूटिकल्स, गांधी नगर (गुजरात) के माध्यम से इसका वाणिज्यिक उत्पादन किया। उत्पाद को ‘वर्मीवेट’ नाम दिया गया।

क्या होता है पशुओं में कृमि संक्रमण?

  • पशुओं में कृमि संक्रमण एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है जिसके कारण दस्त होता है, वजन और खून की कमी होती है तथा प्रजनन स्वास्थ्य प्रभावित होता है। इससे उत्पादकता और वृद्धि भी प्रभावित होती है। रासायनिक दवाओं के अनुचित प्रयोग से प्रतिरोध पैदा होता है। नियमित जांच के दौरान कृमि की उपस्थिति और रसायन आधारित थेरेपी के द्वारा मृदा स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव के कारण वैकल्पिक स्थायी चिकित्सा की आवश्यकता होती है।

केले की खेती पर पनामा विल्ट का प्रकोप

  • पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में केले की फसल में पनामा विल्ट नामक फंगस रोग केले की फसल को बुरी तरह नुकसान पहुंचा रहा है। तापमान बढ़ने पर फसल पर यह गंभीर महामारी का रूप ले सकता है। वैज्ञानिकों ने इसकी रोकथाम के लिए प्रभावित क्षेत्रों को चिन्हित कर दिया है।
  • सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ सबट्रापिकल हार्टिकल्चर के निदेशक डॉक्टर शैलेंद्र राजन का कहना है ‘दुनिया के कई देशों में पनामा विल्ट की रोकथाम का फिलहाल कोई कारगर उपाय नहीं है। इस बीमारी को रोकने का एक ही तरीका है, जिसमें एक खेत को दूसरे खेत से अलग रखा जाए।’ प्रभावित खेत की मिट्टी व पानी से दूसरे खेत को बचाना होता है। टिश्यू कल्चर वाले पौध ही लगाए जाएं। इसीलिए सरकार ने टिश्यू कल्चर और रोकथाम में लगे लोगों को लॉकडाउन से मुक्त कर दिया है। तापमान बढ़ने पर बीमारी महामारी में तब्दील हो जाती है जिससे खड़ी फसलें सूख जाती है। इसीलिए नई फसल के लिए पौध टिश्यू कल्चर से तैयार की जा रही है।
  • इंडियन काउंसिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आइसीएआर) के महानिदेशक डॉक्टर त्रिलोचन महापात्र ने बताया कि केले की फसल में फ्यूजेरियम विल्ट की महामारी आने वाले महीनों में उग्र हो सकती है। इसके लिए आइसीएआर के पास फ्यूजीकांट प्रणाली है, जिसका उपयोग इसके प्रबंधन में सक्षम है। तापमान बढ़ने के साथ ही पहले से विकसित बायोकंट्रोल एजेंट का सक्रिय करना होता है।’
  • आइसीएआर के वैज्ञानिकों के मुताबिक केले की फसल में यह रोग फिलहाल केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में ही व्याप्त है। देश के अन्य राज्यों में इसका प्रकोप अभी नहीं है। इससे उत्तर प्रदेश के सात जिलों बिहार के पांच जिलों में इसका प्रकोप है।

बॉम्बे के शोधकर्ताओं ने विकसित किया स्मार्ट स्टेथोस्कोप

  • आइआइटी बॉम्बे के शोधकर्ता की टीम ने ऐसा डिजिटल स्टेथोस्कोप (डिजिटल आला) विकसित किया है जो दूर से किसी भी व्यक्ति की धड़कनों को सुन सकता है और उसे रिकॉर्ड कर सकता है यानी अब इसके लिए मरीजों की छाती से स्टेथोस्कोप लगाना जरूरी नहीं होगा। माना जा रहा है कि इस डिवाइस का इस्तेमाल कोरोना संक्रमित मरीजों से स्वास्थ्यकर्मियों को होने वाले संक्रमण का खतरा कम होगा।
  • शोधकर्ताओं ने इस नई डिवाइस का पेटेंट भी हासिल कर लिया है। ‘आयुडिवाइस’ नाम से स्टार्टअप चला रही शोधकर्ताओं की इस टीम ने देश के विभिन्न अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा केंद्रों में ऐसे 1,000 स्टेथोस्कोप भेजे हैं। यह डिवाइस रिलाइंस और पीडी हिंदुजा अस्पताल के डॉक्टरों की मदद से विकसित की गई है।

ऐसे काम करती है डिवाइस

  • डिजिटल स्टेथोस्कोप के डेवलपर आदर्श ने कहा कि नई स्मार्ट डिवाइस में कान में लगाने वाले दो उपकरण एक ट्यूब से जुड़े रहते हैं। यह ट्यूब बीमारी का पता लगाने में बाधा उत्पन्न करने वाले शोर को हटाकर शरीर की ध्वनियों को कान में लगे उपकरणों तक भेजती है। उन्होंने कहा कि इसका दूसरा फायदा यह भी है कि नया स्टेथोस्कोप विभिन्न आवाजों को बढ़ाने के साथ-साथ फिल्टर करके उन्हें इलेक्ट्रॉनिक संकेतों में भी बदल सकता है। आदर्श ने बताया कि ये संकेत स्मार्टफोन या लैपटॉप पर फोनोकार्डियोग्राम (धड़कन संबंधी चार्ट) के रूप में दिखाई देते हैं, जो ब्लूटूथ के जरिये एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। जबकि पारंपरिक स्टेथोस्कोप में ये सुविधाएं नहीं होती हैं।

