(Important Day महत्वपूर्ण दिवस) 10 फरवरी (10th February) : विश्व दलहन दिवस (World Pulses Day)


(Important Day महत्वपूर्ण दिवस) 10 फरवरी (10th February) : विश्व दलहन दिवस (World Pulses Day)


  • प्रत्येक वर्ष 10 फरवरी ‘विश्व दलहन दिवस’ मनाया जाता है।
  • आपको बता दें वर्ष 2016 को ‘अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष’ घोषित किया गया था। इसके तहत कृषि एवं खाद्य संगठन के द्वारा दालों के महत्व को बताने दलहन उत्पादन एवं खाद्य सुरक्षा और पोषण की दिशा में योगदान को विश्व में एक अभियान के रूप में चलाया गया। बाद में इस अभियान की सफलता और एसडीजी 1, 2, 3, 5, 8, 12, 13 एवं 15 के लक्ष्यों को 2030 तक प्राप्ति हेतु दलहन की अनिवार्यता को स्वीकार किया गया। इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा 2019 में प्रति वर्ष 10 फरवरी को ‘विश्व दलहन दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया ।

दलहन (दाल) क्या हैं?

  • दलहन को फलियों के नाम से भी जाना जाता है। यह सुपाच्य एवं खाने योग्य पौधों के बीज होते हैं। बींस, दाल और मटर अत्यधिक प्रचलन में उपभोग की जाने वाली दलहन है। दाल प्रोटीन, विटामिन और खनिज के साथ-साथ आयरन, फोलेट, ज़िंक, मैग्नीशियम का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।कुछ महत्वपूर्ण दालों के उदाहरण हैं अरहर, मूँग, उड़द, चना, मसूर, खेसारी इत्यादि।
  • दलहनी फसलों में उन फसलों को शामिल नहीं किया जाता जिन्हें हरी फसलों के रूप में काटा जाता है। उदाहरण के लिए हरी मटर, हरी फलियों को दलहन में शामिल न करके वनस्पति फसलों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इसके अलावा दलहनी फसलों में उन फसलों को भी शामिल नहीं किया जाता जिनसे खाद्य तेल प्राप्त किया जाता है उदाहरण के लिए सोयाबीन और मूंगफली। इसके साथ ही दलहनी फसलों में उन फसलों को भी शामिल नहीं किया जाता जिनको बुवाई के उद्देश्य उगाया जाता है, उदाहरण के लिए क्लोवर और अल्फाल्फा।

दलहन फसलें महत्वपूर्ण क्यों हैं?

  • दलहन फसल अपने उच्च पोषण स्तर, खाद्य सुरक्षा एवं पर्यावरणीय लाभ के लिए जानी जाती हैं। इसे निम्न तरीके से समझा जा सकता है
  1. उच्च पोषणीय तत्व: दलहन में पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में होता है एवं यह प्रोटीन के समृद्ध स्रोत होते हैं। जिन स्थानों में मांस और दुग्ध भौतिकी एवं आर्थिक कारणों से सुलभ नहीं होते वहां पर प्रोटीन के आदर्श स्रोत के रूप में दलहन का महत्व बढ़ जाता हैं। दालों में अल्प बसा एवं घुलनशील फाइबर की अत्यधिक मात्रा होने के कारण यह कोलोस्ट्राल को कम करके रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है। इन गुणों के कारण मधुमेह और हृदय रोग जैसे गैर संचारी रोगों में स्वास्थ्य संगठनों के द्वारा दलहन के उपयोग की सिफारिश की जाती है। दलहन से मोटापे को नियंत्रण करने में भी मदद मिलती है।
  2. खाद्य सुरक्षा:किसानों के लिए दलहन एक महत्वपूर्ण फसल होती है क्योंकि वह इससे मौद्रिक आय के साथ-साथ इसका उपयोग भी कर सकते हैं। इससे यह किसानों को स्थिरता के साथ साथ खाद्य सुरक्षा बनाए रखने में भी मदद करता है।
  3. पर्यावरणीय लाभ : दलहन फसलों का एक विशेष गुण है नाइट्रोजन -फिक्सिंग। इससे ना केवल उर्वरता में सुधार होता है बल्कि खेत में उत्पादकता के स्तर को भी बढ़ाता है। कृषि में दलहनी फसलों का प्रयोग इंटरक्रॉपिंग करने के लिए किया जाता है जिससे खेत और मिट्टी की जैव विविधता बढ़ती है साथ ही साथ हानिकारक कीट और कृषि रोगों पर भी नियंत्रण स्थापित होता है।
  • इन सबके अलावा दलहन फसलें कृत्रिम रूप से नाइट्रोजन को मिट्टी में मिलाने की अनिवार्यता को नियंत्रित कर कृत्रिम उर्वरकों पर निर्भरता को कम कम करता है। इस प्रकार यह जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण लगाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है क्योंकि इन कृतिम उर्वरकों के उत्पादन में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जो पर्यावरण को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं।

