(Global मुद्दे) अफगानिस्तान में युद्ध विराम और उम्मीदें (Afghanistan Ceasefire : What Lies Ahead)


(Global मुद्दे) अफगानिस्तान में युद्ध विराम और उम्मीदें (Afghanistan Ceasefire : What Lies Ahead)


सन्दर्भ:

रोहिंग्या मामले को लेकर म्यामांर की दुनिया भर में कड़ी आलोचना हो रही है। आलोचना का मुख्य कारण है रोहिंग्या समुदाय पर म्यांमार की सेना द्वारा की गई हिंसा। हाल ही में इस मामले पर संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि पिछले साल म्यांमार की सेना ने कई रोहिंग्याओं का नरसंहार किया था। रिपोर्ट में म्यांमार की सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के बक़ायदा नाम हैं जिन पर मुक़दमा चलाने की बात कही है। इतना ही नहीं रोहिंग्याओं पर हुए ज़ुल्म को लेकर नोबेल पुरस्कार विजेता और वर्तमान म्यांमार की नेता आंग सांग सूची की कड़ी आलोचना करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि वे हिंसा को रोकने में पूरी तरह से नाक़ाम रहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा ऐसी रिपोर्ट जारी करना कोई आम बात नहीं है जिसमें किसी देश की सेना पर नरसंहार जैसे संगीन अपराध हो। आपको बता दें कि इस नरसंहार की वैश्विक स्तर पर कड़ी आलोचना हो रही है। संयुक्त राष्ट्र ने इस मामले को इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में भेजने की सलाह भी दी है। हालांकि रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि चूंकि म्यांमार उस रोम संधि का हिस्सा नहीं है जिसके तहत ये मामला इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में पहुंच सके। म्यांमार पर मुक़दमा चलाने के लिए सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों का साथ चाहिए होगा जिसमें कि चीन का साथ न मिले। संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट के कुछ दिन बाद म्यांमार की अदालत ने रॉयटर के दो पत्रकारों को सात साल की सज़ा भी सुनाई है। इन पत्रकारों पर आरोप है कि इन्होंने देश के गोपनीयता के क़ानून का उल्लंघन किया है जबकि पत्रकारों का कहना है कि ये रखाईन में हुए नरसंहार पर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट तैयार कर रहे थे।

आपको बता दें कि रोहिंग्या आमतौर पर मुसलमान हैं और अल्पसंख्यकों में कुछ हिंदु और ईसाई हैं जो बरसों से म्यांमार की सरज़मीं पर रह रहे हैं। इनकी भाषा रोहिंग्या है जो काफी हद तक बांग्ला से मिलती जुलती है लेकिन म्यांमार का मानना है कि रोहिंग्या बांग्लादेश से अवैध रूप से आए अप्रवासी हैं जो ‘म्यांमार के नागरिकता अधिनियम 1982’ के तहत नागरिकता पाने के क़ाबिल नहीं हैं इसलिए इनके पास कोई लीगल सिक्यूरिटी भी नहीं है। आपको बता दें कि रोहिंग्या समुदाय पर 2012 में हिंसा शुरु हुई थी जो थमने का नाम नहीं ले रही है और पिछले वर्ष 2017 में म्यांमार की सेना की तरफ से अभियान चलाया गया जिसमें रोहिंग्याओं की हत्याएं, सामुहिक बलात्कार और इनके गांव तक जला दिए गए। 2017 में हुई इस हिंसा में कई हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं। मौजूदा समय में भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या रह रहे हैं और सात लाख के करीब रोहिंग्या बांग्लादेश में जीवन तलाश रहे हैं। रोहिंग्या संकट आज विश्व के सामने एक विकराल रूप ले चुका है । जिसका हल क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर मानवीय नजरिये से ही संभव है।

मुख्य बिंदु:

  • पिछले 3 महीने में दो बार अफ़ग़ानिस्तान में हो चूका है संघर्ष विराम का एलान
  • ईद और बकरीद के मौके पर किया था एलान
  • दोनों बार तालिबान ने इस एलान को नहीं माना
  • ईद के मौके पर सरकारी फौजी और तालिबान एक दुसरे से ईद मिले थे
  • ईद के मौके पर ३ दिनों के लिए हुआ था युद्ध विराम
  • तालिबान ने सिर्फ अफ़ग़ान सेना के साथ किया था युद्ध विराम
  • विदेशी नाटो फोर्सेज और अमेरिकन के लिए नहीं लागू था युद्ध विराम
  • वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ऐलिस वेल्स ने दोहा में तालिबान के साथ आमने सामने की थी बातचीत
  • तालिबान नहीं देता है वजूद अफ़ग़ान सरकार को
  • तालिबान के अनुसार काबुल में सरकार अमेरिका की बनायीं हुई
  • ग़ज़नी और कुंदूज़ में तालिबान द्वारा काफी घातक हमले हुए थे
  • तालिबान को लगता है की कमज़ोर हो रही है अफ़ग़ान सरकार
  • अफ़ग़ानिस्तान का लगभग ४०% हिस्सा है तालिबान के कब्ज़े में
  • तालिबान नहीं यकीन करता है डेमोक्रेटिक सरकार में
  • तालिबान चुने जाने के बाद कायम करेगा शरीया कानून
  • तालिबान द्वारा अफ़ग़ानिस्तान को पूर्ण इस्लामिक राज्य बनाने की कवायद
  • तालिबान बात कर रहा है अमेरिका, चीन और रूस से
  • ISIS भी तेज़ी से फ़ैल रहा है अफ़ग़ानिस्तान में
  • 2014 के अफ़ग़ान चुनाव का परिणाम नहीं घोषित किया गया
  • अशरफ घनी और डॉ अब्दुल्ला ने चुनाव जीतने का एलान किया था
  • ओबामा सरकार द्वारा डॉ अब्दुल्ला को अफ़ग़ानिस्तान का सीईओ बनाया गया
  • अफ़ग़ान संविधान में नहीं है सीईओ का प्रावधान
  • अशरफ घनी और डॉ अब्दुल्ला में है मतभेद
  • अगले साल है अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव
  • बार शांति प्रयासों के ज़रिये घनी सरकार अपनी छवि सुधारना चाहते है
  • ISAF की जिमेदारी थी कानून व्यवस्था बनाने की
  • अमेरिका भारत जैसे देश चाहते है अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता
  • पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता नहीं चाहता
  • स्ट्रैटेजीकली बहुत महत्त्वपूर्ण है अफ़ग़ानिस्तान
  • सेंट्रल एशिया के देशों, ईरान, पाकिस्तान और चीन से सीमा साझा करता है अफ़ग़ानिस्तान
  • अमेरिका नहीं चाहता है अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाना
  • अफ़ग़ान सेना के पास तालिबान के मुकाबले अच्छे शस्त्र और उम्दा ट्रेनिंग की कमी
  • अमेरिका तालिबान को प्रजातंत्र की सरकार के दायरे में लाना चाहता है
  • तालिबान के चीन, रूस और ईरान से हैं अच्छे रिश्ते
  • अशरफ घनी नहीं बन पाए है करिश्माई नेता
  • पश्तून समुदाय अशरफ घनी को बाहर का मानता है
  • अफ़ग़ानिस्तान को सबसे ज्यादा मदद आती है अमेरिका से
  • अफ़ग़ानिस्तान के रक्षा बजट का 75% भाग अमेरिका देती है
  • अफ़ग़ानिस्तान के इकनोमिक डेवलपमेंट का लगभग 100% अंतर्राष्ट्रीय समुदाय देता है
  • रूस और अमेरिका में है मनमुटाव
  • चीन की मिलिट्री पावर और बढ़ते प्रभाव से परेशान है अमेरिका
  • ईरान और अमेरिका में भी सैंक्शंस को लेकर है तकरार
  • 4 सितम्बर की मीटिंग में रूस ने बुलाया है तालिबान को अफ़ग़ान सरकार का मीटिंग में जाने से इंकार
  • इमरान खान को कहा जाता है तालिबान खान
  • पिछले 1 साल से इमरान खान ने बढ़ाई है तालिबान से नज़दीकियां
  • तालिबान का भरोसा नहीं अफ़ग़ान सरकार पर
  • तालिबान के सबसे घने सम्बन्ध हैं पाकिस्तान से
  • तालिबान को ट्रेनिंग फंडिंग और सहायता मिल रही है हक़्क़ानी नेटवर्क से
  • पाकिस्तान नहीं चाहता की भारत अफ़ग़ानिस्तान में कोई बड़ा रोले प्ले करे
  • अफ़ग़ानिस्तान की आम जनता, सरकार चाहती है भारत से अच्छे सम्बन्ध
  • तालिबान के ईरान चीन और रूस से नहीं हैं अच्छे सम्बन्ध
  • तालिबान की हिंसा और टेरर की स्ट्रेटेजी रही है
  • पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान और कश्मीर में आतंकवाद और दहशत की नीतियां रही है असफल
  • ISIS तालिबान से है बड़ा संगठन और विचारधारा में भी अलग
  • पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान के लिए नीति में इमरान खान के आने से कोई बदलाव नहीं आएगा
  • पाकिस्तान की सेना लेती है विदेश नीति सम्बन्धी निर्णय
  • पाकिस्तान तालिबानी सत्ता को चाहता है लेकिन आंशिक रूप से
  • पाकिस्तान सरकार ने 1992 में नजीबुल्ला की थी मदद
  • पाकिस्तान तालिबान से लिमिटेड पावर शेयरिंग चाहता है
  • तालिबान के पास शास्त्र और पैसा काफी मात्रा में आ चुका है
  • तालिबान चुनाव में डाल सकता है अड़ंगा
  • सारे देश अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव कराने के पक्ष में

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