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वित्तीय समाधान और जमाराशि बीमा विधेयक 2017

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2007-08 की आर्थिक मंदी ने ‘वन-साइज -फिट्-आल’ के दृष्टिकोण पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। हालाँकि भारत इसके प्रभाव से अछूता रहा, किन्तु एनपीए के बढ़ते संकट ने विभिन्न दृष्टिकोण पर अधारित नीतियों के निर्माण पर बल दिया, जिसके अंतर्गत गैर-वित्तीय संस्थानों से जुड़े मामलों के लिए ‘बैंकरप्सी कोड 2016’ तथा वित्तीय संस्थानों से जुड़े मामलों के लिए ‘वित्तीय समाधान और जमाराशि बीमा विधेयक 2017’ लाया गया।

      इस विधेयक का लक्ष्य वित्तीय तौर पर खस्ताहाल वित्तीय सेवा प्रदाताओं के बीच अनुशासन स्थापित करना है। यह विधेयक केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और बीमा कंपनियों जैसे वित्तीय क्षेत्रक संस्थाओं से जुड़े मामलों और इनसे जुड़ी समस्याओं के समाधान हेतु प्राधिकारियों को व्यापक शक्तियाँ प्रदान करने संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत करता है।

विधेयक के प्रमुख बिन्दु

•     इस विधेयक के लागू होने से एक समाधान निगम की स्थापना हेतु मार्ग प्रशस्त होगा। समाधान निगम में सभी वित्तीय क्षेत्र नियामकों जैसे आरबीआई, सेबी, बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण और वित्त मंत्रलय के प्रतिनिधि सहित स्वतंत्र सदस्य शामिल होगें।

•     समाधान निगम वित्तीय संस्थाओं में संकट की स्थितियों से निपटने पर ध्यान केन्द्रित करेगा।

•     वित्तीय संस्थाओं की स्थिति की जाँच पाँच बिन्दु के ‘व्यवहार्यता जोखिम’ स्केल के आधार पर ‘कम व्यवहार्यता जोखिम’ से लेकर अत्यंत व्यवहार्यता जोखिम’ पर आंकलित होगी।

•     किसी वित्तीय संस्थान के पूर्ण विफल होने की स्थिति में समाधान निगम उस वित्तीय संस्थान को अपने नियन्त्रण मे ले लेगा और इसकी युक्तियुक्त समाप्ति तक निगरानी करेगा।

•     बेल-इन के अन्तर्गत ऋण को इक्विटी में बदलकर विफल होते वित्तीय संस्थान के मौजूदा संसाधनों का उपयोग किया जायेगा। हालाँकि बेल-इन का लाभ पूर्व-परिभाषित देनदारियों को मिल पायेगा, वैसी देनदारियां जो जमाकर्ता या कर्मचारियों की ओर अग्रसर होगी, उनका बेल-इन नहीं होगा।

•     ब्रिज सर्विस प्रोवाइडर एक अस्थायी संस्थान होगा, जिसकी स्थापना अधिकतम एक वर्ष के लिए किसी वित्तीय संस्थान के संकट के समय पर संचालन के लिए की जायेगी।

•     रन-ऑफ एक विशेष उपाय है, जो बीमा कंपनियों के लिए प्रयोग किया जायेगा।

•     इसके साथ ही बड़ी संख्या में खुदरा जमाकर्ताओं के लाभ के लिए जमाराशि बीमा प्रणाली के मौजूदा ढाँचे को सशक्त और सुसंगत बनाना है।

चिंता के बिन्दु

•     इस विधेयक के परिणामस्वरूप ‘निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी अधिनियम 1961’ को समाप्त करने से लेकर, जमा राशि बीमा अधिकारों के स्थानांतरण और समाधान निगम के प्रति उत्तरदायित्व को स्थापित करना भी संभव होगा। ध्यातव्य है कि प्रत्ययगारंटी अधिनियम 1961 के तहत बैंक, ग्राहकों को बैंक के दिवालिया होने की स्थिति में जमाराशि के 1 लाख रूपए तक की सुरक्षा की गारंटी देता है। अतः उक्त विधेयक ग्राहकों के अधिकार सीमित करता है।

•     ‘बेल-इन’ के प्रावधानों से अब ग्राहक का धन बैंकों में खास सुरक्षित नहीं रहेगा। इसलिए अब ग्राहक का खाता अपनी संप्रभु गारंटी खो सकता है।

•     भारत में ग्राहकों द्वारा बैंकों में अपेक्षाकृत कम पैसा जमा कराया जाता है। अतः इस विधेयक के आने के बाद स्थिति और भी चिंताजनक बन सकती है।

•     समाधान निगम यदि बैंक की संकट की स्थिति में कोई कार्यवाही करता है, तो इस स्थिति में ग्राहक बैंक से अपनी जमा वापस करने की मांग करेंगे, ऐसी स्थिति में बैंक-रन हो सकता है।

निष्कर्ष-

ग्राहक ही बैंक के व्यवसाय को जारी रखते हैं। यदि ग्राहकों के साथ असुरक्षित लेनदार की तरह व्यवहार किया जाता है, तो निश्चित ही बैंक और ग्राहकों के संबंध पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। हालाँकि वित्त मंत्री द्वारा आश्वासन दिया गया है, कि इस विधेयक में ग्राहकों के हितों को सुनिश्चित करने वाले प्रावधान भी शामिल किये जायेगें। इसलिए विधेयक को लेकर तात्कालिक रूप से चिंता करना अभी जल्दबाजी होगी।