(राष्ट्रीय मुद्दे) धारा-377 (समलैंगिकता) अब अपराध नहीं (IPC-377 (Homosexuality) is not a Crime)


(राष्ट्रीय मुद्दे) धारा-377 (समलैंगिकता) अब अपराध नहीं (IPC-377 (Homosexuality) is not a Crime)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): किरण (NAZ फाउंडेशन, इंडिया), श्वेता सिंह (सामाजिक कार्यकर्त्ता और वकील)

सन्दर्भ:

पिछले दिनों देश की सर्वोच्च अदालत ने IPC की धारा 377 की कानूनी वैधता पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि आपसी सहमति से दो बालिग़ों के बीच बनाये गए शारीरिक संबंधों को आपराध नहीं माना जायेगा।अपना फैसला सुनते हुए अदालत ने कहा कि समलैंगिकों के भी वही मूल अधिकार हैं जो किसी सामान्य नागरिक के हैं ।सबको सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है की वह समाज को सुप्रीम कोर्ट का फैसला ठीक से समझाए ताकि समलैंगिक लोगों यानि LGBT समुदाय को कलंकित न समझा जाये।एक लम्बे संघर्ष के बाद समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने पुरानी धारणाओं को अलविदा कहते हुए समाज की सोच बदलने की कोशिश की है |

मुख्य बिंदु:

  • IPC की धारा-377 पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला।
  • आपसी सहमति से दो बालिगों के बीच बनाए जाने वाले शारीरिक संबंध को अब अपराध नहीं माना जाएगा।
  • समलैंगिकों के मूल अधिकार सामान्य नागरिकों की तरह।
  • समलैंगिकों को कलंकित न समझा जाए।
  • समलैंगिकों का घर से लेकर सार्वजनिक स्थलों तक प्रताड़ना।
  • धारा-377 एक औपनिवेशिक कानून।
  • पुलिस इसका प्रयोग LGBT समुदाय को प्रताड़ित करने के लिए करती है।
  • धारा-377 का गलत प्रयोग हो रहा था।
  • यह फ़ैसला सिर्फ एक शुरुआत है।
  • नागरिक अधिकार के लिए बहुत कुछ किया जाना अभी बाकी।
  • अभी LGBT समुदाय से संबंधित शादी, एडॉप्सन आदि का मसला।
  • अब होमोसेक्स्युएलीटी भी नेचुरल माना गया है।
  • समाज इसे कितना स्वीकार करेगा, यह देखना बाकी।
  • माता-पिता को अपने बच्चों के लैंगिक झुकाव को स्वीकार करना होगा।
  • विद्यालयों में अत्यधिक शोषण
  • सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि इस संबंध में समाज में जागरुकता लाएं।
  • समलैंगिक-विवाह भारत में गैर कानूनी।
  • शादी और गोद लेने से संबंधित कानून आगे बन सकते हैं।
  • अभी सिर्फ समान लिंगों के प्रति झुकाव का कानून ही बनाया गया है।
  • 3rd जेंडर को सामाजिक स्वीकार्यता नहीं।
  • इन्हें OBC का दर्जा दिया गया।
  • परंतु इसका लाभ काफ़ी कम लोगों को।
  • इनके लिए समाज में जगह बनाने की जरूरत।
  • सामाजिक स्वीकार्यता जरूरी।
  • LGBT कम्युनिटी भारत में 7 से 8%
  • इनके लिए विशेष विभाग और पॉलिसी बनाए जाने की आवश्यकता।
  • कुछ कानून भी बनाए जा सकते हैं।
  • धारा-377 नहीं हटा है, बल्कि इसके कुछ प्वाइंट्स हटे हैं।
  • आगे समलैंगिक 'शादी और एडॉप्सन को भी कानूनी बनाए जाने की आवश्यकता ।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 1861 में बनाए गए आईपीसी की धारा-377 के कुछ पहलुओं पर रोक लगा दी है।
  • अभी भी समलैंगिकों के कई अधिकार स्पष्ट नहीं हैं।
  • स्पेशल मैरिज एक्ट में समलैंगिकों के विवाह से संबंधित कुछ प्रावधानों को जोड़ने की जरूरत।
  • एक बार विवाह कानूनी हो जाए तो एडॉप्सन से संबंधित कानून बनाना भी आसान होगा।
  • इस फ़ैसले का कई धर्मगुरुओं और संस्थाओं ने विरोध किया है।
  • भारतीय समाज आमतौर पर धार्मिक।
  • लैंगिक झुकाव को धर्म से अलग रखना चाहिये।
  • परिवर्तन धीरे-धीरे होगा।
  • लोगों की मानसिकता को परिवर्तित करने की जरूरत।
  • कई देशों ने समलैंगिक विवाह को मान्यता दी है।
  • संस्थागत और संरचनात्मक दोनों स्तर पर परिवर्तन की जरूरत।
  • हरेक सार्वजनिक स्थानों पर LGBT समुदायों के लिए भी जगह हो।
  • हरेक स्तर पर इन समुदायों के अस्तित्व को दिखाने की जरूरत है।
  • टेक्स्ट बुक, पुलिस व्यवस्था आदि के माध्यम से संवेदनशीलता बढ़ाने की आवश्यकता।
  • इस कानून को लेकर लोगों में जागरुकता की कमी।
  • ट्रांसजेंडर में भी जागरुकता की कमी।
  • सबसे पहले शिक्षा और जागरुकता बढ़ाने की जरूरत।
  • लोगों को ट्रांसजेण्डर पश्चिमी सभ्यता का भाग लगता है।
  • परंतु ये समुदाय भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा।
  • ट्रांसजेंडर को मिलने वाली सुविधाओं का गलत उपयोग हो सकता है।
  • परंतु कानून के दुरुपयोग के आड़ में ट्रांसजेंडरों के अधिकार नहीं छीने जा सकते।
  • कई ट्रांसजेंडर राजनीतिक क्षेत्र में भी हैं।
  • इन्हें भी राजनीतिक आरक्षण मिलनी चाहिये।
  • ट्रांसजेंडरों को हर स्तर पर सहयोग की आवश्यकता ।
  • सरकार के साथ-साथ समाज को भी इसके लिए प्रयास करना होगा।

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