(Global मुद्दे) अमेरिका-चीन ट्रेड वार (US-China Trade War)


(Global मुद्दे) अमेरिका-चीन ट्रेड वार (US-China Trade War)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): प्रोफ़ेसर बी आर दीपक (चीन अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय), प्रोफ़ेसर डॉ शमशाद ए ख़ान (पूर्व एशियाई अध्ययन केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय)

सन्दर्भ:

दुनिया के दो ताकतवर देशों, अमेरिका और चीन के बीच छिड़ी व्यापारिक जंग आज एक ग्लोबल ट्रेड वॉर का रूप ले चुकी है। इस युद्ध में कई देश एक दूसरे के लिए व्यापार में अड़चनें पैदा कर रहे हैं। किसी सामान्य युद्ध की तरह इसमें भी एक मुल्क दूसरे मुल्क पर हमला करता है और पलटवार के लिए वह तैयार रहता है, लेकिन इसमें हथियारों की जगह करों का इस्तेमाल करके विदेशी सामान को निशाना बनाया जा रहा है। व्यापार युद्ध में एक मुल्क दूसरे मुल्क से आने वाले सामान पर टैरिफ लगा देता है, जिससे आयातित वस्तु की कीमत बढ़ जाती है और वह उस मुल्क के घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाती है। विरोध में दूसरा मुल्क भी ऐसा ही करता है और इससे दोनों मुल्कों में टकराव बढ़ता है और यह बाद में राजनीतिक तनाव का भी रूप ले लेता है। इस ट्रेड वॉर की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका और चीन के बीच आयात शुल्क बढ़ने के साथ शुरू हुआ यह युद्ध यूरोपीय संघ, कनाडा, तुर्की, जापान, ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको और भारत आदि देशों तक फैल गया है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ट्रेड वॉर के समर्थन में कह रहे हैं कि यह ट्रेड वॉर आसान और बेहतर है और अमेरिका टैरिफ बढ़ाने के मुद्दे से पीछे नहीं हटेगा। मौजूदा दौर में व्यापार की यह लड़ाई अलग-अलग देशों द्वारा संरक्षणवाद का ही नतीजा है, जिसकी शुरुआत बीते समय में अमेरिका ने ही की थी। अमेरिका ने सबसे पहले इसकी शुरुआत स्टील और एल्युमिनियम के क्षेत्र में आयातित वस्तु पर टैरिफ लगाकर की थी। डोनाल्ड ट्रंप ने सभी स्टील आयात पर 25 फीसदी टैरिफ और एल्युमिनियम पर 10 फीसदी टैरिफ लगाया था, जिसका विरोध चीन के साथ कई मुल्कों ने किया था। गौरतलब है कि इससे भारत पर 24.1 करोड़ डॉलर का बोझ पड़ा था। इस ट्रेड वॉर में ट्रंप का तर्क है कि अमेरिका चीन के साथ व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। जाहिर है कि अमेरिका और चीन के बीच भारी ट्रेड डेफिसिट है और बीते साल यह अंतर 375 अरब अमेरिकी डॉलर था। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। अमेरिका के कुल व्यापार में चीन की भागीदारी 16.4 फीसदी है और इन दोनों मुल्कों के बीच व्यापार वैश्विक व्यापार का 4 फीसदी है। इसके अलावा अमेरिका ने चीनी माल पर टैरिफ लगाए जाने वाले कदम को चीन के जरिए इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी की चोरी के विरोध में उठाए जाने वाला कदम भी बताया है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि 'ग्लोबल ट्रेड वॉर' अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक अराजकता का हालात पैदा करेगा जो पूरे विश्व को फिर से एक भयानक आर्थिक मंदी की तरफ धकेल सकता है। दुनिया के करीब सभी केन्द्रीय बैंक और संस्थाएं भी ट्रेड वॉर के इन हालात को देखते हुए भारी आर्थिक मंदी के खतरे की भविष्यवाणी कर रहीं हैं। उनका मत है कि यदि इस ट्रेड वॉर को रोका नही गया तो यह 2008 से भी भयानक मंदी पैदा कर सकता है। दुनिया में छिड़ी इस व्यापार युद्ध का सबसे खराब असर यह देखने को मिल रहा है कि इसने दुनिया के करीब सभी कंपनियों के बीच मौजूद भरोसे को घटाया है। यह ग्लोबल ट्रेड वॉर किस दिशा में जाएगा और किस मोड़ पर रुकेगा यह तस्वीर अभी साफ नही है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह ट्रेड वॉर विश्व-शांति के विरोध में खड़ा है जो किसी भी मुल्क के विकास के लिए बेहतर सिद्ध नही होगा।

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