(Important Day महत्वपूर्ण दिवस) 20 फरवरी (20th February) : विश्व सामाजिक न्याय दिवस (World Day of Social Justice - WDSJ)


(Important Day महत्वपूर्ण दिवस) 20 फरवरी (20th February) : विश्व सामाजिक न्याय दिवस (World Day of Social Justice - WDSJ)


  • प्रत्येक वर्ष 20 फरवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस (World Day of Social Justice-WDSJ) मनाया जाता है। WDSJ मनाने का प्रमुख उद्देश्य गरीबी उन्मूलन, पूर्ण रोजगार और समुचित कार्य को बढ़ावा देना, लैंगिक समानता स्थापित करना, सामाजिक कल्याण तक पहुंच और सभी के लिए न्याय के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों को बढ़ावा देना है।
  • यह दिवस गरीबी, बहिष्कार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से निपटने के प्रयासों को बढ़ावा देने की आवश्यकता को मान्यता देने का दिन होता है।
  • इस वर्ष की थीम “A Call for Social Justice in the Digital Economy”(अ काल फॉर सोशल जस्टिस इन द डिजिटल इकोनॉमी) है।

विश्व सामाजिक न्याय दिवस की पृष्ठभूमि

  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा पुरे विश्व हेतु एक निष्पक्ष वैश्वीकरण हेतु सर्वसम्मति से 10 जून 2008 को सामाजिक न्याय पर ILO के घोषणा पत्र को अपनाया गया। 1919 से अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के द्वारा अपनाए गए यह प्रमुख 3 घोषणा पत्र सिद्धांतों में से एक था। अन्य दो प्रमुख अपनाए गए महत्वपूर्ण सिद्धांतों में 1944 का फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र और 1998 के ‘कार्य में मौलिक सिद्धांतों और अधिकारों की घोषणा’ था। 2008 की घोषणा वैश्वीकरण के युग में ILO के जनादेश की समकालीन दृष्टि को अभिव्यक्त करती है।
  • यह घोषणा पत्र वैश्वीकरण के संदर्भ में पुरे विश्व में बेहतर और निष्पक्ष परिणामों को प्राप्त करने की दिशा में एक मजबूत सामाजिक आयाम की आवश्यकता पर व्यापक सहमति को दर्शाता है।
  • वैश्वीकरण के कारण व्यापार, निवेश और पूंजी प्रवाह, प्रौद्योगिकी में प्रगति के माध्यम से नए अवसर, सूचना प्रौद्योगिकी सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास के साथ-साथ जीवन स्तर के सुधार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि इसके नकारात्मक प्रभाव गंभीर वित्तीय संकट, असुरक्षा, गरीबी, बहिष्कार, समाजों के बीच असमानता, विकासशील देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकरण और पूर्ण भागीदारी में व्याप्त बाधाएं, इत्यादि के रूप में परिलक्षित हुई हैं।
  • इसके उपरान्त सामाजिक विकास के लिए विश्व सम्मेलन के उद्देश्यों और लक्ष्यों के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र आम सभा में प्रतिवर्ष 20, फरवरी को WDSJ के तौर पर मनाये जाने का फैसला किया गया था। संयुक्त राष्ट्र ने 26 नवम्बर, 2007 को इस निर्णय को मंजूरी दे दी और 2009 से यह दिवस मनाया जाने लगा।

क्यों रखी गयी इस वर्ष की थीम “A Call for Social Justice in the Digital Economy”?