दलहन क्षेत्र के विकास हेतु समर्पित कुछ संस्थान के बारे में

  • ग्लोबल पल्स कन्फेडरेशन: फ्रांस में 1963 में स्थापित ग्लोबल पल्स कन्फेडरेशन (जीपीसी) का मुख्यालय 2009 से दुबई में है। यह दालों के उत्पादन, उपभोग, जागरूकता और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो दाल का उत्पादन, उपभोग बढ़ाने, आपूर्ति संबंधी हर घटक जैसे उत्पादकों, व्यापारियों, सरकारी निकायों, व्यापार संवर्धन संस्थाओं, प्रोसेसर और उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह 50 से अधिक देशों में दालों के व्यापार में लगे 26 राष्ट्रीय संघों और हजारों कॉरपोरेट्स का परिसंघ है।
  • खाद्य और कृषि संगठन: यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष विशेष एजेंसी है जिसका उद्देश्य सबके लिए खाद्य सुरक्षा हासिल करना है। दुसरे शब्दों में FAO को यह सुनिश्चित करना कि लोगों को पर्याप्‍त मात्रा में ऊंची गुणवत्‍ता वाला भोजन नियमित रूप से सुलभ हो ताकि वे सक्रिय और स्‍वस्‍थ रहें। खाद्य एवं कृषि संगठन का कार्य वश्विक पोषण स्‍तर को उठाना, ग्रामीण जनसंख्‍या का जीवन बेहतर करना और विश्‍व अर्थव्‍यवस्‍था की वृद्धि में योगदान करना है। इस संगठन की स्थापना वर्ष 1945 में हुई थी एवं इसका मुख्यालय रोम, इटली में स्थित है।
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद: कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के तहत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एक स्वायत्तशासी संस्था है। 1929 को स्थापित इस संस्था का पहले नाम इंपीरियल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का मुख्यालय नई दिल्ली स्थित है। भारत वर्ष में बागवानी, मात्स्यिकी और पशु विज्ञान सहित कृषि के क्षेत्र में समन्वयन, मार्गदर्शन और अनुसंधान प्रबन्धन एवं शिक्षा के लिए परिषद सर्वोच्च निकाय है। देश भर में फैले 101 भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थानों और 71 कृषि विश्वविद्यालयों सहित यह विश्व में सर्वाधिक विस्तृत राष्ट्रीय कृषि पद्धति है।
  • भारतीय दलहन अनुसंधान: यह संस्थान दलहनी फसलों पर शोध का एक शीर्ष संस्थान है । इसकी स्थापना भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा प्रमुख दलहनी फसलों पर मूलभूत, रणनीतिक एवं प्रयुक्त शोध के लिए एक अग्रणी संस्थान के रूप में की गयी है । संस्थान के क्रिया-कलापों में आधारभूत सूचनाओं का सृजन, उन्नतशील प्रजातियो का विकास, प्रभावी फसल प्रणाली तथा उपयुक्त फसल उत्पादन एवं संरक्षण तकनीकी का विकास, जनक बीज उत्पादन और उन्नत तकनीकी का प्रदर्शन एवं हस्तांतरण सम्मिलित हैं । यह संस्थान कानपुर, उत्तर प्रदेश में स्थित है।

भारत सरकार के द्वारा दलहन क्षेत्र के विकास हेतु महत्वपूर्ण नीतियां

  • राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना (एनपीडीपी)
  • दलहन सीड-हब
  • 'तिलहन, दलहन, आयल पाम और मक्का फसलों समन्वित कार्यक्रम' (आईएसओपीओएम)
  • ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा)
  • दलहन और तिलहन के लिए मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस)