(Important Day महत्वपूर्ण दिवस) 22 मई (22nd May)- अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (International Day for Biological Diversity)


(Important Day महत्वपूर्ण दिवस) 22 मई (22nd May)- अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (International Day for Biological Diversity)


प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जैव विविधता के मुद्दों के बारे में लोगों की समझ और जागरूकता विकसित करने के लिए 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस(International Day for Biological Diversity) मनाया जाता है। वर्ष 2020 के जैव विविधता दिवस की थीम ‘Our solutions are in nature’ है।

इस वर्ष जैव विविधता के लोगो में 4 चित्रों का मतलब

  • पहले चित्र में एक लड़की और फूल बना हुआ है। लड़की से आशय मनुष्य के पर्यावरणीय दायित्व और सामाजिक दायित्व से पर्यावरण से होने वाले परिवर्तन है वही फूल से आशय जैव विविधता के सतत सदुपयोग से है जो हम जैव विविधता से प्राप्त करते हैं।
  • दूसरे चित्र में एक मधुमक्खी और वृक्ष है। यहां पर मधुमक्खी का एक परागकर्ता के रूप में इसके महत्व को दर्शाता है वही दूसरी ओर वृक्ष इस पारिस्थितिकी तंत्र में दी जा रही अपनी विभिन्न सेवाओं जैसे फल और अन्य उत्पाद के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाएं, को प्रदर्शित करता है।
  • तीसरे चित्र में ‘गूज-Goose’ पक्षी को दिखाया गया है जो माइग्रेटरी बर्ड समेत अन्य माइग्रेटरी स्पीशीज, जो कि जल और स्थल में प्रवास करते हैं, इस महत्व को दर्शाता है कि इनका भौगोलिक क्षेत्र और आवास देश की सीमाओं से परे होता है।
  • चौथे चित्र में ध्रुवीय भालू को दिखाया गया है जो एक ऐसे प्रजाति जलवायु परिवर्तन और आवास विखंडन का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधित्व करता है।

वर्ष 2020 को जैव विविधता के लिए क्यों सर्वश्रेष्ठ वर्ष माना जा रहा है?

  • संयुक्त राष्ट्र अध्यक्ष के द्वारा न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र असेंबली में 22-23 सितंबर को एक बैठक का आयोजन किया जाएगा जिसकी थीम है “ सतत विकास के लिए जैव विविधता पर तुरंत कार्रवाई”।
  • 2020 के जैव विविधता कन्वेंशन में जैव विविधता के संदर्भ में वर्ष 2020 से आगे वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क को स्वीकार करेगा जो 2050 के विजन “"Living in harmony with nature" के अनुरूप होगा। इसमें कुल 196 पार्टी के द्वारा नए नियमों के लिए बातचीत प्रारंभ करेंगें जो जैव विविधता के लिए नए नियम बनाएगा।

जैव विविधता क्या है?

  • जैव विविधता से आशय जीवो के मध्य पाई जाने वाली विविधता है जो विभिन्न प्रजातियों के मध्य, प्रजातियों के भीतर एवं पारितंत्र की विविधता को शामिल करते हैं। सर्वप्रथम वाल्टर जी. रासन के द्वारा जैव विविधता शब्द का सबसे पहले प्रयोग किया गया। प्रायः जैव विविधता को तीन भागों में बांटा जाता है-
  1. अनुवांशिक जैव-विविधता: एक ही प्रजाति में पायी जाने वाली एक ही जाति के मध्य विभिन्नता। उदाहरण के लिए एशियाई हाथी और अफ्रीकन हाथी
  2. प्रजातीय जैव-विविधता: प्रजातियों के मध्य पायी जाने वाली विविधता को प्रजातीय जैव-विविधता कहा जाता है। जैसे चारों ओर वृक्षों, पौधों, झाड़ियों और विविध प्रकार के जीव जंतुओं का पाया जाना।
  3. पारिस्थितिकी जैव-विविधता: विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न प्रकार के जीवों की उपलब्धता ही पारिस्थितिकी जैव-विविधता कहलाती है। उदाहरण राजस्थान में ऊँट की अधिकता।

जैव विविधता का महत्व:

जैव विविधता ना केवल पृथ्वी के अस्तित्व के लिए आवश्यक है बल्कि यह मानव के लिए कई सारी गुणवत्तापूर्ण सेवाएं भी उपलब्ध करवाता है। संक्षेप में इसके महत्व को हम निम्न तरीके से समझ सकते हैं-

  • जैव विविधता से हमें विभिन्न प्रकार के उत्पाद प्राप्त होते हैं उदाहरण के लिए भोजन, औषधि, लकड़ी, ईंधन, चारा इत्यादि
  • जैव विविधता कृषि उत्पादन को बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें रूप प्रतिरक्षी भी बनाता है
  • जैव विविधता के विभिन्न घटक पृथ्वी पर पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करते हैं इसके साथ ही वह संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।उदाहरण के लिए वायु प्रदूषण, मृदा संरक्षण, जल संरक्षण
  • जैव विविधता कार्बन डाइऑक्साइड समेत हरित गैसों के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है
  • जैव विविधता पृथ्वी पर एक संतुलन बनाए रखती है उदाहरण के लिए खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल के द्वारा पारिस्थितिकी विविधता के साथ-साथ पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखती है
  • आपदा के समय जय विविधता एक अवरोधक का काम करती है उदाहरण के लिए मैंग्रोव वन
  • जैव विविधता सांस्कृतिक और नैसर्गिक लाभ प्रदान करती है

जैव विविधता के क्षरण के कारण

मनुष्य के द्वारा विभिन्न प्रकार की गतिविधियों के द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र में हस्तक्षेप करने से जैव विविधता में लगातार क्षरण हो रहा है जिसे निम्न तरीके से समझा जा सकता है

  • आवास का नष्ट होना: बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप मनुष्य की आवश्यकता के लिए स्थलीय एवं जलीय क्षेत्रों के लगातार अतिक्रमण से इन पर आश्रित जीव जंतु के आवास लगातार नष्ट होते जा रहे हैं।
  • आवास का विखंडन: लगातार जंगलों और अन्य क्षेत्रों के अतिक्रमण से वन्यजीवों के आवास का विखंडन
  • कीटनाशक और रसायनों का अत्यधिक प्रयोग: कृषि एवं अन्य क्षेत्रों में प्रयुक्त रसायनों,प्लास्टिक इत्यादि के कारण जलीय एवं स्थलीय जीव जंतु समेत जैव विविधता पर व्यापक प्रभाव
  • प्रदूषण: अत्यधिक प्रदूषण (जल,वायु और मृदा) के कारण कई सारी प्रजातियां के अस्तित्व पर संकट आ गया है।
  • पारिस्थितिकी सेवाओं का अत्यधिक दोहन: अत्यधिक चराई, व्यापक मात्रा में शिकार, मत्स्यन वनोन्मूलन इत्यादि से जैव विविधता के अस्तित्व पर संकट
  • विदेशी प्रजातियों एवं परभक्षी प्रजातियों का प्रवेश: इनके कारण से स्थानीय जैव विविधता को काफी नुकसान होता है
  • अंधाधुंध वनोन्मूलन: जंगल जैव विविधता को बनाए रखने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन इनके अंधाधुंध कटाई से संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रही है
  • प्राकृतिक आपदाएं: कभी-कभी प्राकृतिक आपदाएं जैव विविधता को व्यापक रूप से क्षति पहुंचाते हैं। उदाहरण के लिए अमेज़न और ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग

जैव विविधता का संरक्षण:

पर्यावरणीय चिंतन की ओर मनुष्य का ध्यान होने पर जैव विविधता की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन यह अभी भी यह सीमित ही है। जैव विविधता के संरक्षण के लिए सबसे पहले जैव विविधता की क्षति का आकलन किया जाता है। उदाहरण के लिए IUCN की लाल सूची (Red List) विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रहे प्रजातियों की एक सूची है। IUCN के अनुसार विभिन्न प्रकार की प्रजातियों को उन पर आसन्न संकट या उनकी उपलब्धता के आधार पर श्रेणियाँ बनाई गयी जो निम्न प्रकार से हैं :

  1. विलुप्त
  2. जंगल में विलुप्त
  3. गंभीर खतरे में
  4. खतरे में
  5. सुभेद्य
  6. खतरे के पास
  7. कम संबंधित
  8. कम आंकड़ा
  9. अमूल्यांकित

जैव विविधता के संरक्षण के लिए प्राय: दो विधियां प्रयोग में ली जाती है

  1. स्वस्थाने संरक्षण (in situ conservation): संरक्षण की विधा में जीवों का उनके प्राकृतिक आवास में ही अनुकूल परिस्थितियां व सुरक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। संरक्षण की इस विधि के तहत राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण, जीवमंडल रिजर्व आदि की स्थापना की जाती है।
  2. बहिस्थाने संरक्षण (Ex situ conservation)- संरक्षण की इस विधा में किसी संकटग्रस्त पादप या जंतु प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर कृत्रिम आवास में संरक्षण प्रदान किया जाता है। इसमें वानस्पतिक उद्यान, बीज बैंक, उत्तक संवर्धन, चिड़ियाघर, एक्वेरियम इत्यादि को रखा जाता है।

जैव विविधता संरक्षण के महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय प्रयास

  1. अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (IUCN)-प्रकृति के संरक्षण में स्थापित यह प्रथम पर्यावरणीय संस्था है।इसकी स्थापना 1948 में की गई। यह विभिन्न पादप एवं प्राणी प्रजातियों का अध्ययन कर 1972 में एक पुस्तक रेड डाटा बुक प्रकाशित करता है।
  2. जैव-विविधता अभिसमय (CBD) -1992 में रियो डी जनेरियो में आयोजित हुए पृथ्वी दिवस में इस कन्वेंशन को अपनाया गया। अब तक सीबीडी ने जैव विविधता से संबंधित निम्न महत्वपूर्ण प्रोटोकॉल एवं को मंजूरी दी है
  1. कार्टाजेना जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल - यह सजीव संवर्द्धित जीवों(LMO) के सुरक्षित उपयोग, स्थानांतरण और हैंडलिंग से संबंधित है।
  2. नगोया प्रोटोकॉल - नागोया प्रोटोकॉल अनुवांशिक संसाधनों की पहुंच व लाभ साझेदारी से संबंधित है।
  3. आईची लक्ष्य - इसका संबंध जैव विविधता पर दबाव को कम करते हुए इसके लाभों को सभी में बढ़ाने से है। नागोया सम्मेलन के दौरान वर्ष 2011-2020 के लिए जैव विविधता कार्ययोजना स्वीकार किया गया था जिसमें नागोया प्रोटोकॉल के अलावा आईची लक्ष्य भी शामिल है।

इसके अलावा कई अन्य संस्थाओं के माध्यम से भी जैव विविधता संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया जा रहा है उदाहरण के लिए आद्र भूमि संरक्षण, मरुस्थलीकरण पर कन्वेंशन, कन्वेंशन ऑन माइग्रेटरी स्पीशीज इत्यादि।

भारत में जैव विविधता संरक्षण के महत्वपूर्ण प्रयास

भारत जैव विविधता सम्मेलन (सीबीडी) 1992 का हिस्सा है, जिसने राज्यों को उनके जैविक संसाधनों के उपयोग और संप्रभुता के अधिकार को मान्यता दी है। सीबीडी के उद्देश्यों को मजबूत बनाने तथा उसकी मदद के लिए भारत सरकार ने एक अधिनियम बनाया है, जिसे जैव विविधता कानून 2002 नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य जैविक संसाधनों का संरक्षण तथा उससे जुड़े ज्ञान का सही उपयोग करना है। इसी अधिनियम के अंतर्गत वर्ष 2003 में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की स्थापना भी की गई थी जिसका मुख्यालय चेन्नई में है। यह कानून वनस्पतियों एवं पशुवर्ग के संरक्षण के मौजूदा कानूनों भारतीय वन अधिनियम, 1927, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, तथा वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 को बढ़ाने में कारगर है।इसके साथ ही भारत द्वारा आर्द्रभूमि संरक्षण, प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट हाथी, प्रोजेक्ट घड़ियाल जैसे कई और महत्वपूर्ण कदम लिए गए है ।

जैविक विविधता अधिनियम 2002 में प्रमुख रूप से आनुवांशिक संसाधनों तथा उससे जुड़े किसी विदेशी के ज्ञान एवं जानकारियों, कंपनी अथवा संस्थानों से पहले, इससे जुड़ी सभी जानकारियां तथा स्रोत न्याय संगत रूप से देश एवं उसके नागरिकों के लिए उपयोग किए जाने का प्रावधान करता है। इस अधिनियम से पहले किसी भी विधान में इसका प्रावधान नहीं था।

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