  • पिछले एक दशक में, ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा के विस्तार ने डिजिटल प्लेटफार्मों इत्यादि के साथ डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हुए पूरे कार्य संस्कृति को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। कोविड-19 महामारी के दौरान ‘वर्क फ्रॉम होम’ कार्य संस्कृति की अवधारणा ने व्यवसायिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के साथ डिजिटल अर्थव्यवस्था के विकास को काफी तेजी से बढ़ाया है। इसके कारण जहां एक ओर डिजिटल डिवाइड के रूप में विकसित और विकासशील देशों के बीच व्याप्त असमानताओं को कम किया है तो वहीं दूसरी ओर इसने असमानताओं को और बढ़ा दिया है।
  • डिजिटल लेबर प्लेटफार्म जहां कामगारों (महिलाओं, विकलांग व्यक्ति,प्रवासी मजदूर इत्यादि) को आय सृजन के साथ-साथ लचीली कार्य व्यवस्था प्रदान करते हैं तो वहीं दूसरी ओर यह कई चुनौतियां भी प्रस्तुत करते हैं। यह चुनौतियां मुख्य रूप से काम और आय की अनियमितता, उचित कामकाजी परिस्थितियां का अभाव, सामाजिक सुरक्षा के अभाव और जीवन स्तर के अपर्याप्त मानक, कौशल उपयोग और व्यापार संघ बनाने या शामिल होने के अधिकार से संबंधित हैं। इसके साथ ही एल्गोरिथम मॉनिटरिंग प्रैक्टिस इत्यादि जैसे कुछ मामलों में कार्यस्थल की निगरानी में वृद्धि भी एक बढ़ती हुए चिंता का विषय है। COVID-19 महामारी की चुनौती किसी स्थान विशेष पर कार्यरत श्रमिकों के जोखिम और असमानताओं को उजागर कर रहे हैं। इसके साथ ही यह पारंपरिक व्यवसायों को भी कई चुनौतियां प्रदान कर रहे हैं जिनमें अनुचित प्रतिस्पर्धा, कराधान एवं उनकी विशिष्ट प्रकृति इत्यादि शामिल है। पारंपरिक व्यवसायों विशेषकर छोटे और मध्यम उद्यमों के वर्तमान एवं भावी परिवर्तनों की दिशा में डिजिटल रूपांतरण हेतु महत्वपूर्ण चुनौतियों में डिजिटल बुनियादी ढांचे एवं वित्त की अनुपलब्धता शामिल है।
  • विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए डिजिटल बुनियादी ढांचे की अपर्याप्त उपलब्धता की दिशा में व्यापक रूप से रूपांतरण की आवश्यकता है। यद्यपि कई देशों में डिजिटल श्रम प्लेटफार्म पर काम करने वाले लोगों की स्थिति में सुधार हेतु कुछ विशेष मुद्दों को संबोधित करना प्रारंभ कर दिया है। हालांकि इस दिशा में व्यापक प्रगति के लिए अंतरराष्ट्रीय समन्वय की आवश्यकता है क्योंकि डिजिटल प्लेटफॉर्म कई सारे विविध न्यायिक- क्षेत्राधिकार के अधीन काम करते हैं। डिजिटल श्रम प्लेटफॉर्म के मुद्दों को संबोधित करने हेतु राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहु-हितधारक नीतिगत संवाद और समन्वय को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है। इससे विभिन्न देशों और विभिन्न कंपनियों की विविधता को देखते हुए नियामक निश्चितता और सार्वभौमिक श्रम मानकों की प्रयोज्यता/उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी।
  • इस वर्ष की यह थीम अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा सतत विकास, गरीबी उन्मूलन, पूर्ण रोजगार और उचित रोजगार को बढ़ावा देने, सार्वभौमिक सामाजिक संरक्षण, लैंगिक समानता और सभी के लिए सामाजिक कल्याण और न्याय तक पहुंच के समाधान की खोज के प्रयासों का समर्थन करता है। इस थीम का उद्देश्य डिजिटल डिवाइड को दूर करने के लिए सदस्य देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र के संस्थानों और अन्य हितधारकों के संवाद को बढ़ावा देना है जिससे डिजिटल प्रौद्योगिकियों के आधुनिक युग में उचित काम के अवसर प्रदान करते हुए श्रम और मानव अधिकारों की रक्षा करना है।

संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य 8 (Decent work and economic growth) से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

