(राष्ट्रीय मुद्दे) एक देश एक चुनाव (One Nation, One Election)


(राष्ट्रीय मुद्दे) एक देश एक चुनाव (One Nation, One Election)


सन्दर्भ:

मौजूदा समय में ‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर बहस का मुद्दा जोरों पर है। कुछ राजनीतिक दल इसके पक्ष में नजर आते हैं तो कुछ विरोध् में और कुछ ने अभी इस पर अपनी राय जाहिर नही की है। हाल ही में चुनाव आयोग ने यह कहकर इस मामले को और तूल दे दिया है कि इस साल के सितम्बर के बाद वह पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने में सक्षम है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा तथा विधनसभा चुनावों के एक साथ होने का समर्थन कई बार कर चुके हैं। एक साथ चुनाव करवाने का समर्थन करते हुए नीति आयोग की मसौदा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में दोनों चुनाव एक साथ होने से शासन व्यवस्था में रुकावटें कम होंगी। देश में पहले भी लोकसभा और विधनसभा का चुनाव एक साथ हो चुके हैं। जैसा की पहली चार लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव 1952, 1957, 1962 और 1967 में हुए थे। लेकिन उसके बाद राज्य सरकारें अपने पांच साल के कार्यकाल से पहले ही गिरने लगी और गठबंधन टूटने लगे और पिफर देश में विधनसभा और लोकसभा चुनाव अलग-अलग कराए जाने लगे। ‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारी राजस्व और समय की बचत होगी। बार-बार चुनाव के चलते होने वाली राजनीतिक रैलियों आदि से सार्वजनिक जन-जीवन प्रभावित होता है। बड़े पैमाने पर सार्वजनिक ध्न की भी बर्बादी होती है। सालभर देश के किसी न किसी हिस्से में चुनाव होने से वहां चुनाव आचार संहिताएं लागू रहती हैं। इसका असर योजनाओं को जमीनी तौर पर लागू करने और सुशासन पर पड़ता है। समर्थकों का यह भी मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से राष्ट्रहित को प्रधनता मिलेगी और इससे क्षेत्राीय अलगाववाद कम होगा। लिहाजा एक बात यह भी है कि आज पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए भारत के संविधान में सुधार करना पड़ेगा और इसके लिए सभी दलों का सहयोग पाना जरूरी भी है। वहीं इसके विरोध् में मत है कि भारत जैसे भौगोलिक तौर पर विविध्ता वाले देश में एक साथ चुनाव कराना बेहद ही मुश्किल होगा। एक साथ चुनाव कराने से भारत की संघीय प्रणाली का ताना-बाना कमजोर हो सकता है क्योंकि पांच साल के निश्चित कार्यकाल में मध्यावध् िचुनाव की संभावना नही रह जाएगी। सबसे अहम सवाल है कि क्या चुनावी खर्च बचाने की बात हमारे बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्यों से ऊपर है? ‘एक देश, एक चुनाव’ को लोकतांत्रिक कैसे कहा जा सकता है, जब देश की आम जनता को पूरे पांच साल तक किसी चुनी हुई सरकार को ढोने के लिए विवश होना पड़े। बार-बार यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ के जरिए जनतंत्रा का गला घोंटने का काम किया जा सकता है। कई अहम मुद्दों से टकराते हुए आज ‘एक देश, एक चुनाव’ के मामले को लेकर एक ठोस बहस करने की जरूरत है ताकि लोकतंत्रा का बुनियादी ढांचे को बचाया जा सके।

मुख्य बिंदु:

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार कर चुके है एक देश एक चुनाव की बात
  • नीति आयोग ने भी एक चुनाव पर जताई है सहमति
  • एक चुनाव के लिए करना होगा संविधान में संशोधन
  • एक साथ चुनाव की बात प्रधानमंत्री कई बार कर चुके है
  • कई समस्याएं हैं एक साथ चुनाव कराने में
  • एक साथ चुनाव कराने से होगी खर्चे में बचत
  • अचार संहिता लागू होने से होता है काम में व्यवधान
  • एक साथ चुनाव कराने से लगेगी भ्रष्टाचार पर लगाम
  • जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर लगेगा अंकुश
  • एक साथ चुनाव से पैदा होगा मध्यावधि चुनाव का संकट
  • स्थानीय मुद्दों का महत्व कम हो सकता है
  • पार्टियों में है आतंरिक प्रजातंत्र का अभाव
  • एक देश एक चुनाव पर अलग अलग है पार्टियों के मत
  • देश में किया गया है लोकतंत्र का महत्व कम
  • आम इंसान का विश्वास लोकतान्त्रिक संस्थाओं में कम हुआ है
  • लोकतंत्र से हटकर तानाशाही माहौल बनाया जा रहा है
  • पिछले साल चुनाव आयोग ने एक साथ चुनाव कराने पर दी थी हरी झंडी
  • सरकार ने भेजी थी विधि आयोग के पास चुनाव आयोग की रिपोर्ट
  • विधि आयोग ने एक साथ चुनाव पर लगाए हैं सवालिया निशान
  • एक साथ चुनाव कराने के लिए करना होगा संविधान में संशोधन
  • एक साथ चुनाव के लिए चाहिए होगा आयोग अतिरिक्त पैसा और मशीनें
  • हाल में ही चुनाव आयोग ने एक साथ चुनाव कराने से किया इंकार
  • चुनाव आयोग ने एक साथ चुनाव में संसाधनों की कमी को बताया बाधा
  • साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को टटच्।ज् की मशीनें उपलब्ध कराने का आदेश दिया
  • सरकार ने मशीनों के लिए धन मुहैया कराने में लगा दिया 3 .5 साल
  • एक साथ चुनाव कराने के लिए है मशीनों की कमी
  • संविधान के 5 अनुच्छेदों में करना पड़ेगा संशोधन
  • लोकसभा, विधानसभा के कार्यकाल से सम्बंधित अनुच्छेद और अनुच्छेद 356 में होना है संशोधन
  • संविधान में संशोधन करना है कठिन
  • पार्टियों में है एक साथ चुनाव को लेकर मतभेद
  • म्टड मशीनें है अविश्वास के दायरे में
  • म्टड मशीनों के हैक होने की है सम्भावना
  • चुनाव आयोग ने म्टड मशीनों के हैक होने की सम्भावना से किया था इंकार
  • एक साथ चुनाव पर राष्ट्रीय बहस को गंभीरता से लेना होगा
  • एक साथ चुनाव पर राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव
  • प्रधानमंत्री को बहस के लिए स्वयं बुलानी होगी सभी पार्टियों की बैठक
  • एक साथ चुनाव पर जनता का रुझान भी जानना है जरूरी
  • पंचायत, विधानसभा और लोकसभा तीनों के चुनाव एक साथ कराने की थी बात
  • राज्य के मुख्य चुनाव और उपचुनाव को एक साथ कराने में है सरकार अक्षम
  • एक साथ चुनाव पर बहस किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पा रही है
  • 1952 1957, 1962 और 1967 में हुए थे एक साथ चुनाव
  • नेताओं के वायदों पर नहीं रहा जनता का भरोसा
  • जाति और धर्म के नाम पर लाडे जाते हैं देश में चुनाव
  • जाति और धर्म के सवालों पर राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव
  • चुनाव आयोग से वोटरों को शिक्षित करने की अपेक्षा
  • आज के राजनीतिज्ञों में प्रजातंत्र के लिए निष्ठा के प्रति संदेह
  • राजनीति की गुणवत्ता में हो रहा है ह्रास
  • दक्षिण एशिया के देशों में भारत में हैं प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत
  • चुनाव सुधार के मुद्दे पर सरकार मौन
  • चुनाव में बाहुबलियों के वर्चस्व और धन बल की प्राथमिकता
  • चुनाव में पैसों और भ्रष्टाचार का बाहुल्य
  • चुनाव में स्टेट फंडिंग की जरूरत
  • 1999 में इंद्रजीत गुप्ता आयोग ने चुनाव में स्टेट फंडिंग की सिफारिश की थी
  • चुनाव में स्टेट फंडिंग संभव नहीं क्यूंकि इसको मॉनिटर करना है मुश्किल
  • पार्टियों के पिछले चुनाव में प्रदर्शन के आधार पर होनी चाहिए फंडिंग
  • पार्टियों में नहीं होती है बहस चुनाव सुधारों पर
  • सार्वजनिक रूप से एक साथ चुनाव पर बहस में शामिल होना चाहिए युवा को
  • सभी पार्टियों में हैं तानाशाही और आतंरिक प्रजातंत्र का अभाव
  • जयप्रकाश नारायण ने की थी राइट टू रिकॉल की बात
  • अनसुनी कर दी गयी राइट तो रिकॉल की डिमांड
  • राइट टू रिकॉल किसी पार्टी को नहीं सूट करता
  • राइट टू रिकॉल को लागू करने से आ सकती है राजनीतिक अस्थिरता
  • सत्तारूढ़ पार्टियों को डर है राइट टू रिकॉल के लागू होने से
  • राइट टू रिकॉल का हो सकता है दुरुपयोग
  • देश में अस्थिरता और अराजकता का माहौल बनेगा
  • राइट टू रिकॉल से बार बार चुनाव कराने की जरूरत महसूस होगी
  • भारत के परिप्रेक्ष्य में बार बार चुनाव मुनासिब नहीं है
  • जयप्रकाश नारायण ने सत्ता पर दबाव बनाने के लिए समर्थन किया था राइट टू रिकॉल का समर्थन
  • सरकार की निरंकुशता पर नियंत्रण रखने के लिए राइट टू रिकॉल की जरूरत
  • पार्टियों पर खर्चे की लिमिट लगाने की जरूरत
  • चुनाव कराने की अवधि को काम करना होगा
  • अर्धसैनिक बलों की संख्या बढ़ने की आवश्यकता

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