कोविड-19 के मरीजों के इलाज में मददगार हो सकता है मेलाटोनिन

  • शोधकर्ताओं का कहना है कि कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों के इलाज में मेलाटोनिन मददगार हो सकता है। यह एक तरह का प्राकृतिक हार्मोन है, जो मस्तिष्क की छोटी सी ग्रंथि में बनता है। मनुष्य के सोने-जागने के क्रम को मेलाटोनिन हार्मोन ही नियंत्रित करता है।
  • लाइफ साइंसेज जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, आंकड़ों से इस बता का पता चला है कि मेलाटोनिन वायरस से संबंधित होने वाली बीमारियों को रोकने में मदद करता है। बीजिंग स्थित पेकिंग यूनियन मेडिकल कॉलेज अस्पताल के शोधकर्ता चांगवेई लियू और उनके सहकर्मियों ने विभिन्न रोगों के मरीजों में मेलाटोनिन के लाभकारी प्रभावों का विश्लेषण किया है। कई अन्य अध्ययनों में भी मेलाटोनिन को गंभीर मरीजों के इलाज में मददगार पाया गया है।

क्या है मेलाटोनिन हार्मोन?

  • यह एक तरह का प्राकृतिक हार्मोन है, जो मस्तिष्क की छोटी सी ग्रंथि में बनता है। मनुष्य के सोने-जागने के क्रम को मेलाटोनिन हार्मोन ही नियंत्रित करता है।

जैविक हथियारों से कम खर्च में बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकते हैं आतंकी

  • संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने कोरोना संकट के बीच आतंकियों के जैविक हमला करने के खतरे के प्रति आगाह किया है। जैविक हथियार न सिर्फ बड़े पैमाने पर तबाही मचाने की क्षमता रखते हैं, बल्कि उनकी पहचान काफी मुश्किल और निर्माण बेहद किफायती होता है। आइए जानें, जैविक हमला क्या होता है और इतिहास में कब-कैसे जैविक हथियारों का इस्तेमाल किया गया है-

क्या होता है जैविक हमला

  • जैविक हमले में मनुष्यों और पशु-पक्षियों को मारने अथवा निशक्त बनाने या फिर फसलों को तबाह करने के लिए उन पर संक्रामक तत्वों (मसलन, घातक जीवाणु, विषाणु, कीटाणु व फफूंद) या जैविक आविष (पेड़-पौधों, जीवों में पैदा होने वाले जहरीले पदार्थों) से लैस बायोवेपन (जैविक हथियार) से वार किया जाता है। सैन्य संघर्ष में बायोवेपन का प्रयोग युद्ध अपराध माना जाता है।

जनसंहारक हथियारों का दर्जा

  • जैविक हथियारों के निर्माण में उन सजीव तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है, जो विभिन्न सतहों पर कई दिनों तक जीवित रहने और अपनी संख्या में तेजी से इजाफा करने में सक्षम हैं। परमाणु और रासायनिक हथियारों की तरह ही बायोवेपन को भी जनसंहारक हथियारों की श्रेणी में रखा गया है। इनसे हमलावर किसी एक व्यक्ति से लेकर सीमित लोगों के समूह या पूरी की पूरी आबादी को निशाना बना सकता है।

खतरनाक क्यों

  • चेचक और न्यूमोनिक प्लेग के लिए जिम्मेदार विषाणु एयरोसोल (सांस लेने और बोलने के दौरान नाक-मुंह से निकलने वाली पानी की सूक्ष्म बूंदें) के जरिये एक व्यक्ति से दूसरे में फैल सकते हैं
  • चूंकि जैविक हमले का असर उभरने में समय लगता है, इसलिए इसे भांपना आसान नहीं होता, यही नहीं, ऐसे हमले में संक्रमण का प्रसार उन लोगों में भी हो सकता है, जो निशाने पर होते ही नहीं हैं
  • इसके अलावा, लैब में रिसर्च के दौरान मामूली चूक से शोधकर्ता खुद वायरस की जद में आ सकता है (जैसा इबोला के मामले में हुआ), उससे बाहरी लोगों में भी संक्रमण फैलाने का खतरा रहता है

तीन तरह से होता वार

  • हमलावर खाने-पीने की चीजों, फसलों और जलस्रोतों में जैविक आविष मिला सकता है
  • हथियार प्रणाली (पाउडर बम, कीट बम, स्प्रे आदि) में संक्रामक तत्वों, जहरीले पदार्थों को कैद करना संभव
  • वायरस से लैस व्यक्ति या कपड़े-पत्र भेजकर भी बड़ी आबादी को संक्रमित करना मुमकिन

इस्तेमाल का इतिहास

  • 12वीं शताब्दी के हत्ती साहित्य में जैविक हमले का पहला ज्ञात जिक्र, तुलारेमिया (संक्रामक बुखार, त्वचा इंफेक्शन) के शिकार मरीजों को दुश्मन के इलाकों में भेजा गया था, जिससे वहां महामारी फैल गई
  • कुछ इतिहासकारों ने ट्रॉय के युद्ध में जैविक आविष से लैस तीरों के इस्तेमाल का जिक्र किया है, यूनान में हुए पहले धर्म युद्ध में प्राचीन किरहा प्रांत के जलस्रोतों में विशाक्त पौधे के अंश मिलाने का है दावा
  • बताया जाता है कि 1346 में काफा (अब थियोडोशिया) पर कब्जे की लड़ाई में मंगोल शासकों ने प्लेग से मरने वाले अपने जवानों को जैविक हथियार के तौर पर आजमाया, इससे दुश्मन सेना में महामारी फैल गई
  • यह भी कहा जाता है कि 1710 में स्वीडन से युद्ध में रूसी सेनाओं ने रेवल (अब तालिन) में प्लेग से मरने वाले लोगों के शव छोड़ दिए थे, 1785 में ला काले पर कब्जे के लिए ट्यूनीशियाई फौजों ने संक्रमित कपड़ों का सहारा लिया था

विश्व युद्ध और उसके बाद

  • प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के दौरान दुश्मन देशों में फसलें तबाह करने और मवेशियों को संक्रमित कर महामारी फैलाने के लिए जर्मनी ने एंथ्रेक्स व ग्लैंडर्स का सहारा लिया
  • इतिहास में जिक्र है कि 1940 के दशक में ब्रिटेन और अमेरिका ने तुलारेमिया, एंथ्रेक्स, ब्रूसेलोसिस व बॉट्युलिज्म की मदद से बड़े पैमाने पर जैविक हथियार तैयार किए थे
  • 1930 और 1940 के दशक में चीन-जापान युद्ध के दौरान जापानी वायुसेना ने चीन के निंग्बो शहर पर भारी संख्या में प्लेग से संक्रमित कीटों से भरे सेरेमिक बम गिराए थे
  • सितंबर-अक्तूबर 2001 में अमेरिकी संसद और मीडिया के सदस्यों को एंथ्रेक्स के विषाणु से संक्रमित पत्र भेजे गए, हमले में 22 लोग बीमार पड़े, इनमें से पांच की मौत भी हो गई

जैव-आतंकवाद का खतरा

  • जैविक हथियारों की पहचान मुश्किल, इस्तेमाल आसान और उत्पादन बेहद किफायती
  • व्यापक स्तर पर असर उभरने में समय लगता, ऐसे में जांच एजेंसियों से बचना आसान
  • बड़े क्षेत्रफल में भीषण तबाही मचाने की क्षमता, इसलिए आतंकी इस्तेमाल का जोखिम ज्यादा

सस्ता और घातक

  • 0.05% ही लागत आती पारंपरिक विध्वंसक हथियारों के मुकाबले बायोवेपन बनाने में
  • 3 से 7 दिन तक जीवित रह सकते हैं संक्रामक तत्व अलग-अलग सतहों और व्यक्ति में

170 देशों ने प्रतिबंध को दी मान्यता

  • 1972 में जैविक हथियार संधि (बीडब्ल्यूसी) के जरिये बायोवेपन के उत्पादन, एकत्रिकरण और इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया गया था, ताकि बड़े पैमाने पर लोगों की जान लेने के साथ ही आर्थिक-सामाजिक गतिविधियों को पूरी तरह से ठप करने की कूव्वत रखने वाले जैविक हमलों को रोका जा सके। अप्रैल 2013 तक दुनिया के 170 देश बीडब्ल्यूसी को मान्यता दे चुके हैं।

कोविड-19 के इलाज में मददगार हो सकता है पोरफाइरिडियम (लाल सूक्ष्म शैवाल)

  • समुद्री लाल शैवाल से बने यौगिकों का उपयोग सैनिटरी वस्तुओं पर एक कोटिंग सामग्री के रूप में किया जा सकता है और साथ ही इसका उपयोग कोविड-19 से लड़ने के लिए एंटीवायरल दवाओं के उत्पादन में भी किया जा सकता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है। शोधकर्ताओं ने कहा कि प्राकृतिक स्रोतों, जैसे कि वनस्पतियों और जीवों, बैक्टीरिया, कवक और बड़े पौधों से प्राप्त उत्पादों में वायरस के कारण होने वाली बीमारियों से लड़ने की काफी क्षमता होती है।
  • पॉलीसैकराइड्स जैसे समुद्री घास, अल्गीनेट्स, फूकोडिन, कारागीनन, रमनन सल्फेट जैसे प्राकृतिक यौगिकों में जबरदस्त एंटीवायरल क्षमता होती है। अध्ययन का टाइटिल 'मरीन रेड अल्गा पोरफिरिडियम एज ए सोर्स ऑफ सल्फेटेड पॉलीसकाराइड्स फॉर कंबेटिंग अगेंस्ट कोविड-19' है, जिसमें अध्ययनकर्ताओं ने मौजूदा उपलब्ध आंकड़े के संदर्भ में समुद्री शैवाल से प्राप्त सल्फेट पॉलीसैकराइड्स के संभावित एंटीवायरस क्षमता की जांच की।
  • अध्ययन के अनुसार, “पोरफाइरिडियम (लाल सूक्ष्म शैवाल) से प्राप्त एसपी (सल्फेट पॉलीसेकेराइड) की एंटीवायरल गतिविधि पर दुनिया भर में विभिन्न विश्लेषण रिपोर्ट से स्पष्ट है कि शैवाल कई वायरल रोगों के उपचार में एक महत्वपूर्ण कारक साबित हो सकता है।” विभिन्न जैवविज्ञानिक स्त्रोतों से प्राप्त कैरीगीनन की भूमिका कोरोना वायरल श्वांस संक्रमण के नियंत्रण में सराहनीय है।

नारियल का तेल करेगा कोरोना को फेल!

  • नारियल के तेल में पाया जाने वाला एक विशेष अम्ल कोरोना वायरस का खेल खत्म कर सकता है। अब तक अनेक घातक रोगाणुओं पर यह अम्ल अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ है। मेडिकल जगत में इसे लेकर मंथन हो रहा है। भारतीय वैज्ञानिक भी इसे लेकर सरकार सक्रिय हुए हैं।

पृष्ठभूमि

  • नारियल के तेल में पाये जाने वाले लॉरिक एसिड को मोनो लॉरिन में बदलकर यदि कोविड-19 पर प्रयोग करें तो यह इस वायरस के प्रोटीन निर्मित बाहरी आवरण को भेद कर इसे नष्ट कर सकता है। इसका प्रयोग अभी तक एचआइवी, रूबोला, इन्फ्लूएंजा, सारकोमा, हरपीज, निमोना, लिंफोटिक जैसे दुनिया के सबसे खतरनाक 14 रोगाणुओं पर सफल रूप से हो चुका है। जिन खतरनाक 14 वायरस पर मोनो लॉरिन का परीक्षण किया गया उनके बाहरी आवरण पूर्णत: नष्ट हो गए।
  • नारियल के तेल में लॉरिक एसिड के महत्व पर कई शोध हुए हैं। इसमें वायरस की मेंब्रेन ब्रेक (आवरण नष्ट) करने की क्षमता बताई गई है। साथ ही छोटे-छोटे वायरस को समूह बनाने से भी रोकने में यह मददगार बताया गया है। कोरोना वायरस का आवरण प्रोटीन, लिपिड और फैटी एसिड से निर्मित है, जो तैलीय होता है। इसे मोनो लॉरिन भेद सकता है। लैब परीक्षण कर कोविड-19 की दवा खोजने पर काम हो सकता है।
  • लॉरिक एसिड को मोनो लॉरिन में बदलने का काम केवल मनुष्य के लीवर में ही होता है, जबकि नारियल में 50 प्रतिशत तक लॉरिक एसिड पाया जाता है, जिसे मोनो लॉरिन में बदला जा सकता है।

कैसे कार्य करेगी?

  • कोविड-19 की संरचना को यदि ध्यान से देखें तो इसके कैप्सूल (खोल) के बाहर कई कांटे होते हैं, जिन्हें प्रोटीन स्पाइक्स कहते हैं। कोविड-19 के यही स्पाइक्स मानव के फेफड़ों पर जाकर धंस जाते हैं, जिससे यह घातक साबित होता है। मोनो लॉरिन वायरस के लिपिड बाइ लेयर (ऊपरी परत) में प्रविष्ट होकर आवरण का ही अंत कर देता है, जिन पर ये कांटेदार संरचनाएं बनी रहती हैं। बाहरी आवरण के नष्ट होने के बाद इसके भीतरी हिस्से में आरएनए (राइबो न्यूक्लिक एसिड) ही शेष रहता है, जिसे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता स्वत: ही खत्म कर सकती है। परीक्षण सफल होने पर मोनो लॉरिन के साथ हल्दी के करक्यूमिन को मिलाकर कैप्सूल के रूप में कोरोना को मात देने वाली दवा विकसित की जा सकेगी।

लॉरिक एसिड के स्रोत

  • नारियल के अलावा लॉरिक एसिड मां के दूध में भी काफी मात्रा में पाई जाती है, वहीं बकरी के दूध और पाम ऑयल में भी यह मिलता है। आयुष मंत्रालय से अनुमति मिलते ही इस कार्य को जल्द शुरू करेंगे।

कोराना को हराएगी बैक्टीरिया की दवा ‘टाइकोप्लेनिन’

  • बैक्टीरियल इंफेक्शन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक दवा ‘टाइकोप्लेनिन’ कोरोना के गंभीर मरीजों के इलाज में भी कारगर साबित हो सकती है। फ्रांस में हुए शोध के बाद लखनऊ के लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के फार्माको-अलर्ट में इस दवा को कोरोना पीड़ित मरीजों के लिए अल्टरनेटिव ड्रग के तौर पर शामिल किया गया है।
  • इंटरनेशनल जनरल ऑफ एंटीमाइक्रोबियल एजेंट्स में नौ मार्च को शोध प्रकाशित हुआ। इसमें फ्रांस के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने एंटीबायोटिक ‘टाइकोप्लेनिन’ दवा को कोविड-19 बीमारी के इलाज में कारगर बताया है। दावा किया गया कि शरीर को घातक संक्रमण से उबारने वाली इस दवा में वायरस को भी मात देने की ताकत है। खासकर, श्वसन तंत्र के संक्रमण को नेस्तनाबूत करने में यह काफी कारगर साबित हो सकती है।
  • फ्रांस के चिकित्सा वैज्ञानिकों के शोध के अनुसार ‘टाइकोप्लेनिन’ दवा सार्स कोव-टू वायरस के प्रोटीन खोल पर प्रहार करने में सक्षम है। दावा है कि यह दवा देने से वायरस की संरचना का निर्माण बाधित होगा। ऐसे में मरीज में वायरस का री-प्रोडेक्शन नहीं हो सकेगा। वहीं, कोरोना का वायरस भी पहले श्वसन तंत्र पर ही अटैक करता है। ऐसे में यह दवा अपर व लोअर रेस्पिरेटरी इंफेक्शन से मुक्त कराने में भी मददगार होगी।

अभी सात दवाएं, एक थेरेपी है विकल्प :

  • अभी कोरोना के मरीजों में अमूमन सात दवाएं और एक प्लाज्मा थेरेपी दी जाती है। इसमें एंटी मलेरिया की हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्विन, एचआइवी की लोपिनावीर एंड रिटोनावीर, एचसीवी की रिबाविरिन, वायरल इंफेक्शन की रेमडेसिविर, इंटरफेरॉन-1बी, इंटरल्यूकिन-6 इनहिबिटर्स व एजिथ्रोमाइसीन आवश्यकतानुसार मरीजों को दी जाती है।

कोविड-19 के लिए नवीन ब्लड प्लाज्मा थेरेपी की खोज

  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक राष्ट्रीय महत्व के संस्थान श्री चित्र तिरुनल इंस्टीच्यूट फार मेडिकल साईंसेज एंड टेक्नोलाजी (एससीटीआईएमएसटी) ने कोविड-19 रोग से ग्रसित मरीजों को नवोन्मेषी उपचार प्रदान करने के लिए एक निर्भीक कदम उठाने की स्वीकृति प्राप्त कर ली है। तकनीकी रूप से ‘ कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी‘  कहे जाने वाले इस उपचार का उद्वेश्य किसी बीमार व्यक्ति के उपचार के लिए ठीक हो चुके व्यक्ति द्वारा हासिल प्रतिरक्षी शक्ति का उपयोग करना है। भारत के शीर्ष प्राधिकारी निकाय भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एससीटीआईएमएसटी को यह नवीन उपचार करने के लिए मंजूरी दे दी है। एससीटीआईएमएसटी की निदेशक डा आशा किशोर ने कहा, ‘ हमने ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया (डीसीजीआई) को रक्तदान के नियमों में ढील की अनुमति के लिए एज कटआफ हेतु आवेदन किया है। ‘

क्या है कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी :

  • जब एक पैथोजेन की तरह का नोवेल कोरोना वायरस संक्रमित करता है तो हमारी प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज का उत्पादन करती है। पुलिस के कुत्तों की तरह एंटीबाडीज आक्रमणकारी वायरस की पहचान करते हैं और चिन्हित करते हैं। श्वेत रक्त कोशिकाएं पहचाने गए घुसपैठियों को संलगन करती हैं और शरीर संक्रमण से मुक्त हो जाता है। ब्लड ट्रांसफ्यूजन की तरह ही यह थेरेपी ठीक हो चुके व्यक्ति से एंटीबाडी को एकत्रित करती है और बीमार व्यक्ति में समावेशित कर देती है।

एंटीबाडीज क्या होते हैं?:

  • एंटीबाडीज किसी माइक्रोब द्वारा किसी संक्रमण की अग्रिम पंक्ति प्रतिरक्षी अनुक्रिया होते हैं। वे नोवेल कोरोना वायरस जैसे किसी आक्रमणकारी का सामना करते समय बी लिम्फोसाइट्स नामक प्रतिरक्षी कोशिकाओं द्वारा स्रावित विशेष प्रकार के प्रोटीन होते हैं। प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज की रूपरेखा तैयार करते हैं जो प्रत्येक आक्रमणकारी पैथोजेन के प्रति काफी विशिष्ट होते हैं। एक विशिष्ट एंटीबाडी और इसका साझीदार वायरस एक दूसरे के लिए बने होते हैं।

यह उपचार किस प्रकार दिया जाता है?:

  • जो व्यक्ति कोविड-19 की बीमारी से ठीक हो चुका है, उससे खून निकाला जाता है। वायरस को बेअसर करने वाले एंटीबाडीज के लिए सीरम को अलग किया जाता है और जांचा जाता है। कन्वलसेंट सीरम, जोकि किसी संक्रामक रोग से ठीक हो चुके व्यक्ति से प्राप्त ब्लड सीरम है और विशेष रूप से उस पैथोजेन के लिए एंटीबाडीज में समृद्ध है, को तब कोविड-19 के रोगी को दिया जाता है। रोगी निष्क्रिय प्रतिरक्षण प्राप्त कर लेता है। डा. किशोर ने इंडिया साईंस वायर से बातचीत करते हुए बताया कि ,‘ ब्लड सीरम निकालने और रोगी को दिए जाने से पहले संभावित डोनर की जांच की जाती है। पहली बात यह कि स्वाब टेस्ट निगेटिव होनी चाहिए और संभावित डोनर को स्वस्थ घोषित होना चाहिए। इसके बाद ठीक हो चुके व्यक्ति को दो सप्ताह तक इंतजार करना चाहिए। या फिर संभावित डोनर को कम से कम 28 दिनों तक अलक्षणी होना चाहिए। इनमें से दोनों ही अनिवार्य हैं। ‘

कौन यह उपचार प्राप्त करेगा?

  • डा. किशोर ने बताया कि, ‘ आरंभ में हम कुछ ही रोगियों पर इसका प्रयास करेंगे। वर्तमान में इसकी अनुमति केवल बुरी तरह से संक्रमित रोगियों के लिए सीमित उपयोग हेतु एक प्रायोगिक थेरेपी के रूप में दी गई है। ‘

यह टीकाकरण से अलग कैसे है?

  • यह  थेरेपी निष्क्रिय टीकाकरण के समान है। जब कोई टीका दिया जाता है तो प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज का निर्माण करती है। इस प्रकार, बाद में जब टीका प्राप्त कर चुका व्यक्ति उस पैथोजेन से संक्रमित हो जाता है तो प्रतिरक्षी प्रणाली एंटीबाडीज स्रावित करती है और संक्रमण को निष्प्रभावी बना देती है। टीकाकरण जीवन पर्यंत प्रतिरक्षण देता है। निष्क्रिय एंटीबाडी थेरेपी के मामले में, इसका प्रभाव तभी तक रहता है जब तक इंजेक्ट किए गए एंटीबाडीज खून की धारा में रहते हैं। दी गई सुरक्षा अस्थायी होती है। इससे पहले कि कोई शिशु अपना खुद का प्रतिरक्षण तैयार करे, माता अपने दूध के जरिये एंटीबाडीज अंतरित करती है।

इतिहास:

  • 1890 में, जर्मनी के फिजियोलाजिस्ट इमिल वान बेहरिंग ने खोज की थी कि डिपथिरिया से संक्रमित एक खरगोश से प्राप्त सीरम डिपथिरिया संक्रमण को रोकने में प्रभावी है। बेहरिंग को 1901 में दवा के लिए सर्वप्रथम नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस समय एंटीबाडीज ज्ञात नहीं था। कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी कम प्रभावी था और इसके काफी साइड इफेक्ट थे। एंटीबाडीज फ्रैक्शन को अलग करने में कई वर्ष लगे। फिर भी अलक्षित एंटीबाडीज और अशुद्धियों के कारण साइड इफेक्ट होते रहे।

क्या यह प्रभावी है ?

  • हमारे पास बैक्टिरियल संक्रमण के खिलाफ काफी एंटीबायोटिक्स हैं। तथापि, हमारे पास प्रभावी एंटीवायरल्स नहीं हैं। जब कभी कोई नया वायरल प्रकोप होता है तो इसके उपचार के लिए कोई दवा नहीं होती। इसलिए, कन्वलसेंट सीरम का उपयोग पिछले वायरल महामारियों के दौरान किया गया है। 2009-10 के एच1एन1 इंफ्लुएंजा वायरस महामारी के प्रकोप के दौरान इंटेसिंव केयर की आवश्यकता वाले संक्रमित रोगियों का उपयोग किया गया। निष्क्रिय एंटीबाडी उपचार के बाद, सीरम उपचारित रोगियों ने नैदानिक सुधार प्रदर्शित किया। वायरल को बोझ कम हुआ और मृत्यु दर में कमी किया जा सका। यह प्रक्रिया 2018 में इबोला प्रकोप के दौरान भी उपयोगी रही।

क्या यह सुरक्षित है ?

  • आधुनिक ब्लड बैंकिंग तकनीक जो रक्त जनित पैथोजीन की जांच करते हैं, मजबूत है। डोनर एवं प्राप्तकर्ता के खून के प्रकारों को मैच करना मुश्किल नहीं है। इसलिए, अनजाने में ज्ञात संक्रमित एजेंटों को ट्रांसफर करने या ट्रांसफ्यूजन रियेक्शन पैदा होने के जोखिम कम हैं। एससीटीआईएमएसटी की निदेशक डा आशा किशोर ने कहा, ‘जैसाकि हम रक्तदान के मामलों में करते हैं, हमें ब्लड ग्रुप एवं आरएच अनुकूलता का ध्यान रखना होता है। केवल वही लोग जिनका ब्लड ग्रुप मैच करता है, खून दे या ले सकते हैं। खून देने की अनुमति दिए जाने से पूर्व डोनर की सख्ती से जांच की जाएगी तथा कुछ विशेष अनिवार्य कारकों का परीक्षण किया जाएगा। उनकी हेपाटाइटिस, एचआईवी, मलेरिया आदि की जांच की जाएगी जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे रिसीवर को अलग पैथोजेन न हस्तांतरित कर दे। ‘

एंटीबाडीज प्राप्तकर्ता में कितने समय तक बना रहेगा ?

  • जब एंटीबाडी सीरम दिया जाता है तो तो यह प्राप्तकर्ता में कम से कम तीन से चार दिनों तक बना रहेगा। इस अवधि के दौरान बीमार व्यक्ति ठीक हो जाएगा। अमेरिका एवं चीन की अनुसंधान रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि ट्रांसफ्यूजन प्लाज्मा के लाभदायक प्रभाव पहले तीन से चार दिनों में प्राप्त होते हैं, बाद में नहीं।

चुनौतियां:

  • मुख्य रूप से जीवित बचे लोगों से प्लाज्मा की उल्लेखनीय मात्रा प्राप्त करने में कठिनाई के कारण यह थेरेपी उपयोग में लाये जाने के लिए सरल नहीं है। कोविड-19 जैसी बीमारियों में, जहां अधिकांश पीड़ित उम्रदराज हैं और हाइपरटेंशन, डायबिटीज और ऐसे अन्य रोगों से ग्रसित हैं, ठीक हो चुके सभी व्यक्ति स्वेच्छा से रक्त दान करने के लिए तैयार नहीं होंगे।

:: पर्यावरण और पारिस्थितिकी ::

ग्रेट बैरियर रीफ पर अस्तित्व का संकट

  • ऑस्ट्रेलियाई पारिस्थितिकी में अहम स्थान रखने वाले विश्व के सबसे बड़े प्रवाल भित्ति 'ग्रेट बैरियर रीफ' पर बढ़ते तापमान की वजह से अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। ग्लोबल वार्रि्मग के कारण यहां कोरल ब्लीचिंग की समस्या बढ़ती जा रही है। वैज्ञानिकों ने इसे दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। जब तापमान, प्रकाश या पोषण में किसी भी परिवर्तन के कारण प्रवालों पर तनाव बढ़ता है तो वे अपने ऊतकों में निवास करने वाले सहजीवी शैवाल को निष्कासित कर देते हैं जिस कारण रंग-बिरंगे प्रवाल सफेद रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। इस घटना को ही कोरल ब्लीचिंग या प्रवाल विरंजन कहते हैं।
  • ऑस्ट्रेलिया की जेम्स कुक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार, अब तक गंभीर ब्लीचिंग से बची प्रवाल भित्तियों की संख्या लगातार घटती जा रही है। बता दें कि ग्रेट बैरियर रीफ ऑस्ट्रेलिया के सुदूर उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है।
  • जेम्स कुक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टेरी ह्यूजेस ने कहा, 'मार्च के आखिरी दो सप्ताहों में हमने 1036 प्रवाल भित्तियों का सर्वेक्षण किया। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि बढ़ते तापमान ने प्रवालों का आकर्षण खत्म कर दिया है। यदि साल-दर-साल इसी प्रकार गर्मी बढ़ती रही तो इससे प्रवाल तो अस्तित्व के संकट से जूझेंगे ही साथ ही, जैव-विविधता को भी नुकसान पहुंचेगा।' उन्होंने कहा कि पहली बार ग्रेट बैरियर रीफ के सभी तीन क्षेत्रों - उत्तरी, मध्य और अब बड़े हिस्से पर गंभीर विरंजन (ब्लीचिंग) हुआ है।

थर्मल तनाव से होती है कोरल ब्लीचिंग

  • शोधकर्ताओं ने बताया कि कोरल ब्लीचिंग गर्मियों में समुद्र के तापमान में वृद्धि के कारण पैदा होने वाले थर्मल तनाव के कारण होती है। बढ़ते तापमान के कारण पिछले पांच वर्षो में 2300 किमी रीफ सिस्टम में तीसरी गंभीर ब्लीचिंग हुई है। पहली बार इसके बारे में वर्ष 1998 में पता चला था। रिकॉर्ड के बताते हैं कि यह साल सबसे गर्म रहा था।
  • कोरल ब्लीचिंग तब होती है जब समुद्र के तापमान में बदलाव के कारण स्वस्थ कोरल तनावग्रस्त हो जाते हैं और कोरल अपने एल्गी (शैवालों) निष्कासित करते हैं। ये शैवाल कोरल के ऊतकों में रहते हैं और इनके न रहने पर कोरल रंगहीन हो जाता है।

देश की अर्थव्यवस्था का आधार

  • बता दें कि ऑस्ट्रेलिया की पर्यटन अर्थव्यवस्था में ग्रेट बैरियर रीफ का योगदान अनुमानत: चार बिलियन डॉलर होता है, लेकिन यदि तापमान इसी प्रकार बढ़ता रहा तो हो सकता है कि ग्रेट बैरियर रीफ अपना विश्व विरासत का दर्जा खो सकता है।

:: विविध ::

टेड्रोस एडनम

  • चीन से दुनिया में फैले कोरोना पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और उसके प्रमुख पर चीन के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते रहे हैं। इसी बीच खुलासा हुआ है कि डब्ल्यूएचओ प्रमुख डॉ. टेड्रोस एडनम ने इथियोपिया का स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए 2006, 2009 और 2011 में कॉलरा महामारी का प्रकोप फैलने पर भी टेड्रोस ने इसे महामारी घोषित नहीं किया था। 2017 में प्रो. लैरी गॉस्टिन ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया था कि इथियोपिया में फैली कॉलरा को महामारी के रूप में दर्ज करने की जिम्मेदारी टेड्रॉस पर ही थी, लेकिन उन्होंने अपनी छवि बचाने के लिए ऐसा नहीं किया।

कौन है डाक्टर टेड्रोस एडनम

  • डॉ. टेड्रॉस एडनम इथियोपिया के नागरिक हैं और पेशे से माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मलेरिया के प्रसिद्ध शोधकर्ता हैं। 2017 से डब्ल्यूएचओ प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

:: प्रिलिम्स बूस्टर ::

  • चर्चा में रहे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पोर्टल ‘युक्ति’ का पूरा नाम क्या है?  (यंग इंडिया कॉमबैटिंग कोविड विथ नॉलेज, टेक्नालाजी एंड इनोवेशन)

  • हाल ही में चर्चा में रहे ‘बंग बंधु’ किस महापुरुष की उपाधि है?  (बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान)

  • चर्चा में रहे कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) किन कंपनियों पर लागू होता है? (1,000 करोड़ रुपये या इससे अधिक टर्नओवर/ 5,00 करोड़ रुपये या अधिक के नेटवर्थ/ 5 करोड़ रुपये या अधिक के शुद्ध लाभ वाली कंपनियों पर)

  • एचडीएफसी बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने वाली चीन की केंद्रीय बैंक का क्या नाम है? (पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना)

  • राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान-भारत(NIF) द्वारा प्रस्तुत ‘वर्मीवेट’ क्या है? (पशुओं में कृमि संक्रमण रोकने की स्वदेशी हर्बल दवा)

  • चर्चा में रहे ‘पनामा विल्ट-Panama wilt’ नामक फंगस किस फसल को नुकसान पहुंचाता है? (केले की फसल को)

  • ‘डिजिटल स्टेथोस्कोप-Digital stethoscope’ की विशेषता क्या है और यह क्या कार्य करता है है? (दूर से मनुष्यों की धड़कनों को सुनना और धड़कनों को रिकॉर्ड करना)

  • मेलाटोनिन हार्मोन(Melatonin Hormone) की उत्पत्ति किस अंग में होती है एवं इसका कार्य क्या है? (मस्तिष्क में, मनुष्य के सोने और जागने के क्रम को नियंत्रित करना)

  • जैविक आतंकवाद में जैविक हथियार के रूप में किन जैविक अवरूपों का इस्तेमाल किया जाता है? (घातक जीवाणु, विषाणु, कीटाणु व फफूंद और जैविक टॉक्सिन इत्यादि)

  • एंटीवायरल खूबियों से चर्चा में रहे ‘पोरफाइरिडियम’ क्या है? (लाल सूक्ष्म शैवाल)

  • चर्चा में रहे ‘लॉरिक एसिड-Lauric acid ’ के प्रमुख स्रोत कौन है? (नारियल, मां का दूध, बकरी के दूध और पाम आयल)

  • हाल ही में  कोविड-19 के इलाज में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा स्वीकृत किए गए प्लाजमा थेरेपी का तकनीकी नाम क्या है? (कन्वलसेंट-प्लाज्मा थेरेपी- Convalescent Plasma Therapy)

  • हाल ही में चर्चा में रहे प्रवाल भित्तियाँ के कितने प्रकार होते हैं? (तटीय या झालरदार, अवरोधक तथा एटॉल)

  • चर्चा में रहे विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस एडनम किस देश के नागरिक हैं एवं किस क्षेत्र में इन्हें ख्याति प्राप्त है? (इथोपिया, माइक्रोबायोलॉजिस्ट- मलेरिया पर शोध में ख्याति)

 

 

 

स्रोत साभार: Dainik Jagran (Rashtriya Sanskaran), Dainik Bhaskar (Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara (Rashtriya Sanskaran) Hindustan Dainik (Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times (Hindi & English), PTI, PIB

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