  • वर्ष 2000 से 2007 के बीच जहां रोजगार में हो वैश्विक वृद्धि 0.9% थी वही 2008 के बाद से रोजगार में वृद्धि केवल 0.1% प्रतिवर्ष है।
  • सभी कामगारों में से 60 प्रतिशत से अधिक कामगारों के पास किसी भी तरह का रोजगार अनुबंध नहीं है।
  • पूर्णकालिक या स्थायी आधार पर नियुक्त वेतनभोगी कामगार की संख्या मात्र 45% से भी कम है एवं उनके भाग में भी निरंतर कमी आ रही है।
  • 45 प्रतिशत से कम वेतन और वेतनभोगी श्रमिकों को पूर्णकालिक, स्थायी आधार पर नियुक्त किया जाता है, और यहां तक कि शेयर में भी गिरावट आ रही है।
  • 2019 में 212 मिलियन से अधिक लोग काम से बाहर या बेरोजगार थे जबकि वर्ष 2018 में यह आंकड़ा 201 मिलियन था।
  • कार्यशील जनसंख्या की वृद्धि के साथ सामंजस्य बनाने के लिए 2030 तक 600 मिलियन नए रोजगार सृजित करने की आवश्यकता है।

आपको बता दें भारत में सामाजिक न्याय की दिशा में निर्देश भारतीय संविधान में ही मिलते हैं। सर्वप्रथम हमें संविधान की प्रस्तावना में ही सामाजिक न्याय के तत्व दिख जाते हैं-

समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय……….. प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्रदान करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प हो कर…..

इसके अलावा सामाजिक न्याय कुछ महत्वपूर्ण अनुच्छेदों में स्पष्ट रूप से शामिल है-

अनुच्छेद 23: (1)मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात्‌श्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है और इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा। (2) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा अधिरोपित करने से निवारित नहीं करेगी। ऐसी सेवा अधिरोपित करने में राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।

अनुच्छेद 24: चौदह वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य परिसंकटमय नियोजन में नहीं लगाया जाएगा।

अनुच्छेद 38: कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा, जिससे नागरिक को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय मिलेगा.

अनुच्छेद 39: राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा जिसमें यह सुनिश्चित हो -

  1. सभी नागरिकों (पुरुष और स्त्री) को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो;
  2. समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और प्रबंधन इस प्रकार हो जिससे यह सामूहिक हित का सर्वोत्तम साधन हो;
  3. आर्थिक व्यवस्था का प्रबंधन ऐसा हो जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संक्रेंद्रण न हो;
  4. पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन हो;
  5. पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हों;
  6. बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और आवश्यक सुविधाएँ दी जाएँ, बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।

अनुच्छे 39क: समान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता

अनुच्छेद 46: राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उसकी संरक्षा करेगा।

इसके अलावा भारत सरकार के द्वारा भी सामाजिक न्याय की दिशा में स्वतंत्रता उपरांत से ही काफी कदम उठाए गए हैं। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय देश में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का उद्देश्य एक ऐसे समावेशी समाज की स्थापना करना है जिसके अंतर्गत लक्षित समूह के सदस्यगण अपने विकास और वृद्धि के लिए उपयुक्त समर्थन प्राप्त करके अपने लिए उपयोगी, सुरक्षित और प्रतिष्ठित जीवन की प्राप्ति कर सकते हैं। इसका लक्ष्य, आवश्यक जगहों पर लक्षित समूहों को शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक विकास और पुनर्वास कार्यक्रमों के माध्यम से समर्थन प्रदान करना और उनका सशक्तिकरण करना है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग को समाज में सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से किनारे कर दिए गए वर्ग के लोगों का सशक्तिकरण करने का अधिकार प्राप्त है जिसमें (i) अनुसूचित जाति (ii) अन्य पिछड़ा वर्ग (iii) वरिष्ठ नागरिक (iv) शराब और मादक पदार्थ के दुरुपयोग के शिकार लोग (v) ट्रांसजेंडर व्यक्ति (vi) भिखारी (vii) विमुक्त और खानाबदोश जनजाति (डीएनटी) और (viii) आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के लोग शामिल है।